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जाग मचिन्दर गोरख आया I

श्रीमद् योगेन्द्र गोरक्षनाथजी के विमल कमलोपम हृदयात्मक स्थान में स्वकीय अद्भुत शक्ति के विश्वास का तथा गुरुभक्ति का अपरिमित अटल साम्राज्य ...

Saturday, July 13, 2013

श्रीनाथ पर्यटन वर्णन

पाठक ! स्मरण रखिये आचार्य श्रीमद्योगेन्द्र गोरक्षनाथजी विक्रम सम्वत् 24 में द्वारका निष्ठ योगि संघ के मध्य में दूरंगतनाथजी को दण्ड विधि समझाकर प्रस्थानित हो गये थे। आप यवन जातीय अजपानाथ योगी के सहित समुद्र तटस्थ प्रदेशों में भ्रमण करते हुए हिंगलाज पर्वत पर पहुँचे। यहाँ कुछ दिन विश्राम कर फिर गान्धारादि देशों में पर्यटन करने लगे। और अपने अमृतायमान उपदेश से जन साधारण को पवित्र करते तथा उनका चित्त स्वकीय मोक्षमार्ग की ओर आकृष्ट करते हुए कुछ काल में शलेमान पर्वत पर गये। यहाँ अजपानाथजी के कतिपय शिष्य अपने-अपने शिष्यों को योगवित् बना रहे थे। उन्होंने ज्यों ही आचार्यजी तथा स्वकीय गुरुजी को अकस्मात् आते हुए देखा त्यों ही कुछ पादक्रम अग्रसर हो आप महानुभावों का उचित रीति से स्वागतिक सत्कार किया। यह देख श्रीनाथजी ने उनको प्रत्यभिवादन से प्रोत्साहित करते हुए कहा कि महानुभावों ! आज मैं आप लोगों के इस अनुष्ठित कृत्य को देखकर महान् आनन्दित हुआ अपने आप में फूला नहीं समाता हूँ। तथा इस बात से परिचित हो गया हूँ कि जो मनुष्य किसी भी जाति को नीचोच्च की दृष्टि से देखते और उसके साथ वैसा ही नीचोच्च का व्यवहार करते हैं वे निःसन्देह मन्द बुद्धि और विचार शून्य हैं। क्यों कि कोई भी जातिमात्र कभी नीच वा उच्च कोटि की नहीं बन सकती है। यद्यपि संसार मात्र में आज आर्य जाति सबसे उच्च और उत्तम कोटि में गिनी जाती है तथापि हम उसके प्रत्येक मनुष्य कम नहीं हैं जो स्वोचित कृत्य से पदच्युत कृत्यों की पराकाष्ठा दिखलाते हुए यवनों से भी आगे बढ़ जाते हैं। इसी प्रकार आर्य जाति की तिर्यग् दृष्टि की पात्र यवन जाति के भी प्रत्येक मनुष्य को हम तदनुकूल तिरछी दृष्टि से नहीं देख सकते हैं। इसमें कतिपय मनुष्य ऐसे हैं जो मनुष्योचित वास्तविक कितने ही कृत्यों में आर्यों से आगे बढ़ जाते हैं। इस बात में प्रमाण की अन्वेषणा करने के लिये कहीं दूर जानेे की आवश्यकता नहीं आज आप लोग हमारी दृष्टि के सम्मुख ही खड़े हैं। आप लोगों ने योगवित् बनकर दूसरों को तद्वत् बनाते हुए न केवल श्रीमहादेवजी की आज्ञा का पालन किया है बल्कि अपने आपकी अक्षुण्ण स्वच्छ कीर्ति स्तम्भ को संसार मात्र में स्थापित कर दिया है। इससे हम आप लोगांे को सप्रीति हार्दिक धन्यवाद देते हैं। और आशा रखते हैं कि आप लोग इस कृत्य से कभी उपरामी न होकर अनवरत संलग्न रहेंगे। यह कहकर आपके शान्त होने के समकाल में ही वे लोग सशिष्य आपके चरणों में मस्तक स्पर्शित करने लगे। तथा कहने लगे भगवन ! हम लोगों ने न तो कुछ किया ओर न कुछ करने योग्य ही हैं। आपकी कृपा दृष्टि ही ऐसी अमोघ है जिसने हमको अपनी और आकृष्ट कर आज आपके ये अमृतमय वचन श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त किया है। हाँ इतना अवश्य है आपकी इस अमोघ भविष्यवाणी को सुनकर आज हम लोगों को पूर्ण विश्वास हो गया है कि हमारे ऊपर आपकी कृपादृष्टि कम नहीं है। अतएव आज तक नहीं आया तो भविष्य में वह एक दिन अवश्य आने वाला है जिसमें हम लोग आपके कथनानुसार संसार में अवश्य अपने कीर्तिरूप स्तम्भ को प्रतिष्ठित कर सकेंगे। उनका यह औत्साहिक कथन सुनकर आपने उसका समर्थन किया और उनको आन्तरिक आशीर्वाद प्रदान कर अजपानाथजी से विदा होने की आज्ञा मांगी। उसने कहा कि स्वामिन् ! आपको विदा करने के लिये तो मैं और ये महानुभाव सब तैयार खड़े हैं। परं मेरी इच्छा है कि आप प्रथम मुझे ही विदा कर दें। मैं श्रीभगवान् आदिनाथजी की सेवा में उपस्थित हो अलक्ष्य पुरुष को लक्ष्य बनाने का प्रयत्न करना चाहता हूँ। आपके सानन्द मन्द मुस्कराते हुए कहा कि अवश्य आप ऐसा कर सकते हैं। आपने अपना कार्य प्रशस्य रीति से पूर्ण किया है। फिर आपके इस गमन में कोई खास वजह वहीं कि हम रूकावट करें। इस पर प्रसन्न हो अपने शिष्यों को सम्बोधित करते हुए उसने कहा कि मेरा शिष्य वर्ग ! मैं इस बात से कम सन्तुष्ट नहीं कि आपने मेरे उपदेश को अच्छा समझा है। बल्कि समझा ही नहीं दूसरों को समझाकर उसका विस्तार भी खूब कर दिया है। जिसका फल यह हुआ कि आज मैं अपने उत्तरदायित्व से विमुक्त हो कृत कृत्य हुआ कैलास जाने की योग्यतान्वित हो गया हूँ। इतना होने पर भी मैं यह और देखना चाहता हूँ कि मेरे परोक्ष होने पर भी आप लोग इसी सीधे महोन्नतिकारक मार्ग में गमन करते रहें। जिससे मै। अलक्ष्य पुरुष की गोद में बैठा हुआ भी अपने आपको धन्य समझता रहूँ। यह सुन उसके शिष्यों ने चरण स्पर्शित करते हुए सान्तोषिक वाक्य सुनाये। जिन्हों से अत्यन्त प्रसन्न हो हार्दिक आशीर्वाद प्रयुक्त कर अजपानाथजी कैलास के यात्री बने। इधर श्रीनाथजी उन योगियों से सत्कृत होने के अनन्तर प्रस्थानित हो शलेमान पर्वत से पार हुए। जो कटासराज तीर्थ पर होते हुए पांचाल देशीय ’ एक पर्वत पर पहुँचकर कुछ काल के लिये विश्रामित हुए। यहाँ तक की यात्रा में सुखिराम और सूर्यमल्ल नाम के दो मुमुक्षु जन आपके हस्तगत हुए थे। आप उनको दीक्षित करने में दत्तचित्त हुए। कुछ काल व्यतीत हुआ। वे योगक्रियाओं में आत्यन्तिक निपुणता प्राप्त कर सके। और समाधि प्रकार को भी खूब समझ गये। यह देख आचार्यजी ने उनको योगवित् बना देने पर भी कदाचित् अवसरोपयोगिनी आस्रिक विद्या में भी चतुर किया। अनन्तर दोनों शिष्यों को दैनिक समाधि करते रहने की आज्ञा प्रदान कर कुछ काल के लिये स्वयं समाधिनिष्ठ हो गये। आप वैक्रमिक सम्वत् 50 से 100 तक अर्थात् पचास वर्ष तक समाधिनिष्ठ रहे। पश्चात् सूर्यनाथ ’ पवननाथ अपने इस दोनों शिष्यों तथा अन्य आगन्तुक योगियों के सहित आप उत्तरा खण्ड की ओर प्रस्थानित हुए। और कुछ ही दिन में हिमालय की उपत्यका के समीप जा पहुँचे। यहाँ एक ’ ग्राम के निकट आपने अपना पड़ाव डाल दिया। और दूध लाने की अनुमति दे अपना एक शिष्य ग्राम में भेजा। वह गया और दूध के लिये उसने ग्रामीण लोगों कसे याचना की। उन्होंने उसका हास्य करने की अभिलाषा से अंगुलिका निर्देश करते हुए कहा महाराज ! उस सम्मुखीन गली में अमुक नाम का ब्राह्मण है उसके यहाँ बहुत दूध होता है। साथ ही वह साधुओं का भक्त भी है। कोई भी अवसर हो अकस्मात् साधु आ निकलै तो इच्छानुसार दूध पिलाता तथा भोजन कराता है। यह सुन वह योगी नाम पूछता हुआ उसी ब्राह्मण के गृह आंगण में जा पहुँचा और देखा तो वह ब्राह्मण इस दशा में पाया कि उसके पास केवल एक धोती थी। जिसको कभी-कभी उसकी एक मात्र सहायक ब्राह्मणी धारण कर लेती थी। तथा कभी-कभी ब्राह्मण करता था अर्थात् भिक्षावृत्ति के लिये ग्राम में जाने के अवसर में ब्राह्मण शाटिका धारण करता और ब्राह्मणी गृह में नग्न बैठी रहती थी। उसके आने पर भोजन बनाने आदि के अवसर पर जब उसको ब्राह्मणी धारण करती तब ब्राह्मण गृह में नग्न बैठा रहता था। उनकी यह दशा देखकर पवननाथजी का हृदय भर आया। तथा साथ ही प्रसन्न भी हुआ। उसने सोचा कि लोगों ने जो मेरा हास्य किया है इसका गुरुजी के सम्मुख वर्णन करूँगा। जिससे सम्भव है गुरुजी इसकी ओर कृपादृष्टि डालेंगे। और यह हास्य इसके लिये लाभदायक हो जायेगा। ठीक हुआ भी .... । जब वह महानुभाव किसी गृहान्तर से दूध लेकर गुरुजी की सेवा में पहुँचा तब उसने लोगों का हास्यवृत्तान्त श्रीनाथजी के श्रोतगत किया। वे तत्काल ही ब्राह्मण के घर पहुँचे। और उसको कह सुनाया कि लोगों ने हमारा इस प्रकार से हास्य किया है। अतएव हम तेरे घर से दूध ही नहीं पीवेंगे बल्कि तुझे इस ग्राम का माननीय शिरोमणि बना देंगे। लो यह विभूति इसको गृहाँगण और कोठे में प्रक्षिप्त कर देना। कुछ देर के अनन्तर कोठे में तो प्रभूत धन और रूचिकर वस्त्र प्राप्त होंगे। संध्या होने पर बहुत सी गौ तुम्हारे इस आंगण में आयेगी।  तुम  गौओं के आते ही दूध निकालने लग जाना। हम ठीक उसी अवसर पर आयेंगे। और दूध पीये पिलायेंगे। यह सुन ब्राह्मण आपके चरणों में मस्तक लगाकर अभ्यर्थना करने लगा। और बड़े ही विनम्र भाव से कृतज्ञता प्रकट करते हुए उसने विभूति को सादर ग्रहण किया। तदनु श्रीनाथजी तो आपने आसन पर आ विराजे। ब्राह्मण के जैसा करने पर तैसा हुआ। अभी सायंकाल होना तो बाकी ही था प्रथम ही मांगलिक ध्वनि होने लगी। ग्राम्यलोग ब्राह्मण को अपूर्व वस्त्र तथा आभूषण धारण किये इधर-उधर फिरता देख समझ गये कि ईश्वर ने इसका भाग्य पलटने के लिये ही हमसे हंसी कराई है। अथवा ठीक है जब ईश्वर किसी को कुछ देता वा उसके ऊपर प्रसन्न होता है तब ढोल नहीं बजाता है कि मैं इस प्रकार वा इस समय तुझे कुद प्रदान करूँगा वा तेरे ऊपर प्रसन्न हूँगा। किन्तु उसके ऐसा करने के लिये अनेक रास्ते हैं। ठीक यही उदाहरण आज हमारी दृष्टि के सम्मुख विराजमान हैं। लोगों में इस प्रकार की वार्ता होते हुए और सुनते सुनाते यह वृत्तान्त समीपस्थ अन्य ग्रामों तक विस्तृत हो गया। यह सुनते ही प्रत्यक्ष निश्चय करने के वास्ते अनेक नर-नारी इधर दौड़ने लगे। और पूर्व दृष्ट दरिद्री ब्राह्मण को सचमुच इस अवस्था में देख महाश्चर्य से ग्रसित हुए। इतने ही में ऊपर से सायंकाल भी आ पहुँचा। श्रीनाथजी के वचनानुकूल अनेक ग्रामीण गौ रूपान्तर युक्त हुई ब्राह्मण के गृहाग्र चैक में आकर एकत्रित होने लगी। देखते-देखते चैक गौओं से परिपूर्ण हो गया। वत्स दूध से तृप्त हो-हो कर अपनी माताओं के मुखाग्र प्रदेश में खड़े हुए थे। जिनको जिव्हा से चाटती हुई गौ अपूर्व प्रमोद प्रकट कर रही थी। वह ब्राह्मण स्वयं दूध निकालता और निकलवाता श्रान्त हो गया परं समस्त गौ दोहने में न आई। बल्कि यहाँ तक हुआ कि उन गौओं का दूध स्वयं स्तनों से निकल पृथिवी पर गिरने लगा। इतने ही में उधर से समण्डालिक श्रीनाथजी भी आ गये। और अपने ब्राह्मण से कहा लो पात्र इसको पूर्ण कर सब महात्माओं को दूध पिलाओ। तदनन्तर यदि इच्छा हो तो ये उपस्थित सेवक लोग भी पी सकते हैं जिन्होंने इस योगी के दूध मांगते ही पात्र भरपूर कर प्रथम हमको पिलाया था। यह सुन समस्त वे लोग जिन्होंने हास्य किया था लज्जित से हो आपके पादस्पर्शी हुए प्रार्थना करने लगे कि भगवन् ! क्षमा कीजिये हम लोगों को आप जैसे महात्माओं का सत्संग पर्याप्त नही ंमिला है इसी कारण से हम लोगों की यह दशा है। तदनु श्री नाथजी ने, अच्छा अब इस सत्संग से विरहित न रहोगे, यह कहते हुए शालिपुर (श्यालकोट) की तरफ प्रस्थान किया। और नगर की कुछ दूरी पर उत्तर दिशा में अपना आसन स्थिर किया। यह स्थल महाराजा शालिवाहन ने अपने सैनिक घोड़ों के घास के लिय अवरूद्ध किया हुआ था। इसमें विविध प्रकार के आरण्य पशु-पक्षी निवास करते थे। तथा कई छोटे-छोटे तालाब और एक कूप भी इसमें विद्यमान था। जिससे वर्ष भर में केवल उतने ही दिन तक जल निकलता था जब तक कि घास की कटाई रहती थी। ठीक इसी कूप से जल लाने के लिये आपने अपने शिष्य पवननाथजी को उधर भेजा। वह गया और जल निकालने के लिये कूए में पात्र पाशा। पात्र के जल पर पड़ने पर उसको कूप पातित एक मनुष्य ने पकड़ लिया। यह देख योगी चकित सा होकर पूछने लगा कि तू किस अभिप्राय से यहाँ रहता है तथा किस उद्देश्य से तूने पात्र को आश्रित किया है। इसके उत्तरार्थ उसने अपनी जीवन चय्र्या को प्रस्फुट करना आरम्भ किया। तथा कहा कि मैं इसी नगर के राजा महाराज शालिवाहन का पुत्र हूँ। ’ कृष्ण मेरा नाम है। मैं एक दिन आहूत हुआ उपमाता के प्रासाद में गया था। वह मुझे देखकर विमोहित हो गई। और अपनी कुबासना पूरी करने के लिये मुझसे विशेष आग्रह करने लगी। इतनी होने पर भी जब मैंने किसी प्रकार पाप समुद्र में डूबना न स्वीकार किया तब उसने अपने चरित्र का विपरीत अर्थ घोषित कर पिताजी के हृदय को विक्षिप्त कर दिया। जिसका फल यह हुआ कि मैं बध्य समझा जा कर घातकों के समर्पित किया गया। वे लोग मेरे हस्तपाद काटकर इस कूंए में डाल गये। बस उसी दिन से मैं यहाँ पड़ा किसी प्रकार समय व्यतीत करता हूँ। और गुरुगोरक्षनाथजी का ध्यान कर कभी यह भी निश्चित कर लेता हूँ कि शायद किसी दिन वे मेरी इस दैन्य दशा पर दृष्टि डालेंगे। क्यों कि उनके अवतार का उद्देश्य ही मेरे जैसे दीन पुरुषों का उद्धार करना है। अतएव आप कौन हैं इस बात का परिचय दें। क्या आप कोई परदेशी हैं कि इसी नगर के, यदि परदेशी हों तो इस बात का पता लगा सकते हो कि आजकल गुरु गोरक्षनाथजी किस ओर विचरते हैं। अथवा मेरी इस दीन दशा की सूचना समीप पहुँचा सकते हो तो मैं अपना जीवन आपका प्रदान किया हुआ समझूँगा। यह सुन पवननाथजी ने कहा कि ठहरो इन सब बातों का निर्णय हम अभी कर देतें हैं। अतः वह अवलम्बित रज्जु को उसी प्रकार छोड़कर शीघ्रता के साथ गुरुजी के समीप आया। और उसका आद्योपान्त समस्त वृत्तान्त उनको सुनाया।  दीनोद्धारक दयाद्र्र हृदय श्री नाथजी अत्यन्त प्रफुल्लित हुए अविलम्ब के साथ ’ कूप पर गये। और उसको बहिर निकालकर अपने शरीर से स्पर्शित करते हुए कहने लगे बेटा हम तेरे हस्त-पैर फिर तादवस्थ्य कर देते हैं यदि इच्छा हो और अपने ऊपर फिर आपत्ति आने की तुझे सम्भावना न दीख पड़ती हो तो वापिस जाकर अपुत्र हुए महाराजा शालिवाहन को फिर सपुत्र बना सकता है। पाठक ! जैसी कुछ उसके साथ बीती थी आप उस घटना से अपरिचित नहीं है। अतएव अधिक क्या कहें आप इसी से समझ लिजिये श्रीनाथजी के अनेक युक्तियुक्त वाक्य सुनकर भी उसने वापिस लौटना स्वीकार न किया। अन्ततः श्रीनाथजी ने अच्छा बेटा यदि यही बात है तो हमने तुझे न केवल हस्तपादों से ही पूर्ण बना दिया है बल्कि योगतत्त्व परीक्षा में पूर्ण बना देंगे, यह कहते हुए उसको अपनी मण्डली में सम्मिलित कर लिया और वहाँ से गमन कर आप काश्मीर देशस्थ श्री अमरनाथजी के पर्वत पर गये, ठीक इसी जगह पर आपने उसको योगवित् बनाया। अनन्तर यहाँ से प्रस्थानित हो फिर भारतीय नीचे प्रान्तों में आकर भ्रमण करने लगे। और कतिपय वर्षों के पश्चात् भ्रमण करते हुए अनेक प्रान्तों को पारकर चीनदेशीय पिलांग टापु में पहुँचे। यहाँ आपकी पूर्व निर्मापित गुहा थी उसमें कुछ दिन के लिये आप विश्रामित हुए। यहाँ एक कार्य ऐसा आपकी दृष्टिगोचर हुआ जिसका अनुष्ठान करना आपने उचित समझा और वह कार्य था इस देशीय राणी को सन्तुष्ट करना। वह कतिपय वर्ष से आपके पूजा ध्यान में विशेष दत्तचित्त रहती थी। उसका मुख्योद्देश्य था आपके शिष्य पूर्णनाथ को अपना सहवासी बनाना। कारण कि वह अभी तक कुमारी बैठी हुई किसी कारण से उसी पर अवलम्बित थी। आपने इस झगड़े का फैसला कर देने के अभिप्राय से राजधानी की ओर गमन किया। और उससे कुछ दूरी पर अपना आसन स्थित कर स्वकीय प्रिय शिष्य चैरंगीनाथ को भिक्षा प्रदान कर योगियों को विशेष सत्कृत किया करती थी। क्यांे कि जिस दिन उसने यह सुना कि अद्वितीय सुन्दराकृति मेरा निश्चित वर कृष्ण योगी बना अभी तक सजीव ही है उसने उसी दिन से यह कृत्य आरम्भ किया था। साथ ही जिन ज्योतिषियों ने उसको पूर्ण के सजीव रहने का पता दिया था उन्होंने उसके समस्त लक्षण भी वर्णित कर राणी के हृदय में बैठा दिये थे। अतएव वह आगन्तुक योगियों में उन निर्दिष्ट चिन्होंका निरीक्षण भी किया करती थी। आज अकस्मात् ईश्वर के प्रेषित किये हुए वे महानुभाव भी नगर में आ प्रविष्ट हुए।  तथा लोगों के निर्देशानुसार राणी के प्रासाद में पहुँचे। अलक्ष्य शब्द को सुनकर नित्यनियमानुसार वह कैसी भिक्षा रूचिकर है यह पूछने के लिये नीचे उतर आई। बस देखते ही उसने उसका परिचय पाने में कुछ भी देर न की। और अत्यन्त प्रसन्नता के साथ अपने प्रासाद के ऊपर ले गई। उसने सोचा था कि आप मेरी अभिलाषा पूरी करने के लिये ही यहाँ आये हैं। परं इतने ही में आपने कह सुनाया कि गुरुजी भी मण्डली के साथ यहीं विराजमान हैं अतः उनके लिये शीघ्र भोजन ले जाना होगा। अच्छा है यदि अविलम्ब से ही तैयार हो जाय तो मैं ले जाकर उनकी आज्ञा पालन कर सकूँगा। यह सुनकर राणी ने इस अभिप्राय से कि इनकी उन्हों से भिक्षा मांगकर लाऊँगी, अनेक प्रकार के भोजनों सहित श्रीनाथजी की सेवा में प्रस्थान किया। अधिक क्या भोजनान्त में किसी प्रकार से वे राणी के ऊपर प्रसन्न हो गये। और अनुचित कृत्य होने पर भी प्रिय शिष्य को राणी के साथ जाने की उन्होंने आज्ञा प्रदान कर दी। तदनन्तर आप तो देशान्तर के लिये रवाने हो गये। राणी प्रवृद्धानन्द से अपने आप में फूली न समाती हुई स्वकीय प्रासाद मंे आई। प्रधान पुरुषों को विज्ञापित करते हुए उसने घोषित किया कि नगर सजाया जाय और अनेक प्रकार के दान पुण्य किये जायें। आज्ञा प्रचारित हुई, सब कार्य यथावत् होने लगे। सूर्य भगवान् अस्ताचल का अतिथि बनने के लिये उत्कण्ठित हुआ। उसका तेज संहृत होने के साथ-साथ वायु में शीतलता मिश्रित होने लगी। पक्षिगण दैनिक आहारवृत्ति से निवृत्त हुए अपने-अपने आवास स्थानों में आ आकर विविध स्वर से मधुर कलोल करने लगे। ऐसी ही दशा में अपने ही मन मन कल्पित प्रिय पति पूर्ण के साथ राणी का उस शीतल वायु के सेवन करने का मनोरथ हुआ। और वह यतिबरजी के साथ ले महल की उत्तम भूमि पर चढ़ी। बस अब तक ही राणी का कल्पित सुहाग वर्तमान था। नाथजी ने अपने मुक्त करने का यही अवसर उचित समझा। तथा गुरुपदिष्ट उदान वायु का निरोध कर प्रासाद भित्ति पर बैठे हुए आपने जिस क्षण में राणी की दृष्टि से अपने को वंचित देखा उसी क्षण में शरीर को आकाशधारी बना लिया। इस कृत्य से आप ज्यों ही भित्ति से कुछ दूर हुए त्यों ही राणी ने इधर देखते ही आपके गिर जाने के भ्रम से पकड़ने के लिये आगे हस्त बढाये। प्रिय पति के ग्रहण से लालायित हुई उसने अपने गिरने का कुछ विचार न किया। बस उसके पैर दिवाल से भ्रष्ट हो गये। वह अत्यन्त वेग के साथ नीचे गिरी और ऐहलौकिक यात्रा समाप्त कर गई। यह देख कुछ देर पहले जहाँ-जहाँ नगर में मांगलिक कृत्य हो रहे थे वहाँ घोर उदासीनता का साम्राज्य स्थापित हुआ। (अस्तु) चैरंगीनाथजी ने उसको अग्रिम जन्म में अभीष्ट पति मिलने का आशीर्वाद प्रदान कर आकाश गति से प्रस्थान किया। और कुछ देर में आप अन्य ग्राम सीमान्तर्गत विश्रामित हुए गुरुजी के समीप पहुँचे। तथा जो कुछ वृत्तान्त बीता था सब आपने गुरुजी के सम्मुख प्रकट कर दिया। इससे श्रीनाथजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसको अपनी उरःस्पर्शता से सत्कृत करते हुए कहने लगे कि बेटा तू संसार सागर से पार होने की अभिलाषा से हमारा आश्रय ग्रहण कर चुका था। अतएव यह नहीं सोच बैठना कि हमने तुझे राणी को प्रदान कर फिर उसी सांसारिक सागर में प्रक्षिप्त करना उचित समझा था। किन्तु उसकी प्रार्थनानुसार उससे तेरा मिलाप करा देना उचित समझ कर भी हमारे हृदय में यह दृढ़ विश्वास हो गया था कि जिस मनुष्य ने जिस कार्य के न करने में अपने शरीर तक के जाने की परवाह न की हो वह मनुष्य उस कार्य के करने में कभी उत्सुक नहीं होगा। अतएव हमारे विश्वास को पूरा कर तुम बहुत कुछ वस्तुओं के अधिकारी बन गये हो। परं यह बतलाइये राणी के लिये कुछ कृपा दृष्टि की है वा नहीं। उसने उत्तर दिया कि स्वामिन् ! पति के लिये उसने इस विषयक दशा का अनुभव करना पड़ा है। अतः मैं उसको ईप्सितपति प्राप्त होने का आशीष दे आया हूँ। श्रीनाथजी ने इसका समर्थन कर वहाँ से प्रस्थान किया। और भोट (भुट्टान) आदि अनेक देशों में भ्रमण करते हुए आप कुछ काल के अनन्तर कालिकोट (कलकत्ता) में आये। तथा अपने पूर्व वैश्रामिक स्थान पर आसन स्थिर कर कुछ दिन के लिये यहाँ ठहर गये। अन्त में सब योगियों को, हम कुछ काल पर्यन्त दाक्षिणात्य देश का भ्रमण कर योग प्रचार का निरीक्षण करेंगे तुम लोग भी अपने-अपने अभीष्ट स्थानों में जाओ समय-समय पर सामाधिक दशा में परिणत होते रह कर भी प्रचार कार्य में भाग लेते रहना, यह आज्ञा प्रदान कर पूर्णनाथजी को आपने सूचित किया कि बेटा तुझे एक बार अपनी राजधानी में जाना होगा। तेरी वृद्धा माता तेरे वियोग से नेत्र हीन हुई भी तेरी उस दुर्दशा का सदा स्मरण रखती हुई न मरी न सजीव है। जब कि तू हमारी कृपा का पात्र और इसीलिये अनेक सिद्धियों का भण्डार बन चुका है तब तेरी माता की यह दुरवस्था उसके नहीं तेरे दुःख के लिये समझनी चाहिये। अतएव तू जा और उसको अधम मार्ग में लटकती हुई को किसी उचित ठिकाने पर स्थापित कर आ। यह सुन सबने आपकी आज्ञा पालन की और अपने-अपने मार्ग पर पदार्पण किया।
इति श्रीनाथ पर्यटन वर्णन ।

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