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जाग मचिन्दर गोरख आया I

श्रीमद् योगेन्द्र गोरक्षनाथजी के विमल कमलोपम हृदयात्मक स्थान में स्वकीय अद्भुत शक्ति के विश्वास का तथा गुरुभक्ति का अपरिमित अटल साम्राज्य ...

Wednesday, May 1, 2013

श्री मत्स्येन्द्रनाथ वीरबैताल वशीकरण वर्णन


श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी रामेश्वर से गमन कर जनों को योग का उपदेश देते हुए कुछ काल में बारामलेवार में पहुँचे। वहाँ के मांडवा नामक एक ग्राम की कुछ दूरी पर बाह्यस्थल में एक देवी का मन्दिर था। आपने उसी को ऐकान्तिक स्थान जान कर उसमें अपना आसन स्थिर किया। वहाँ सायंकाल तक बैठे हुए आप अलक्ष्य पुरूष का ध्यान करते रहे। ग्राम से कोई भी मनुष्य आपके समीप न आया। तब तो आपने विचार किया कि सम्भव है यह स्थान विघ्न सहित होगा। क्यों कि इसमें लोग कभी आते दिखाई नहीं देते हैं। अस्तु! इसी प्रकार के संकल्प विकल्प करते हुए आपका दिवस तो व्यतीत हो गया परन्तु जब रात्री देवी का आगमन हुआ और अन्धकार ने अपना पूरा अधिकार जमा लिया तब उस मन्दिर के समीपस्थ एक शून्य स्थल में सहसा सैंकड़ों दीपक प्रज्वलित हो उठे। जिन्हांे के तेज समूह ने अन्धकार को पराजित कर दूर भगा दिया। ठीक उसी समय मत्स्येन्द्रनाथजी की दृष्टि उधर पहुँची। देखते क्या हैं सैंकड़ों दीपक तथा मसालें जल रही है और सहस्त्रों मनुष्य वहाँ खड़े हुए दृष्टि में आते हैं एवं कोई आ रहा है तो कोई जा रहा है। कुछ देर के बाद उनकी मनुष्यों जैसी चेष्टा न देखकर तथा जब दिन में ही यहाँ कोई मनुष्य नहीं आता है तो रात्री में कैसे आ सकता है इस विचार से निश्चय किया कि अवश्य ये पिशाच हैं। ठीक इसी भय से लोगों ने इस मन्दिर में आना छोड़ दिया है। परं यह भी अच्छा हुआ मुझे शुभ अवसर मिल गया आज इन सबको अपने वश में करूँगा। यह दृढ़ निश्चय कर आपने अपनी झोली से विभूति निकाली और शक्ति आकर्षण मन्त्र पढ़कर उसे उनकी तरफ फैंक दिया। तत्काल ही समस्त भूत जड़ी भूत हो गये। उनकी चलने बैठने हिलने की अखिल शक्ति जाती रही। जैसा जो खड़ा बैठा चलता हुआ था वह प्रतिमा की तरह उसी प्रकार स्थित रहा। हाँ इतना अवश्य हुआ कि वाणी किसी की भी बन्ध न हुई थी। यह देख प्रेत लोग अत्यन्त विस्मित हुए परस्पर में कहने लगे कि अहो आश्चर्य है ऐसा तो कभी हुआ न सुना है। आज अकस्मात यह क्या विचित्र घटना उपस्थित हुई और किस कारण से हुई कोई कारण भी इस समय दृष्टि में नहीं आता है। हमने तो केवल बैताल जो हमारा राजा है उसकी सभा में जाने के लिये यह उत्साह दिखलाया था। परं अब क्या करें वहाँ कैसे जायें हमारा तो सर्व प्रयत्न निष्फल हुआ। यदि वहाँ समय पर न जाने पायेंगे तो न जाने बैताल हमको कितना कठोर दण्ड देगा। इस समय तो यहाँ पर कोई भी ऐसा नहीं दीख पड़ता है जो हमको इस अज्ञात व्याधि से मुक्त करै वा हमारी सूचना बैताल के यहाँ भेज दे ठीक जिस समय ये भूत ऐसा परामर्श कर रहे थे उसी समय उधर बैताल की सभा में अनेकानेक भूत आकर सम्मिलित हो चुके थे। परन्तु इधर के इन भूतों की प्रतीज्ञा की जा रही थी। कुछ देर होने पर वहाँ प्रस्ताव उपस्थित हुआ कि क्या कारण है उस मण्डल के भूत अभी तक भी न आये। यह सुनकर कई एक प्रधान भूतों ने बैताल को उस मण्डल के भूतों से विपरीत भडकाया और कहा कि महाराज वे अत्यन्त प्रमत्त हैं अनेक बार आपकी आज्ञा को भंग कर चुके हैं हम लोगों को दया आती है इसी कारण से आपको सूचना नहीं दी जाती है। परन्तु क्या करें कब तक इस तरह निर्वाह हो सकता है। साक्षात् आपके सम्मुख भी वे अपनी धृष्टता दिखलाते हैं। तब तो बैताल उनके ऊपर अत्यन्त क्रुद्ध हुआ। ठीक इसी अवसर पर बैताल के मन्त्रियों ने कहा कि कारण न जानकर सहसा कुपित होना तथा उनके लिये कठोर दण्ड का सोचना उचित नहीं है। अतएव किसी चतुर कर्मचारी को उधर भेजकर उनके समय पर उपस्थित न होने के कारण को जानों। तथा उनको युक्ति से समझाओ फिर भी यदि वे अनुकूल न होंगे तो अवश्य दण्डनीय समझे जायेंगे। यह सुनकर बैताल ने अपना एक प्रधान राज कर्मचारी उधर भेजा और उसे कह सुनाया कि आप उनको शान्ति के साथ लेवा लाओ। तब तो बैताल की आज्ञा प्राप्त कर राजपुरुष उसी ग्राम के भूतस्थल में आया। वहाँ देखता क्या है सहस्रों भूत उपस्थित हैं जिनमें कितने तो खड़े हैं और कितनेक बैठे हैं। परं चलते-फिरते नहीं दीख पड़ते हैं। अन्ततः अतीव समीप आकर सरदार ने पूछा कि क्या आप लोग आज बैताल की सभा में नहीं चलोगे। उन्होंने उत्तर दिया कि हम लोग वहीं आने के लिये एकत्रित हुए थे परन्तु ऐसी अज्ञात व्याधि उपस्थित हुई है जिससे हमारी चलने फिरने की समस्त शक्ति जाती रही है और शरीर पत्थर की तरह स्थूल हो गया है। यदि किसी प्रकार यह कष्ट निवारित हो जाय तो हम कुछ भी विलम्ब न करेंगे अभी आपके साथ शीघ्रता से वहाँ पहुँच सकते हैं। यह सुनकर सरदार ने बड़ा आश्यर्च माना एवं विचार किया कि मालूम होता है यहाँ पर कोई मन्त्रज्ञ आया होगा। जिसके सकाश से इनकी यह दशा हुई है। तदनन्तर जब वह इधर-उधर चलकर देखने लगा और उसी देवी के मन्दिर में आया तब तो उसकी दृष्टि मत्स्येन्द्रनाथजी के ऊपर पड़ी और उनका वेष उसकी तादृश ही दृष्टि में आया। तब तो उसने अनुमान से ही निश्चय कर लिया कि ठीक यह कृत्य इसी व्यक्ति का किया हुआ है। अतएव उसने मत्स्येन्द्रनाथजी से कहा कि अये तू कौन है। सच्च बतला इन भूतों को तेरे ही सकाश से यह असह्य कष्टावस्था प्राप्त हुई है क्या ? यदि ठीक यही बात है तो मेरा यह कहना अन्यथा न होगा कि आज अवश्य तुम मृत्यु के मुख में पड़ जाओगे। क्योंकि इनका राजा जो बैताल है वह बड़ा ही बली और प्रतापी है जिसके कोपाग्नि से तुम्हें अवश्य दग्ध होना पड़ेगा। यह सुनकर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि और वार्ता तो सब रहने दो प्रथम यह बतलाओ कि तुम यहाँ तक चलकर कैसे आये हो। उसने कहा कि मैं इनमें सम्मिलित नहीं था मैं तो इनके सभा में उपस्थित न होने के कारण को जानने के वास्ते बैताल ने यहाँ भेजा है। तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि जाओ बैताल की सभा में मेरा नाम लेना और कह देना कि एक मत्स्येन्द्रनाथ नाम का योगी है उसने समस्त भूतों को बान्धकर अपने वश में किया है। जिन्हों को छोड़ना भी स्वीकार नहीं करता है। सरदार ने कहा कि मैं सत्य बोलता हूँ मेरा वचन मानों बैताल बड़ा ही विक्राल है जो इस वृत्तान्त के सुनते ही तुम को मार डालेगा। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अये महानुभाव आप अधिक बातें न कर अपने अभीष्ट कार्य में दत्तचित्त हो जायें हम आपके प्रतापी बैताल से किंचित भी भय नहीं करते हैं। बैताल आपके लिये ही विक्राल काल दिखाई देता होगा जिस अवसर पर हमारे साथ उसका साक्षात्कार होगा उस समय देखना उसका प्रताप किधर जाता है। तदनु मत्स्येन्द्रनाथजी के वचनों को ठीक-ठीक याद कर सरदार बैताल की सभा में पहुँचा और पूर्वोक्त समग्र वृत्तान्त सुनाया कि एक मत्स्येन्द्रनाथ नाम के योगी ने समस्त भूतों को बान्ध रखा है। मैंने बहुत ही उसको समझाया परं उसने उनको छोड़ना स्वीकार नहीं किया। बल्कि छोड़ना तो दूर रहा उसने यहाँ तक कह डाला कि तुम जाओ बैताल को सूचित कर दो ये भूत नहीं छोडे जायेंगे। इसके लिये बैताल जो शक्ति व्यय कर सकता है करै, आगे आपके अधीन है उचित समझो सो करो। यह सुनते ही बैताल ने देशान्तर के आये हुए अनेक भूतों की एक बड़ी सेना तैयार कर घटनास्थल में प्रेषित की। वह कतिपय क्षण में मत्स्येन्द्रनाथजी के अभिमुख आ खड़ी हुई। तत्काल ही आपने अपनी झोली से एक चुटकी विभूति निकाली और प्रामत्तिक मन्त्र के जापपूर्वक उसको सेना की ओर फेंक दिया जिससे प्रेत लोग आपस में ही युद्ध करने लगे। युद्ध करते-करते समग्र रात्री बीत चली उनका युद्ध समाप्त नहीं हुआ। कितने ही प्रेत मारे गये, कितने ही पलायित हो गये। तब तो मत्स्येन्द्रनाथजी ने एक चुटकी और फेंक दी जिससे सेना युद्ध करने से तो बंद हो गई परं प्राथमिक प्रेतों की तरह चलनादि क्रियाओं से शून्य हो गई। उधर जब रात्री समाप्त हो चली तब तो बैताल ने अपना एक दूत और भेजा और कहा कि अत्यन्त शीघ्र जाओ देखो प्रातःकाल होने को आया अब तक कुछ भी समाचार नहीं आया सेना का क्या हाल है। यह आज्ञा मिलने पर दूत वहाँ पहुँचा और सेना का जहाँ की तहाँ मूच्र्छान्वित हुई स्थित देखकर अत्यन्त विस्मित हुआ। इस समय सेना की दशा जो उसने देखी वह ऐसी थी जिसको वह धैर्य के साथ अधिक देर तक न देख सका और अधीर होकर सहसा वापिस लौट गया। वहाँ जाकर बैताल के समक्ष सेना की कठिन अवस्था का समस्त वृत्तान्त सुना डाला। जिसके सुनने पर कुछ क्षण तो मानों बैताल मूच्र्छित ही हो गया था ऐसा मालूम होता था अन्त में सचेत सा होकर कहने लगा कि ऐसे पुरुष के साथ विरोध करना उचित नहीं है। यदि करेंगे तो हमारी भी वही दशा होगी। कारण कि अपने पास वह सामग्री नहीं जो उसके पास है। इसीलिये उसके साथ विरोध खड़ा करने पर हमारी विजय होनी भी अनिश्चित ही है। इस दृढ़ निश्चय के अनन्तर बहुत भूत लेकर बैताल मत्स्येन्द्रनाथजी के समीप आया। तथा आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार की विनम्र अभ्यर्थना करता हुआ कहने लगा कि महाराज मैं प्रेतों का स्वामी बैताल हूँ आपसे निवेदन करता हूँ कि आप कृपा कर अब इन भूतों को मुक्त कर दें। आपने कहा कि यह बात ठीक है मैने इनको सदा इसी प्रकार निश्चेष्ट रखने के लिये ही यह कृत्य नहीं किया है परं मैं चाहता हूँ जिस अभिप्राय से मैंने इस अनुष्ठान का अवलम्बन किया है आप लोग उसे ठीक-ठीक समझ लें। बैताल ने कहा कि यद्यपि हमने आपके इस कृत्योद्देश का अनुमान कर लिया है। परं अनुमान सर्वत्र सत्य नहीं निकलता है। अतएव सम्भव है हम आपके अभिप्राय से विपरीत बैठे। इसलिये आपको उचित होगा कि सबके समक्ष प्रत्यक्षतया अपने उद्देश्य को घोषित कर सुना दें। आपने कहा कि प्रेतों की मुक्ति के बदले में तुम्हें यह प्रतिज्ञा करनी होगी कि हम आपकी आज्ञा से कभी मुख न मोडेंगे। बैताल ने कहा कि अच्छा ऐसा ही होगा। जब तक वर्तमान प्राणों का मेरे इस विग्रह में संचार होता रहेगा तब तक आपकी आज्ञा का पूर्ण रीति से पालन किया जायेगा। आपने कहा कि समय पड़ने पर शीघ्र उपस्थित होने का वचन दो और इस बात को अपने हृदय में ठीक-ठीक जमा लो कि केवल वचन देने से ही आप कृतकार्य न होंगे जब तक की उसकी रक्षा करने के लिये दृढ़ निश्चय न कर लेंगे। बैताल ने कहा कि मैं अपने प्राणों का नाम ले चुका हूँ। अतः ये रहेंगे तब तक आपकी आज्ञा शिरोधार्य समझी जायेगी। परन्तु इतना आप को भी ध्यान रखना होगा कि जिस किसी भी कार्य के लिये जब मेरा आव्हान किया जाय तब मेरा आहार तो अवश्य उपस्थित करना पड़ेगा। आपने कहा कि यद्यपि हम इस विषय में कोई निश्चात्मक नियम नहीं कर सकते हैं तथापि ऐसे अवसर पर जहाँ कभी उचित समझा गया तो यह आहार उपस्थित किया जायेगा। अगत्या बैताल ने इस बात पर आखिर सन्तोष करना ही पड़ा। तदनु मत्स्येन्द्रनाथजी ने अपनी झोली से विभूति निकालकर शक्ति संचारक मन्त्र के साथ उसे प्रेतों की ओर फेंक दिया। जिससे वे समस्त प्रेत फिर पूर्ववत् शक्तिमान हो गये। यह देख मत्स्येन्द्रनाथजी को प्रणाम करने के पश्चात् समस्त भूतों के साथ बैताल अपने स्थान को चला गया और समय-समय पर आहूत हुआ, मत्स्येन्द्रनाथजी का कार्य सिद्ध करने लगा।
इति श्री मत्स्येन्द्रनाथ वीरबैताल वशीकरण वर्णन 

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