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जाग मचिन्दर गोरख आया I

श्रीमद् योगेन्द्र गोरक्षनाथजी के विमल कमलोपम हृदयात्मक स्थान में स्वकीय अद्भुत शक्ति के विश्वास का तथा गुरुभक्ति का अपरिमित अटल साम्राज्य ...

Saturday, July 20, 2013

श्री चौरंगीनाथ शालिपुर आगमन वर्णन ।

चौरंगीनाथजी गुरुजी की आज्ञा प्राप्त कर कलकत्ता से प्रस्थानित हुए किसी प्रकार के अनवरत गमन द्वारा एकदम शालिपुर पहुँचे। यहाँ आपने उस बाग में जो कि आपके जन्म दिन स्मारक रूप से लगाया गया था, अपना आसन निश्चित किया। महाराजा शालीवाहन की तिर्यग् दृष्टि से यह आराम भी वंचित न रह सका था। उसने जैसे ही आपके साथ महान् अनुचित और अविचार का व्यवहार किया था वैसे ही बहु प्रयत्न से आरोपित इस बाग की परिचालक व्यवस्था का भी भंग कर डाला था। यही कारण था जहाँ कभी सहस्रोंे संख्या में मनुष्य कार्य करते हुए इसके मनोरंजक सौन्दर्य को बढ़ाते थे। वहाँ आज एकाध मनुष्य पड़ा केवल पशु बारण का ही काम कर रहा है। कितने ही वृक्ष शुष्क होकर नष्ट हो गये थे। कितने ही इस दशा में पहुँचने वाले थे। अधिक क्या जिस मनुष्य ने इसकी उस समय की सुन्दरता देखी थी वह कौन ऐसा मनुष्य था जो इस अवसर में इसको देख अपने नेत्रों से दो बूँद न डालता हो। यह दशा देख आपका चित्त भी कुछ विक्षिप्त हुआ और उसमें अनेक भाव उत्पन्न होने लगे। अन्ततः सावधान हो आपने गुरुपदिष्ट वार्षिकास्त्र का प्रयोग किया जिससे बाग की बहुत दिनों से उत्पन्न हुई तृषा शान्त हुई। प्रतिदिन शुष्क दशा में परिणत होने वाले वृक्ष अपने जीवित होने की आशा करने लगे। अधिक क्या बाग में प्राकृतिक स्वभाव में परिवर्तन हो आया। यह जहाँ इस दशा में मालूम होता था कि मानों आपके कत्ल होने का शोक कर रहा है वहाँ आज ऐसा प्रतीत होने लगा मानों सचमुच आपके आगमन पर प्रसन्नता प्रकट कर रहा है। टूटे-फूटे पुष्प पेड़ों में फिर कलियों का उद्गमन हुआ जिनकी परस्पर में मिश्रित हुई सुगन्धी पूर्वावसर का स्मरण कराने लगी। सात्विक शीतल वायु मन्द गति से प्रचलित हुआ। यह देख वे पक्षी जो इससे नासिका संकुचित कर अन्य बागों में चले गये थे फिर इसी में आकर निवसित हुए। जिनके विभिन्न स्वरमाधुर्य ने आपके विक्षिप्त चित्त को ठिकाने ला दिया। इतना होने पर भी मूढ बागवासी मालाकार ने यह नहीं सोचा कि अकस्मात् बाग की दशा पलट जाने का कारण है। किन्तु उसने अनुमान किया कि अब के वर्ष का ऋतु ही ऐसा अनुकूल है जिससे बाग की अघटित घटना उपस्थित हो गई। योगी को ऐसा करने की कौन जरूरत पड़ी जो किसी का बाग शूका वा हरा करे। यदि ऐसा ही होता तो आजपर्यन्त कहीं एक योगी यहाँ आये और इच्छा हुई उतने दिन निवास कर चले गये। उन्होंने ही इसको कभी का ऐसा कर दिया होता। अस्तु अन्ततः जब दिनों दिन बाग की चमन अवस्था बढ़ती ही चली गई तब उसने अपने प्रतिवेशियों वा अपने से मिलने वाले राजपुरुषों से इस विषय में परामर्श करना आरम्भ किया। बल्कि यहाँ तक कि अननुभवित सुगन्ध पुष्पों की माला तैयार कर राजकीय कर्मचारियों की सेवा में भेजने लगा। कुछ दिन तो यह वार्ता सन्दिगध होने पर भी उन लोगों के मन की मन ही में रही और उपहार रूप से उसको कुछ देते लेते हुए सोचते रहे कि शायद अपनी आजीविकार्थ प्रयत्न से सींचकर इसने कोई वृक्ष ऐसा तैयार कर लिया होगा। जिससे कि कुछ पुष्प उपलब्ध हुए जायें। परं जिस प्रकार वह प्रतिदिन मालायें भेजने लगा उसी प्रकार उनका चित्त अधिकाधिक सन्देहग्रस्त होने लगा और जब कभी वे यह निश्चय करते थे कि यह इनते तथा ऐसे पुष्प प्रतिदिन कहाँ से लाता है। जिस बाग में यह रहता है उसमें इतने पुष्पों का मिलना मुश्किल ही नहीं असम्भव है। तब आप ही अपने मन में इस प्रकार समाधान भी कर बैठते थे कि अथवा ठीक है राजा साहिब का उपेक्षित होने से वह बाग सब लोगों की उपेक्षा का पात्र हो गया। इसीलिये पुष्पग्राही लोग उधर कोई भी नहीं जाते हैं शायद यही कारण होगा कम से कम होने पर भी बड़ा बाग होने से इतने पुष्प अक्षर मिल ही जाते होंगे। तथापि यह बात अधिक दिन ऐसी सन्देहस्पद न रह सकी। उन लोगों ने स्वयं वायुसेवन के समय उधर जाकर उसका निरीक्षण किया। परं आज यह वह बाग न रहा था जो शून्यशान दशा में परिणत हो गया था। ये महानुभाव ज्यों ही बाग के समीप पहुँचे थे त्यों ही इन्हों को उसमें बैठे हुए पक्षियों के उद्घोषित कालोहल से उसके परिवर्तन की सूचना मिलती गई थी। आखिर जब ये राजपुरुष बाग के अन्तर प्रविष्ट हुए तब तो इन्होंेने महान आश्चर्यग्रस्त हो इस अघटित घटना का कारण पूछना चाहा तथा माली से कहा कि किसी ओर से से जल का आगमन नहीं होने पर भी इस बाग में जल की कोई त्रुटि मालुम नहीं होती है। यही कारण है कि दो सप्ताह के अन्तर्गत अकस्मात् बाग का विस्मापक द्रश्य उपस्थित हो गया है। भला इसके विषय में तुझे कुछ विदित है किस कारण से यह ऐसा हुआ है। उसने उत्तर दिया कि लगभग दो वा तीन सप्ताह हो गये एक दिन रात्री के समय इस बाग में अच्छी वर्षा हुई थी। तदनन्तर जब मैं प्रातःकाल उठकर देखता हूँ तब प्रतिदिन सूक्ष्म वर्षा हुई पाती है। जिससे एकाएक बाग की दशा पलटकर इस दर्जे पर पहुँची है। अतएव मैं स्वयं इस विषय में सन्दिग्ध हूँ। और मैंने इस आकस्मिक घटना का हेतु जानने की चेष्टा भी की है। परन्तु अभी तक कृत कार्य नहीं हुआ हूँ। यह सुन कारणाभिज्ञान से निराश हुए वे इधर-उधर की आरामीय शोभा देखने में दत्तचित्त हुए। और परिक्रमण करते-करते वे ज्यों ही महात्माजी के आसन स्थल के समीप पहुँचे त्यों ही उनकी दृष्टि एका-एक आपके मुखारविन्द के ऊपर पड़ी। वे देखते ही कुछ कह तो नहीं सके परं उस अवस्थानिष्ठ आपके शरीर का उनके हृदयागार में शीघ्र स्मरण हो आया। और उनके आन्तरिक यह इच्छा उत्पन्न हुई कि हम महात्माजी से कुछ क्षण वार्तालाप करें। आखिर उत्कट अभिलाषा से विवश हुए वे अग्रसर हुए। एवं उचित प्रणाम कर पास में बैठ गये। और अनेक प्राकरणिक वृत्तान्तों का उद्घाटन करने लगे। यद्यपि कुछ अवस्था भेद से आपके प्राकृतिक दृश्य मंे विभिन्नता आ गई थी तथापि वह इतनी नहीं थी कि आपका स्वरूप बिल्कुल परिवर्तित हो गया हो। अतएव पारस्परिक प्रश्नोत्तर करते कराते राजकीय पुरुषों के हृदयागार में दो बिचारों का युद्ध होने लगा। जब वे आपको परिचित कर यह विचार स्थिर करते थे कि यह वही राजकुमार है तब वे इस विचार से सन्दिग्ध होते थे कि जब उसके हस्त पैर काटे जा चुके हैं तो उसका तो जीवित रहना ही असम्भ है। फिर किसी कारण से सजीव ही रह गया हो तो हस्त-पैर कहाँ से आते जिन्हों के द्वारा कूप से निकलकर वह आज इस दशा में पहुँच सकता। अन्ततः आपके शरीर विषय में जो उनका सन्देह था वह तो आपके वाचनिक परिचय से दूर हो गया। परं यह एक हस्तादि तादृश हो जाने का विस्मय उनके हृदय में खटकता रहा। यही कारण था वे निशंक होकर यह प्रकट नहीं कर सके कि आप वे ही हमारे शिर के ताज हैं। आखिर चित्त द्विविधा में ही प्रणाम पूर्वक आपकी आज्ञा प्राप्त कर विविध वार्ताओं का परिवर्तन करते कराते वे स्वकीय निवास स्थान में आये और उन्होंने लब्धावसर में बाग-विषयक घटना से राजा साहिब को सूचित किया। साथ ही इस बात का भी उद्घाटन किया कि कतिपय दिन में बाग में एक योगी ठहरा हुआ है। जिसके समस्त लक्षण मृतकराज कुमार के लक्षणों से सम्बन्ध रखते हैं। सम्भव है उसी की कृपा दृष्टि से यह बाग इस भूतपूर्व अवस्था में पहुँचा हो। क्यों कि इस घटना का हमने सावधानतया अन्वेषित करने पर भी अन्य कारण कोई उपलब्ध नहीं किया है। यह सुनकर राजा कुछ विस्मित और अधिक आनन्दित होकर कह उठा कि प्रातःकाल होते ही मैं स्वयं उधर चलूँगा। एवं देखूंगा तुम्हारा कथन कहाँ तक सत्य है। प्रातःकालिक उद्देश्य में निर्णीत होकर वे लोग स्वकीय कृत्य में संलग्न हुए। इधर राजासाहिब आज बहुत दिनों के बाद विस्मृत वृत्तान्त पुत्र का स्मरण कर वैमोहिक अगाध समुद्र में निमग्न हुआ अनेक भावों में परिणत होने लगा। पुत्र के प्राण हरने के अनन्तर आज पर्यन्त जो समय व्यतीत हुआ था उसमें कुछ-कुछ लक्षण ऐसे भी दीख पड़े थे जिन्हों से राजासाहिब को राणी के विषय में सन्देह होने लगा था। वह कभी-कभी निश्चय कर बैठता था कि सम्भव है यह सब विपरीत जाल विस्तृत हुआ है। जिसमें वृद्ध हुए मेरा नाश ही नहीं हुआ है बल्कि संसार के इतिहास में मैं कलंकित प्रसिद्ध हो चुका हूँ। जन्मारम्भ से ही पुत्र के शुभ लक्षण देख कहाँ तो मुझे उसके द्वारा संसार में अपनी कीर्ति विस्तृत करने की आशा थी कहाँ इस दुष्टा की मिथ्या पटूक्तियों से भ्रमित हो मैं अद्वितीय कलंकित निश्चित हुआ। मैं सब कुछ जानता हुआ भी अनजान बन गया। मैंने नहीं सोचा था कि मेरी यह इन्द्रिय लोलुपता कभी शान्त अवस्था भी धारण करेगी। और यह दुष्टा सदा के लिये मेरी प्रिय पात्र न रहेगी। हाय पुत्र कृष्ण ! जनसमाज मोहन विषय में तू सचमुच ही कृष्ण था। जिस इस दुष्टा के मोहान्धार से आच्छादित हो मैं तेरे साथ इतना बड़ा अनर्थकारी अन्याय कर बैठा यह भी तेरे बपु सौन्दर्य को देखकर अपने आप में न रह सकी। केवल मेेरे वा मेरे कुटुम्ब के लिये ही नहीं समस्त भारत के लिये तू एक विचित्र वस्तु था। तेरी छबी और असाधारण लावण्यता के ऊपर देशी लोग भी मोहित हुए बिना न रह सके। तेरे साथ अपनी पुत्री और भगिनियों का विवाह करने के लिये उनके भेजे हुए दूत नित्य मेरे द्वार पर खड़े रहते थे। हाय पुत्र कृष्ण ! तू आज सजीव होता तो मैं कितने ही राजामहाराजाओं का माननीय बन जाता और उन लोगों की पुत्री वा बहिनें आज मुझे पिता की तुल्य दृष्टि से सत्कृत करती। हाय पुत्र कृष्ण ! तूू मेरे घर में क्या बनने के लिये अवतरित हुआ था और किस दशा में परिणत हुआ। तेरा वह बपु सौन्दर्य, जिसके कारण से यदि आज तू जीवित होता तो मैं अनेक प्रधान धरानों का सम्बन्धी बन जाता, समस्त पृथिवी में विलीन हो गया। उसके साथ ही मेरा वह कष्ट उठाना भी, जो मैंने तेरी प्राप्ति के लिये अनेक सुदूरवर्ती तीर्थों की यात्रा में भ्रमित होकर उठाया था, धूलि में मिश्रित हो गया। तेरी उपलब्धि के निमित्त किये गये असाधारण दानपुण्य तो व्यर्थ हुए ही सांसारिक इतिहास स्थिति पर्यन्त महाकलंककटीका मेरे मस्तक पर चढ़ गया। हाय पुत्र कृष्ण ! अब मैं तुझे कहाँ देखू और क्या करूँ। अपनी इस तीक्ष्णखंग से इस दुष्टाचारिणी का शिर उडा दूँ तो मुझे दो हत्याओं का सामना करना पड़ेगा। हे भगवन् ! अच्छा होता यदि आपकी इतनी कृपा होती। संसार में या तो यह पापाचरणी जन्म ही न लेती वा इसका मेरे साथ कोई सम्बन्ध ही न होता। हाय पुत्र कृष्ण ! मैं तेरे जैसे पुत्र को प्राप्त हो कर भी आज दोनों लोकों से भ्रष्ट हो गया। इति। पाठक ! स्मरण रखिये इस प्रकार का प्रलापात्मक निश्चय कर राजा क्रोधावेश से दन्त कटकटाता हुआ राणी को अपराधिनी ठहराने के लिय जब उसके पास जाता था तब वह अपनी चातुर्योक्यिों से फिर उसको प्रशान्त कर देती थी। विशेष करके अपने अपराध की साक्षी के लिये वह प्रमाण मांगती थी। यही कारण था दृढ़ प्रमाणभाव से महाक्रोधित हुआ भी राजा राणी को यमलोक पहुँचाने की उपेक्षा कर अपने दंदह्यमान हृदय को किसी प्रकार शान्त कर लेता था। परन्तु इस शोक सन्ताप ने महाराजा शालिवाहन का हृदय घुण प्रणष्ट लकड़ी की तरह जरजरी भूत बना डाला था। जिससे राणी की प्रतिष्ठा अब उसमें किंचित् भी अवकाश न पा रही थी। इधर जिस प्रकार राजा की प्रीति उससे दूर होेने लगी थी उसी प्रकार राणी की मुखकान्ति मन्द होती आ रही थी। क्योंकि उसको प्रथम तो राजा का अपने विषय में विमुख होना खटकता था। दूसरे इससे वह यह भी निश्चय करती थी और महा भयभीत होती थी कि राजा मेरे विषय में जो घृणित हो गये हैं इससे मालूम होता है इन्होंने मेरे अनर्थ जाल का यथार्थ भेद पा लिया है। तीसरे वह अपने दुष्टाचरण से करा बैठने वाली हत्या के पाप से मन ही मन में उसको याद कर प्रतिदिन क्लेशित रहती थी। बल्कि सच पूछिये तो उसके मुखारविन्द पर झिलकने वाली इसी पाप हेतुक मलीनता को देखकर राजा के चित्त में सन्देह होने लगा था और वह अनुमान करता था कि सम्भव है यह सब इसी की रचना है। जिसमें इसका अन्तःकरण साक्षी होने के कारण उस पाप को याद रखती हुई यह इस दशा में परिणत होती जा रही है। तथापि वह दृढ़ प्रमाणाभाव से वा उभयानर्थ भय से छुरी कचरे वाली दशा का अवलोकन करता हुआ किसी प्रकार समय व्यतीत कर रहा था। आज बहुत दिनों के अनन्तर प्रिय पुत्र का अमृतमय स्मरण हृदय में उपस्थित हुआ। विशेष करके योगी का दृश्य प्रिय पुत्र के समान सुनकर वह महान् आनन्दित हुआ और उसके चित्त में योगी के दर्शन करने की अत्यन्त उत्कण्ठा उत्पन्न हुई। खैर अनेक संकल्प विकल्पात्मक समुद्र में निमग्न हुए उसने वह रात्री बड़ी ही कठिनता के साथ व्यतीत की। अन्धकार और प्रकाश का पारस्परिक युद्ध होेने लगा। प्रकाश से पराजित हो अन्धकार जिस प्रकार संकुचित होता जा रहा था उसी प्रकार अपना विस्तार करता हुआ जा रहा था। ऐसा होते हुआ ते विजयलक्ष्मी पूर्णतया प्रकाश के हस्तगत हुई। यह देख प्रकाश स्वामी सूर्यनारायण की अभ्यर्थना के लिये पक्षी चूँ-चूँ शब्द की मधुर ध्वनि करने लगे। जिसने नेत्रावरूद्ध निद्रक राजा को दिनागमन की सूचना दी। राजा उठा और स्नानादि क्रियाओं के अनन्तर नित्यकृत्य पूजा पाठ में प्रवृत्त हुआ। परं आज इन्द्रियराज के वहाँ नहीं होने से राजा केवल अपना नियम ही पूरा कर सका। इतने ही में उधर से राजकीय प्रधान पुरुष मन्त्री महाशय भी उपस्थित हुए। राजा उनके साथ बाग की शोभा और योगिराज के दर्शन करने के लिये वहाँ से चला और कुछ ही देर में ज्यों ही बाग के समीप पहुँचा त्यों ही उनकी यथार्थ उक्ति का उसको ठीक प्रमाण मिल गया। यह देख इस विषय में असन्दिग्ध हो वह सीधा चैरंगीनाथ के समीप गया। तथा स्वोचित उपायन प्रणामादि से आपको सत्कृत कर अनुकूल दिशा में विराजमान हुआ। विराजमान ही नहीं बल्कि आपका दर्शन कर महा मोहान्धकार में डूब गया। कितनी क्षण बीत गई वह चुप हुआ प्रस्तर प्रतिमा की तरह निरन्तर दृष्टि से आपकी ओर देखता रहा। लज्जा हेतु से अत्यन्त कठिनता के साथ रोके हुए भी प्रेमाश्रु बलात् बहिर हो राजा के सूक्ष्मांचले को प्लावित करने लगे। आज पुत्र ध्यान के अतिरिक्त सांसारिक किसी भी वस्तु का उसे ध्यान नहीं था। उसका मन यह साक्षी देकर, कि सचमुच यह वही मेरा राजकुमार है, उसके साथ हठात् छाती से छाती मिलाकर मिलने के लिये अधीर हो रहा था। बल्कि ऐसा करने के लिये राजा ने कईकए बार उठकर आगे बढ़ना चाहा। परं किसी प्रकार अपने उद्भूत हृदय बेग को उसने रोक ही लिया। उसकी रुकावट का जो भी कुछ कारण था वह यही था कि मन्त्रियों की तरह वह भी इसी बात में सन्दिग्ध हुआ कि जब पुत्र के हस्त पैर छिन्न कर दिये गये थे तो उनका फिर तादृश होना सम्भव कैसे हो सकता है। अतएव अन्य दृश्य तथा वाणी से अपना पुत्र होने का निश्चय उपस्थित होने पर भी एक इसी सन्देह ने उसके दृढ़ विश्वास नहीं होने दिया। यही कारण हुआ वह अधिक देर तक अपनी अत्यन्त खिन्न दशा का परिचय देकर किसी प्रकार अपने हृदय में धीरता धारण करता हुआ प्राकृत विषय की ही वार्ता करने लगा। अर्थात् उसने कहा महात्माजी मैं आपसे निष्कपट हृदय से सत्य कहता हूँ आज संसार में इतने बड़े साम्राज्य का अधीश्वर होकर भी जितना मैं दुःखी हूँ उतना मैं नहीं समझता कोई अन्य पुरुष भी होगा। यह सुन प्राश्निक हुए आपने कहा कि यद्यपि मैं आपकी विचलित दशा को देखकर इस अनुमान के युक्त हो गया था कि आप किसी साधारण दुःख से ग्रसित नहीं हैं और वैसा ही आपने कह भी डाला। तथापि मैं यह स्फुटतया पूछना चाहता हूँ कि जिसने आपकी ऐसी शिथिल स्थिति बना डाली है वह कौन ऐसा दुःख है। प्रत्युत्तरार्थ राजा ने कहा कि महाराज ! यद्यपि मैं इस समय अपुत्र हूँ मेरे लिये एक यही बड़ा दुःख हो सकता है। तथापि इस दुःख से मैं उतना सन्तप्त नहीं जितना कि स्वकीय छोटी राणी के मिथ्या जटिलजाल में जकड़ीभूत होकर पुत्र रत्न की हत्या कर बैठने से हूँ। वह पुत्र जिस रीति से मैने प्राप्त किया था उसको तथा पुत्र के समस्त लक्षणों को देखकर तो मैं अपने हृदय में इस विश्वास को अवकाश नहीं दे सका था कि उसने सचमुच उपमाता को कुत्सित दृष्टि से देखा है। परं राणी की प्रामाणिक पटूक्तियों के पाश से आबद्ध हो मैं इस कलंककारी अनर्थ के कर बैठने में समर्थ हुआ। जिससे भारत मात्र का एक लाल सदा के लिये हमारी दृष्टि के अगोचर हो गया। वह पुत्र होनहार प्रतीत होने पर भी शारीरिक विचित्र सौन्दर्यादि गुणों से जन साधारण के हृदय में प्रसन्नता स्थापित करने वाला था। जिसका रूपरंग आपके दृश्य से बहुत कुछ सम्बन्ध रखने वाला था। उस समय अनर्थ पर उतरे हुए मैंने उसके हस्त पैर छिन्न करा दिये थे। यदि मुझे इस बात में कोई प्रमाण मिल जाय कि वे फिर भी वैसे ही हो सकते हैं तो मैं आपको ही अपना पुत्र समझने में एक क्षण का विलम्ब नहीं कर सकता हूँ। यह श्रवण कर आपने कहा कि हाँ ऐसा हो सकता है एक मनुष्य का शारीरिक दृश्य दूसरे की समता को कहीं न कहीं घुणाक्षर न्याय से प्राप्त कर भी लेता है। ऐसा ही मैं भी हूँगा। परं मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि राणी ने अपने कथन की सत्यता के लिये आपको क्या प्रमाण दिखलाया। तथा जो दिखलाया वह अब भी विद्यमान है वा नहीं। राजा ने उत्तर दिया, यद्यपि भगवान् जानें सत्य था वा कृत्रिम, राणी के शारीरिक दृश्य से तो स्पष्ट प्रतीत होता था कि यह अवश्य किसी मन्मथोन्मत्त मनुष्य का कृत्य है। तथापि मैं उसके उतने ही प्रमाण में निष्ठा न कर जब प्रमाणान्तर मांगने लगा तब दासियों ने भी निशंक भाव से यह स्फुट कह सुनाया कि बात सचमुच ऐसी ही है हमारे देखते-देखते कृष्ण ने इस अनुचित कृत्य में हस्त डाला है। यह सुनकर भी मैं कुछ दिन मौर रहा। और गुप्त रीति से दासियों को सर्व प्रकार का भय दिखलाकर मैंने उनसे पृथक्-पृथक् इस रहस्य की अन्वेषणा की। परं जब उन्होंने अपना प्राण देना उचित समझकर भी अपने सत्य घोषित वचन से वापिस लौटना पाप समझा तब तो विवश होकर मैंने राणी की अरूचि कर भी बात पर विश्वसित हो वह अनर्थ करना ही पड़ा। वे ही दासी अब तक सजीव है। यदि आपकी इच्छा हो तो मैं उनको बुला दूँ। जिन्हों से स्वयं निर्णय कर आप देख सकते हैं कि मैंने जो कुछ किया वह देशकाल के अनुकूल उचित था वा वास्तविक अनर्थ ही। आपने कहा कि यद्यपि हम योगी हैं सदा किसी एक जगह पर स्थित नहीं रहते हैं। दो दिन आपके यहाँ तो चार दिन आगे किसी के कहीं निवास करते-करते देश विदेशों में ही भ्रमण करते हैं। अतएव न तो हम लोगों को सांसारिक मनुष्यों के ऐसे झगड़ों में हस्त डालना उचित है और न हमारी ऐसे झगड़ों में हस्त डालने की कुछ अभिलाषा ही है। तथापि जब आप कहते हैं और इस बात के लिये आग्रह करते हैं तो मैं भी उनसे कुछ परामर्श कर देख लूँ कि उनका कथन कहाँ तक सत्यता पूर्ण है। अतः आप उन्हीं को क्या समस्त राणियों को भी बुला भेजें। जिससे मेरे निरीक्षण में कुछ भी त्रुटि न रह जाय। यह सुन राजा ने शीघ्र सूचना भेजकर राणियों को बाग में बुला भेजा। राजकीय सूचक पुरुष प्रासाद में गया। राणियों में राजासाहिब की आज्ञा प्रचारित की गई। इस पुराणी बात को फिर अंकुरित हुई सुनकर पुत्र गामिनी राणी का भीतर ही भीतर कलेजा कटने लगा। और उसके लिये समस्त संसार जलमय दीखने लगा। वह आज एक बड़े प्रभावशाली राजा की पत्नी होकर भी अपने आपको अकेली समझती हुई महाशोक सागर में डूबने लगी। परं करती क्या आखिर सज्जीकृत शिबिका में सवार हो बाग में चलने के लिये तैयार हुई। इधर कृष्ण की पूज्य माता के पास भी सूचना गई। उसने अनुमान किया कि अक्षर आते जाते योगी बाग में निवास करते ही रहते हैं। किसी से राजा साहिब की इस विषय में कुछ वार्तायें हुई होंगी। जिनमें प्रकरण वश से इस बात की आवश्यकता समझी गई होगी कि फिर गवेषणा की जाय। परं इस विषय में मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। अशल में यथार्थ बात तो यह थी जिस दिन से पुत्र रत्न कृष्ण उसकी छाती से पृथक् कर सदा के लिये नेत्र से दूर ही नहीं हृदय विदारक दशा में परिणत किया गया था वह उसी दिन से उस सपत्नी छोटी राणी से घृणा किया करती थी। आज पर्यन्त न तो कभी उसने उसके साथ वार्तालाप किया और न कभी एक स्थल में सहबास किया था। तथा न ऐसा करने की उसकी कोई आन्तरिक इच्छा ही थी। आज बहुत दिनों के बाद ऐसा अवसर उपस्थित हुआ। उसने सोच लिया कि अवश्य उस द ुष्टा के पास एक जगह पर बैठना होगा। और सम्भव है प्रकरण वश से हृदय की झाल न रूके और उस पापात्मा के साथ कुछ कहना सुनना पड़े। अतएव उसने सूचक को समझा दिया कि मेरी ओर से महाराजाजी को विनम्र भाव से यह कह देना मुझे दीखना तो बन्ध हो ही गया है प्रतिदिन सुनना भी कम होता जा रहा है। ऐसी दशा में मेरा इस विषय में तो कुछ प्रयोजन है ही नहीं यदि महात्माजी के पुण्योपलब्ध पवित्र दर्शनार्थ और अमृतमय उपदेश के श्रवणार्थ ही मैं वहाँ आने का प्रयत्न करूँ तो परमात्मा ने मैं इस योग्य भी न रखी। अतः मेरा वहाँ पर आना व्यर्थ है क्षमा कीजिये। ठीक यही प्रार्थना सूचक ने वापिस जाकर महाराजा शालिवाहन को सुना दी। इसी समय सूचक पुरुष की ओर इशारा करते हुए चैरंगीनाथजी ने कहा कि नहीं उनको जरूर यहाँ आना होगा। यदि कम सुनने और न दीखने की बात का ही अवलम्बन है तो यह सुविधा हम उपस्थित कर देते हैं। लो यह लो हमारी भस्मी ले जाओ इसमें से कुछ तो उनको खिला देना और कुछ नेत्रों के ऊपरी भाग पर देना भगवान् आदिनाथजी की कृपा होगी दोनों समस्यायें हल हो जायेगी। यह सुन समीपस्थ राजा तथा मन्त्री उपमन्त्री लोग भीतर ही भीतर प्रसन्न हुए। और उनको इस अवसर में कुछ अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होने के लक्षण दिखाई दिये। उधर सन्देश वाहक पुरुष भी प्रसन्न हुआ शीघ्र महलों में पहुँचा। और महात्माजी की बतलाई विधि के अनुकूल प्रयोग करने की सूचना पूर्वक वह विभूति उसने राणी के समर्पण की। राणी ने ईश्वर को धन्यवाद दे सादर विभूति ग्रहण कर उसे उसी विधि से कार्यरूप में परिणत किया। बस उसको इसी अवधि तक अन्धकारमय सृष्टि दिखाई देती थी। अब वह अन्धकार पूंज न जाने किधर गया। उसको चारों ओर स्वच्छ शुभ्र प्रकाश दीखने लगा। यह देख वह ईश्वरीय आकस्मिक कृपा का अनुमान कर आभ्यन्तरिक रीति से प्रसन्न हुई। कृष्ण मृत्यु के अनन्तर पुत्र शोक सन्तप्त हृदय वाल उस विचारी का बहुत दिनों के बाद आज कुछ चित्त ठिकाने आया। तथा इस शुभ लक्षण के आधार से वह अपने कुछ सुदिन आने की आशा करने लगी। और उज्जवल कान्ति प्रसन्न मुख से बोल उठी लाओ पाल्की तैयार है तो शीघ्र लाओ। शिबिका प्रथमतः ही सज्जीकृत हुई खड़ी थी। वह आरोहस्थान पर लाई गई। जिसमें सवार हो वह शीघ्र बाग में पहुँची। इस महान् उपकार से उपकृत हुई उसकी अभिलाषा थी कि मैं प्रथम महात्माजी के दर्शनपूर्वक उचित अभ्यर्थना कर अपने ऊपर हुए उसके उपकार का बदला चुकाऊँगी। परं ऐसा न करने देकर वह एक तम्बू में, जो अन्तःपुर रूप से प्रथम ही खड़ा किया गया था, बैठा दी गई। क्यों कि राजा से आपने यह प्रथम ही कह दिया था कि जब तक हम प्रकृत बात का ठीक निर्णय न कर लें तब तक माई लोगों को हमारे स्पष्ट दर्शन से वंचित रहकर पड़दे के अन्तर रहना रहेगा। ठीक इसी आज्ञा के अनुकूल आभ्यन्तरिक प्रणाम तथा शिर झुकाकर वह तम्बू में विराजमान हो गई। जिसका प्रसन्नमुख और दुःसह्य नेत्र ज्योतिः देखकर समस्त राणी और दासी चकित सी हो गई। तथा वह पुत्रघातिनी राणी, और उसकी मिथ्याभाषिणी सहचरी दासी, अपने मन ही मन में अत्यन्त क्षुब्ध हुई। उन्होंने सोचा कि अबके इस अवसर पर बचना कठिन है। जिसने प्रणष्टनेत्र ज्योतिः राणी की दिव्य दृष्टि बना दी उसके लिये हमारा अनिश्ट करने में कौन बाधा हो सकती है। इसी प्रकार के संकल्प विकल्पों में जिस समय वे विलीन हो रही थी ठीक उसी समय आपने अपने एक ऐसे मन्त्र का अनुष्ठान किया जिससे उनके शरीर के कुछ-कुछ पीड़ा होने लगी। अब तो उनके होश और भी ठिकाने आ गये। उनके शरीर में कल्पना उपस्थित हो गई। ऐसी ही अवस्था में आपने कहा कि माताओ ! आप इस बात पर पूर्ण ध्यान रखें यद्यपि उचित मार्ग से भ्रष्ट न होना ही मनुष्य का मुख्य धर्म है। तथापि किसी अदृष्ट प्रतिकूलता के कारण से मनुष्य उस मार्ग पर चलने में भूल भी कर बैठे तो उस भूल को विनम्र भाव से स्वीकार कर लेना भी कम महत्त्व की बात नहीं है। ऐसा करने वाला मनुष्य एकबार भूल जाने पर भी लोक दृष्टि से घृणा का पात्र नहीं बन सकता है। ठीक इसी के अनुकूल जो कुछ बीत चुका है उसका स्मरण न कर अब तो आप सत्य-सत्य कह सुनाने का उत्साह करें। इससे आपकी भूल-भूल के स्थान में नहीं समझी जायेगी। और इससे जो कुछ आपको लाभ होगा वह ऐसा होगा जिससे आपके आज ही से सुदिन आरम्भ हो जायेंगे। परं इतना और स्मरण रखना कि आप यह सोचकर, कि हम प्राथमिक कथन से विपरीत कहेंगी तो हमारा अपराध प्रकट हो जायेगा, और उसके आधार पर राजा न जानें हमको कैसा कठिन दण्ड देगा, कभी मिथ्या न कह बैठना। ऐसा करने से लेने के देने पड़ जायेंगे। यह कहने का प्रयोजन नहीं कि आप इसी जन्म में नरकाधिकारिणी हो जायेंगी। प्रत्युत जन्मान्तरों में भी उससे नहीं बच सकेगी। इसके अतिरिक्त आप यह भी नहीं समझ बैठना कि हमारा गूढ़ रहस्य अभी तक किसी ने भी नहीं जाना है। हमने गुरुजी की कृपा से ऐसी विधि प्राप्त की है जिसके द्वारा मनुष्य का शुभाशुभ कृत्य सहज में ही जाना जा सकता है। अतएव हमने आपके वास्तविक तत्त्व को स्वयं तो समझ लिया है परन्तु हम राजा के और इन सब लोगों के समक्ष आपके मुख से उसको प्रकटित हुआ देखना चाहते हैं। इसके साथ ही एक बात और कह देना उचित समझते हैं। और वह यह है कि हम विवाद के भूखे नहीं है। आपकी प्राथमिक एक वाणी ग्रहण करेंगे बस उसी के ऊपर स्वर्ग नरक निर्भर है। इसलिये आपको उचित है कि आप खूब सोच समझकर जो कुछ वृत्तान्त है सत्य-सत्य कह सुनायें। पाठक ! ध्यान दीजिये यह कहने का प्रयोजन नहीं कि नाथजी जो कुछ कह रहे थे वैसा करके न दिखलाते। अतएव अब उन विचारियों के लिये रास्ता ही कौन रह गया था जिसमें प्रविष्ट हो अपने रहस्य को छिपाती हुई आपत्तियों से सर्वथा वंचित रह जाती। अतएव उन्होंने इधर-उधर की समस्त परिवृत्तियों की उपेक्षा कर सत्य कह देने में ही अपना कल्याण समझा। अर्थात् राणी ने स्पष्ट कह सुनाया कि महाराज निःसन्देह मेरा अपराध है। मैंने अपने इस क्षुद्र शरीर की रक्षार्थ कुवासनाग्रस्त होकर भी सुवासना प्रमाणित करने के लिये विपरीत जाल की रचना की थी। इसी प्रकार दासियों ने भी प्रकटित कर दिया कि भगवन्! महाराणी के भय से अथवा अपनी आजीविका की वृद्धि के हेतु से समझो हमने असत्य भाषण कर इसके कथन का समर्थन किया है। यथार्थ में कुमार का कुछ भी दोष नहीं था। यही नहीं बल्कि वह एक अद्वितीय मातृ भक्त था। इसके हजार छल करने पर भी उसने अपने मुख से माता से अतिरिक्त कोई शब्द नहीं निकला था। और अपने आपको विमुक्त करने के लिये वह बार-बार इसके चरणों में मस्तक लगाता था। जिसका यह व्यवहार देखकर हमारा भी हृदय भर आया। परं अपने आपे में न होने के कारण यह टस से मस न हुई। अन्त में उस विचारे ने किसी प्रकार इससे विमुक्ति पाई। यह सुन राजा के शरीर में महाक्रोधाग्नि प्रज्वलित हुआ। जो राजा के हजार धैर्य धारण करने पर भी अन्तर छिपा न रह सका। यही कारण हुआ राजा विवश हो खंग हस्त में धारण कर राणी का शिर काटने को दौड़ पड़ा। जिसको मन्त्री लोेगों और आपने बड़ी कठिनता के साथ आसन पर स्थित किया। राजा के इस क्रोधावेश से यद्यपि राणी तथा दासियों की भूमि पीली हो गई थी। और उनका इस भय से प्राण शुष्क हुआ जा रहा था कि राजा किसी प्रकार पड़दे के भीतर तक आ पहुँचे तो उनकी तीक्ष्ण तलवार का वार व्यर्थ न जाकर अवश्य हमारे दो खण्ड कर डालेगा। तथापि उनके चित्त को धैर्यावम्बित करने के अभिप्राय से आपने कहा कि राजन्! आप जो भी कार्य करेंगे वह हमारी आज्ञा के प्रतिकूल नहीं करने पायेंगे। अतएव आप इस विचारियों के ऊपर इतना क्रोध न करें। इनका कोई अपराध नहीं उस अभागे के ललाट में ऐसी ही रेखायें पड़ी थी जिनके अनुकूल उसने ऐसी कठिन आपत्ति का सामना करना अवश्य ही था। सो हो चुका उसके विषय में किसी प्रकार के प्रायश्चित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। परं यह ध्यान रखिये सच्चे मनुष्य का सदा ईश्वर सहायक रहता है। ऐसे मनुष्य का अनिष्ट करने के लिये कोई सहस्रों क्या लक्षों लक्षों क्या करोड़ों उपाय करे तो भी उसका बाल तक बांका नहीं कर सकता है। इस बात के प्रमाण भूत हमारे इस पवित्र भारत में अनेक प्रल्हादि महानुभावों के प्रसिद्ध होने पर भी मैं आज आप लोगों की दृष्टि पथ के ऊपर विराजमान हूँ। मैं सच्चा और अधिक सच्चा आपका वही पुत्र कृष्ण हूँ। जिसको हस्त पैरों से रहित करा कर भी आपने कुछ सुखी समझा होगा। जिस कारण से उसको कूए में प्रक्षिप्त करने की आज्ञा प्रदान की गई। परं मैं सच्चा था, यही कारण हुआ इतना करने पर भी आपका प्रयत्न सफल न हुआ। मैं करूणावतार जनोद्धारक योग मूर्ति गुरुगोरक्षनाथजी की कृपा से फिर वैसा ही हो गया। बल्कि वैसा ही नहीं हुआ मैं उस दर्जे तक पहुँचा हूँ जहाँ मुझे फिर कभी ऐसे दुःख का अनुभव नहीं करना पड़ेगा। बस अधिक से अधिक राजा ने आपकी उक्ति यहीं तक श्रवण की। उसने सहसा आसन से उठकर आपकी ग्रहणतार्थ धावा किया। और आपको दोनों हस्तों से पकड़कर उन्मत्त की तरह पड़ गया। वह भी व्यावहारिक लज्जा का विस्मरण कर राजा से वंचित रहे आपके अंग को छाती से लगाती हुई प्रेम मूच्र्छा से राजा की सदृश ही अचेत हो गई। अये ईश्वर ! तेरी रचित सृष्टि में पुत्र भी एक विचित्र वस्तु है। नहीं जानते आपने यह वस्तु कितने मूल्य की बनाई है। जिसके अभाव में विस्तृत साम्राज्य भी किम्प्रयोजन समझा जाता है। हम ज्यों ही संसार में दृष्टि डाल कर देखते हैं त्यों ही क्या दरिद्र धनाढ्य क्या राजा क्या महाराजा क्या मण्डलेश्वर सब ही इस वस्तु के लिये तेरी अभ्यर्थना करते रहते हैं। और इसके प्राप्त होने पर ही अपने यथोपलब्ध साम्राज्योपभोग पर्यन्त को सफल समझते हुए भी स्वकीय जीवन चय्र्या को सार्थक मानते हैं। प्राप्त होने पर भी सौभाग्य यदि वह पुत्र सर्व लक्षण सम्पन्न हो तो माता-पिता के आनन्द की सीमा ही क्या हो सकती है। खैर इस विषय में हम अधिक नहीं कहना चाहते हैं। संसार में पुत्र के ऊपर जब पशु-पक्षी भी हमको अपने शरीर तक न्यौछावर करते दीख पड़ते हैं तब मनुष्य के पुत्र प्रेम की पराकाष्ठा कहाँ तक हो सकती है यह अनुमान द्वारा ही जानने योग्य है। अथवा जिन पाठक महाशयों को पुत्रोपलब्धि का सौभाग्य मिला है वे स्वयं इस रहस्य से परिचित होंगे। इसी रहस्य में विलीन सपत्नीक महाराजा शालि वाहन आज संसार सागर को आनन्दसागर समझकर उसमें डूब रहे थे। इस प्रकार उसको अपने आपे में न देखकर व्यावहारिक लज्जा उसके शरीर से प्रस्थान कर चुकी थी। यही कारण था वह युद्ध प्रवृत्त तितरों की तरह पुत्र से ग्रंथित हो उपस्थित जनता की ओर से सम्भवित होने वाले उपहास्य की किंचित् भी परवाह न करता था। एवं स्वकीय मुख से कुछ भी शब्दोच्चारण न कर केवल प्रेमाश्रुओं से स्वीय सूक्ष्म वस्त्र और नाथजी के शरीर को प्लावित कर रहा था। उसकी यह दशा देख उपस्थित जनता भी अपने हृदय को वश में न रख सकी। उसका समुद्र पूरकी तरह विस्तृत हृदय अपने प्रेमाश्रु रूप तरंगों को शरीर से बहिर फैंकने लगा। इधर वृक्षों का भी यही समाचार था। वे सूक्ष्म वर्षा के कारण से जल प्लावित पत्रों से बिन्दु छोड़ते हुए ऐसे प्रतीत होते थे मानों ये स्वयं भी प्रेमाश्रुपात कर जनता का अनुकरण कर रहे हैं। इधर पक्षिगण क्षेत्रों के लिये उड्डीयमान होकर इस भाव को प्रकटित करते थे मानों वे इस प्रेमाधिक्य को सह नहीं सकते थे। यही कारण था अब बाग में चूँ तक का भी शब्द नहीं होता था। राजकीय मर्यादा से मौन धारण किये हुए प्रजाजन अश्रुपात द्वारा राजा का अनुकरण कर रहे थे। यह दृश्य बड़ा ही विचित्र और हृदय ग्राही था। लगभग दो घड़ी पर्यन्त महाराजा शालिवाहन उसी अचेत दशा में स्थित रहे। अन्त में स्वयं कुछ संज्ञोपलब्ध होकर राणी को प्रबोधित करने लगे। वह सचेत हुई और चाहती थी कि पुत्र से कुछ वार्ता कर प्रथम इसकी उस विषम स्थिति से परिचित हो जाऊँ। परं अभी तक उसके सौ प्रयत्न करने पर भी मुख से बोल न निकलता था। पूज्य माता की यह दशा देखकर आपने कहा कि मात ! आपने मेरे विषय में इतना सीमा भंजक शोक नहीं करना चाहिये। जिससे आपका शरीर ही केवल कृशता को प्राप्त नहीं हुआ है आपके नेत्र भी अपना कार्य समाप्त कर बैठे हैं। जिससे आपको जीवित दशा में ही मृतक की तरह समय व्यतीत करना पड़ा है। जब कि मैं रघुकूल भूषण श्रीरामचन्द्रजी के हस्त स्थापित श्रीरामेश्वर भगवान् के प्रसाद से आपको प्राप्त हुआ था तब आपने निःशोक होकर यह विश्वास रखना चाहिये था कि न तो मेरा पुत्र ऐसे कुत्सित कृत्य में प्रवृत्त हो सकता है। और न ऐसी अविचार प्रयुक्त बाधायें उसका बाल तक बांका कर सकती हैं। यह सुन माताजी ने करूणा स्वर से किसी प्रकार शब्दोच्चारण कर कहा पुत्र ! तू जानता है परमात्मा ने स्त्री जाति को बहुत कुछ मृदु हृदय वाली बनाया है। जो शोकप्रद छोटे से छोटा भी अभिनय उपस्थित होने पर यह उसको अपने अधिकार में नहीं रख सकती है। यही कारण हुआ मैं सब कुछ सोचती हुई भी उस अभिनय को देख दुर्दशा ग्रस्त हुए बिना न रह सकी। इसके अनन्तर आपने, अच्छा ईश्वर जिस दशा में रखे उसको उसी दशा में धन्यवाद देना चाहिये अब तक जो कुछ हुआ सो तो हो चुका उसके विषय में आपको कुछ भी विचार न होना चाहिये अब तो आपको यही उचित है कि आप सामयिक नियमानुसार ईश्वराधन तथा अनेक दान-पुण्यों में दत्तचित्त होकर अपना आगमिक मार्ग स्वच्छ बनायें, यह कह कर अपनी मौसी और दासियों को मिलने के लिये समीप बुलाया। वे आई और आपका यथोचित सत्कार कर सम्मुख बैठ गई। आपने अपने अमृतायमान उपदेश से उनके उत्तप्त हृदय को शान्त किया। तदनु अनेक राजपुरुष अपने-अपने प्रेम की पराकाष्ठा दिखलाते हुए आपको सत्कृत करने लगे। ठीक ऐसी ही दशा में महाराजा शालिवाहन ने किसी प्रकार खड़े होकर यह घोषित कर दिया कि राजकर्मचारिगण ! आपके अधिनायक आज आपके हस्तगत हो गये हैं। आज से ही आप मेरी आशा छोड़ कर इन्हों को अपना शिरताज महाराजा स्वीकृत कीजिये। मैं अनर्थकारी होने के कारण इस भार को ग्रहण न करता हुआ ईश्वराराधन में तत्परता करूँगा। जिससे इस जन्म निष्ठ अनर्थकारित्वरूप टीके को अपने मस्तक से उतारकर जन्मान्तर में इस भार ग्रहण के योग्य हो सकूँगा। यह सुन महाराजा शालिवाहन की राजाकार्यों की ओर से दृढ़ घृणा देख कर मन्त्री लोग तो चुप रहे। परं आपने कहा कि राजन् ! यद्यपि आप अज्ञानता के कारण अनर्थ कर बैठे और उसकी निवृत्ति के लिये आपकी अत्युत्कण्ठा भी है, तथापि मैं नहीं समझता कि वह अज्ञानता आपका अब तक भी पीछा छोड़ गई है। यही कारण है आप फिर दूसरा अनर्थ करने के लिये प्रोत्साहित हो गये हैं। आपका यह अनर्थ, कि मुझे राज्यभार ग्रहण करने को बाध्य करना, उससे किसी प्रकार की कम नहीं है। बल्कि कहूँ तो कह सकता हूँ कि यह अनर्थ उससे कहीं अधिक महत्त्व रखता है। कारण कि आपके उस अनर्थ से तो मेरा कुछ भी न बिगड़ा है। प्रत्युत उस पद तक पहुँच गया हूँ कि मैं चाहूँ तो आपको उस अनर्थकारित्व से ही मुक्त नहीं कर दूँ बल्कि भारत में आपको एक यशस्वी पुरुष प्रसिद्ध कर दूँ और आपके कथनानुसार यदि मैं राज्यभार को ग्रहण कर लूँ तो आप तो उस दोष से वंचित रह ही नहीं सकते हैं मैं भी अपने गम्य कल्याणप्रद मार्ग से भ्रष्ट हो जाऊँ। मेरा ऐसा हो जाना आपके और मेरे दोनों के लिये ही हानिकारक है। अतएव आप फिर इस उद्देश्य से कोई शब्द मुख से न निकाल बैठें। इस पर राजा ने कहा खैर क्षमा कीजिये मैंने ऐसा कह कर भूल प्रदर्शित की आप ऐसा न करें इसमें कोई आपत्ति की बात नहीं। परन्तु मैं और आपकी माता आपके वियोग में किसी प्रकार भी नहीं रह सकते हैं। अतएव हम दोनों बाणप्रस्थी हो आपके साथ वन-पर्वतों में निवास करते हुए उस पाप परिहार के लिये प्रायश्चित करेंगे। ये लोग अपने राज्य को संभालें और उसका प्रबन्ध करें हमारा उससे कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि आप मुझे ऐसा न करने के लिये बाध्य करें तो वह ठीक नहीं। कारण कि पुत्र तो कोई है ही नहीं। मैं कुछ वर्ष में जब इस लोक की यात्रा समाप्त कर बैठंूगा तब भी तो इन लोगों ने ऐसा करना ही पड़ेगा। इससे उचित यही है कि ये लोग मुझे आज ही अवकाश दे दें जिससे मैं अपने अभीष्ट को प्राप्त कर सकूँगा। इस पर आपने कहा कि खैर मरना तो अवश्यम्भावी हैै। राजकीय प्रवृत्ति मंे तो किसी प्रकार इसका निवारण हो ही नहीं सकता है। यदि इसी बात की अत्यन्त उत्कण्ठा हो कि मैं वह उपाय प्राप्त करूँ जिससे मेरा बार-बार मरण तथा जन्म न हो तो मेरी ओर से आप आज ही वनोवासी होते अब हो जायें ऐसा करने के लिये आपको धन्यवाद है। परं पुत्र न होने के कारण से तथा मेरे साथ किये गये अन्याय के उद्देश्य से आप बाणप्रस्थी धारण करते हो तो कृपा कीजिये आप वैसा न कर इसी अवस्था में जहाँ तक हो सके ईश्वराराधन तथा विशेष दान पुण्य से अपना मार्ग स्वच्छ कीजिये यह पुत्राभाव की त्रुटि तो आपकी मैं दूर कर देता हूँ। लीजिये कुछ तो गुरु का प्रसाद रूप यह भस्मी है, इसको आप खाना और मेरी छोटी माता को खिलाना। इसके अतिरिक्त जिस कूप में मैं डाला गया था उसका जल मंगाकर कुछ दिन व्यवहार में लाना। ऐसा करने से आपको एक-दूसरे कृष्ण की प्राप्ति होगी। वह जिस दिन जन्म ग्रहण करे उस दिन उक्त पापी की निवृत्त्यर्थ एक महायज्ञ का आरम्भ करना और उस उपलक्ष्य में अपने नाम का सम्वत् प्रचलित कर देना। इस कृत्य से आप न केवल उस पाप का निवारण कर सकेंगे प्रत्युत संसार में अपनी कीर्ति स्थापित कर सकेंगे। और इस कार्य में आप अवश्य कृतकृत्य होंगे। यह सुन महाराजा शालिवाहन किसी प्रकार सन्तुष्ट हो गये। उपस्थित जनता ने अपूर्व हर्ष ध्वनि की। आपकी माता के साथ-साथ उपमाता भी, जो कि राजा की तिर्यग् दृष्टि से दीन दशा में अपने दिन व्यतीत करती थी, आज से अपने फिर उसी राणी के पद पर अभिषिक्त हुई समझ कर आनन्द में निमग्न हुई। अधिक क्या इस उद्देश्य से समस्त नगर में ही नहीं राज्यभर में मंगल मनाया गया। तदनन्तर कुछ दिन के निवास द्वारा पूज्य माता का हृदय शीतल कर फिर मिलने का वचन दे आपने वहाँ से सादर प्रस्थान किया।
इति श्रीचौरंगीनाथ शालिपुर आगमन वर्णन ।

1 comment:

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