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जाग मचिन्दर गोरख आया I

श्रीमद् योगेन्द्र गोरक्षनाथजी के विमल कमलोपम हृदयात्मक स्थान में स्वकीय अद्भुत शक्ति के विश्वास का तथा गुरुभक्ति का अपरिमित अटल साम्राज्य ...

Wednesday, May 8, 2013

श्री गहनिनाथोत्पति वर्णन


तदनन्तर श्री मत्स्येन्द्रनाथजी वहाँ से प्रस्थान कर चन्द्रगिरि ग्राम में आये। वहाँ ग्राम की कुछ दूरी पर एक स्वच्छ तालाब था उसके ऊपर एक वृक्ष के नीचे आपने अपना आसन स्थिर किया। तथा वहाँ एक मास निवास कर गोरक्षनाथजी को अपनी अवशिष्ट सर्व क्रियाओं में निपुण किया। साथ ही, वातास्त्र, जलदास्त्र, कामास्त्र, वाताकर्षणास्त्र, पर्वतास्त्र, वज्रास्त्र, नागास्त्र, ब्रह्मास्त्र, रुद्रास्त्र, बिरक्तास्त्र, दानवास्त्र, देवास्त्र, कालास्त्र, कार्तिकास्त्र, सर्पास्त्र, विभक्तास्त्र, मोहनास्त्र, मायास्त्र, आग्नेयास्त्र, धूम्रास्त्र, इत्यादि आस्त्रिक विद्या में भी सकुशल किया। इसी हेतु से वहाँ मत्स्येन्द्रनाथजी की बहुत ख्याति हो गई। कितने ही सज्जनभक्त प्रतिदिन वहाँ आकर योग क्रियाओं का अभ्यास किया करते थे। क्योंकि उनका अवतार ही परोपकार के लिये हुआ था। अतएव वे यह नियम नहीं रखते थे कि सांसारिक पुरुष को योगसाधनीभूत क्रियायें न सिखलायें और जो सचमुच ही हस्त में भिक्षा पात्र धारण कर पृष्ठानुयायी हो जाय उसी ही को सिखलाये। किन्तु जो इन क्रियाओं का अत्यन्त जिज्ञासु हुआ सप्रीति इनके सीखने में प्रवल उत्साहित होकर उनके शरण आता था उसी को योग क्रियाओं का कुछ मर्म शिला देते थे। क्यों कि उनकी, अनधिकारी बहुत मनुष्यों को बाना दे कर अपना वेष बढ़ायें, यह वार्ता स्वप्न में भी रूचिकर नहीं थी। (अस्तु) इसी प्रकार जनों को योगोपदेश करते-करते एक मास व्यतीत हुआ। एक दिन का वृतान्त है नगर के छोटे-छोटे अनेक बालक अपना खेल कूद करते हुए उसी तालाब पर आये और उन्होंने वृक्ष के नीचे बैठे उक्त महात्माओं को देखा। तत्काल उनके समीप आ गये और आदेश-आदेश कर उक्त योगेन्द्रों के चैतरफ बैठ गये। महात्माजी भी बालकों के साथ सप्रेम वार्तालाप करने लगे। ऐसा करने से बालकों का महात्माओं के साथ अच्छा परिचय हो गया। इसी क्रम से वे बालक प्रतिदिन आकर क्रीडारत हुए अपना समय व्यतीत किया करते थे। एक दिन मत्स्येन्द्रनाथजी शौचार्थ भ्रमण करते हुए कुछ दूरी पर वन में चले गये। आसन पर केवल एकाकी गोरक्षनाथजी ही बैठे हुए थे। ठीक उसी समय बालक भी वहाँ आ उपस्थित हुए और अपने खेल के लिये तालाब से आद्र्र मृत्तिका निकाल कर उसके उष्ट्र, अश्व, मनुष्य बनाने लगे। परन्तु किसी-किसी ने तो कुछ तादृश प्रतिमा निर्मित की। अधिकों से अनेक बार उनका अनुकरण कर ने पर भी जब तादृश मूर्ति न बनी तब तो व्यर्थ प्रयत्न समझकर उन्होंने वह कृत्य छोड़ दिया। इसी प्रकार कुछ क्षण खेल कर उन लड़कों ने परस्पर में कहा कि अहो ठीक है चलो मृत्तिका ले चलें। महात्माजी से मूर्ति बना देने की प्रार्थना करेंगे। तत्काल ही जिन्हों से मूर्ति न बनी थी उन सब लड़कों का एकमता हो गया और मृत्तिका लेकर वे गोरक्षनाथजी के समीप वृक्ष के नीचे जहाँ उनका आसन था वहाँ उपस्थित हुए। और सविनय चरणों में सिर झुकाकर आदेश-आदेश के अनन्तर गोरक्षनाथजी के चरण पकड़े हुए कहने लगे महाराज, गुरुजी, इस मृत्तिका का एक मनुष्य बना दो। यह सुन गोरक्षनाथजी उनको बहुत समझाया कि यह खेल अच्छा नहीं है कोई अन्य खेल किया करो। परन्तु बालत्व भाव से उनको यह वार्ता रूचिकर न हुई और बार-बार कोमल वाणी द्वारा कहते ही रहे कि मनुष्य बनादो-बनादो। तब तो बालकों का दृढ़ पे्रम देखकर गोरक्षनाथजी को उनके विषय में दया आ गई और कहा कि अच्छा हम आज अवश्य बनाकर रख देंगे। रात्री को शुष्क हो जायेगा फिर कल के दिन तुम ले जाना। अब सायंकाल होने को आया है अतः अपने-अपने गृह पर चले जाओ। यह सुन बालक तो अपने गृह पर चले गये। उधर गोरक्षनाथजी ने उस मृत्तिका का मनुष्याकार पुतला बनाकर रख दिया। समग्र रात्री रखा रहने से वह पुतला शुष्क हो गया। इधर मत्स्येन्द्रनाथजी ने गोरक्षनाथजी से कहा कि बेटा प्रातःकाल हो गया है शौच स्नानादि से शीघ्र निवृत्त हो कर आजा। आसन पर रहना, पश्चात् हम जायेंगे। तत्काल ही गुरु आज्ञानुसार शौचादि से निवृत्त होकर जब गोरक्षनाथजी आसन पर आ बैठे तो मत्स्येन्द्रनाथजी सानन्द घूमते हुए अतीव मनोहर वन वृक्षमाला को देखते-देखते हुए कुछ दूरी पर चले गये। ठीक इसी अवसर पर गोरक्षनाथजी अद्वितीय बैठे हुए थे। तत्काल ही उक्त लड़के भी क्रिड़ारत हुए वहीं आ गये और गोरक्षनाथजी से कहने लगे कि हे महाराज हमारा मनुष्य दीजिये। यह सुन गोरक्षनाथजी ने उत्तर दिया कि हाँ अभी देते हैं कुछ क्षण शान्ति करो। इसके अनन्तर आपने आसन पर बैठ गुरु ध्यानपूर्वक संजीवन मन्त्र पाठ किया। जिसके समाप्त होते ही मृत्तिका निर्मित मार्तिक पुतले में दैवगत्यनुसार करभाजन नारायण के सूक्ष्म शरीर का संचार हो गया। तत्काल ही वह पुतला सचमुच बालकों की सदृश रोने लगा। यह देख अब लड़के भयभीत होने लगे और आभ्यन्तरिक भाव से कहने लगे कि यह अकस्मात् क्या हुआ। बहुत क्या कहें उस समय लड़के बहुत विस्मित हुए भागने की राह देख रहे थे। अन्ततः उन से वहाँ पर अधिक समय तक न रहा गया और वे भूत रे भूत-भूत कहकर ग्राम की ओर हस्त बजाते हुए भाग गये। यह देख ग्रामीण लोगों ने पूछा कि अरे लड़कों क्यों भागते हो क्या बात है ? तब फिर लड़कों ने पूर्ववत् ही कहा कि भूत रे भूत-भूत। लोगों ने कहा भूत कहाँ है ? हमको बतलाओ। लड़के कहने लगे कि वह जो तालाब पर महात्मा बैठा है उसके पास है। लागों को भी कुछ आश्चर्य जैसा वृत्त मालूम हुआ। अतएव चलो चलकर देखेंगे, यह कहकर कतिपय मनुष्य वहाँ गये और उन्होंने देखा कि एक बच्चा अपने पैरों के अंगुष्ठों को चुम्बता हुआ अपने मधुर-मधुर रोदन की ध्वनि सुना रहा है। यह देख लोग अतीव विस्मित हुए आभ्यन्तरिक भाव से विचार कर रहे थे कि यह क्या विचित्र घटना हुई। इस महात्मा ने मृत्तिका का मनुष्य कैसे बना डाला अथवा ठीक है ईश्वर की दुर्विज्ञेय माया है। उसी की कृपान्वित हो बड़े-बड़े पुरुष जीवन मुक्ति का आनन्द लेते हुए और हम जैसे इस असार संसार के अन्यथा झगड़ों में व्यग्रचित्त हुए विषय भोग के कीटों को अपनी अद्भुत शक्ति तथा कृपालुता का परिचय देते हुए विरक्त भाव से विचरते रहते हैं। तादृश ही ये महात्मा है। हमारा धन्य भाग्य है जो आज हमको ऐसे योगेश्वरों का दर्शन प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार जिस समय संकल्प विकल्प के सागर में निमग्न हुए लोग गोरक्षनाथजी के समीप विद्यमान थे। ठीक उसी समय उधर से सानन्द शौच स्नानादि क्रिया से निवृत्त होकर मत्स्येन्द्रनाथजी भी आ पहुँचे और उन्होंने ज्यों ही दूर से अनेक मनुष्यों को वहाँ पर खड़े हुए देखा तो आप आभ्यन्तरिक रीति से कुछ शंकित हुए, परन्तु आपको वास्तविक समाचार अभी निश्चयात्मक ज्ञात नहीं हुआ था। तब आप ठीक आसन पर आ गये और आपने उक्त बालक को वहीं रोता हुआ देखा तब तो सोच लिया कि ठीक मनुष्यों के संघीभूत होने का यही एकामात्र हेतु था। अनन्तर आप गोरक्षनाथजी से पूछने लगे कि बेटा यह बालक कहाँ से आया है और किसका है। महात्मा जी ने प्रत्युत्तर में समस्त पूर्व वृत्तान्त गुरुजी के चरणारविन्द में नम्रतापूर्वक कह सुनाया। सुनते ही मत्स्येन्द्रनाथजी अतीव प्रसन्न हुए और उन उपस्थित लोगों के समक्ष गोरक्षनाथजी की प्रशंसा करने लगे कि यह हमारा शिष्य बड़ा ही पहुँचा हुआ है। फिर आपने गोरक्षनाथजी से कहा कि बेटा तू जानता ही है हमारी एक स्थान में स्थिति नहीं है। आज यहाँ तो कल वहाँ हैं। अतः ऐसी दशा में हमारे द्वारा इस बच्चे की पालना होनी कठिन तो क्या असम्भव ही है। अतएव इसको किसी सुलक्षणा उत्तमकुलजास्त्री की सेवा में अर्पण कर देना ही अब सर्वथा उचित है। सम्भव है ऐसी कुलिना स्त्री ही इसका सस्नेह पोषण कर इसके भविष्य में सहायता दे सकेगी। इसके अनन्तर सबालक दोनों गुरु शिष्य ग्राम में गये और प्रत्येक मनुष्य से इस बात की जाँच करने लगे कि हम एक बालक देंगे कोई कुलीन स्त्री वाला गृह बतलाओ। यह सुन लोगों ने मधुसूदन नामक एक ब्राह्मण बतलाया। जिसकी पत्नी का नाम गंगा था। वही बड़ी ही शील स्वभाव शुभगुणान्वित पतिव्रता स्त्री थी। ठीक लोगों से विज्ञापित हुए दोनों महानुभाव गृह पूछते-पूछते उसी ब्राह्मण के द्वार पर पहुँचे और उस वृत्तान्त से ब्राह्मण को सूचित करने लगे। मधुसूदन भी उक्त महात्माओं को देखते ही दोनों के चरणों में गिरा। तथा उसने कहा कि भगवन् ! आज आप लोगों का बड़ा अनुग्रह हुआ स्वयं ही गृह पर आकर मुझ दास को अपने पवित्र दश्रन से कृतार्थ किया। अब मैं चाहता हूँ मेरे योग्य जो कुछ सेवा हो आप उसको शीघ्र ही स्फुट कर दें। जिसको बिना ही विलम्ब से अपनी शक्ति के अनुसार पूरी करने के लिये तैयार हो जाऊँ। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी अतीव प्रसन्न हुए तथा कहने लगे कि हमारे समीप यह एक बालक है इसको सादर ग्रहण करके उचित रीति से पालपोष कर इसका भविष्य सुधारो। क्योंकि हम अच्छी तरह जानते हैं तुम एक बड़े सदाचार निष्ठ पुरुष हो। इसी हेतु से हम बालक को अन्य किसी के अर्पण न करके तुम्हारे ही समीप लाये हैं। क्यों कि इस कार्य को पूरा करने के लिये तुम्ही योग्य जान पड़ते हो। इसके बाद ब्राह्मण बोला कि भगवन् ! प्रथम यह बतलाइये यह अत्यन्त छोटा बालक आप लोगों के समीप कहाँ से आया है। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी तो प्रत्युत्तर देना ही चाहते थे परन्तु उनसे भी प्रथम पाश्र्ववर्ती वे लोग, जो आदि से उस वृत्तान्त को अच्छी तरह जान चुके थे, कहने के लिये अग्रसर हुए और उन्होंने ब्राह्मण को समस्त समाचार विदित कराया कि ये बड़े ही शक्ति वाले महात्मा हैं। हमने तो आप पर्यन्त ऐसे पहुँचे हुए महात्मा कहीं भी नहीं देखे हैं। अतः जान पड़ता है ये अवश्य कोई न कोई अवतारी पुरुष हैं। तब तो मधुसूदन ब्राह्मण और भी प्रसन्न चित्त हुआ। तथा ईश्वर की अलक्ष्य विचित्र गति के विषय में सानन्द असंख्य धन्यवाद देता हुआ कहने लगा कि अच्छा महाराज हम अपने प्राणों की तुल्य सस्नेह विधिपूर्वक इसकी पालना करेंगे। क्यों कि आप लोग महात्माओं की कृपा से अन्य सम्पत्ति तो मेरे समीप पर्याप्त थी। किन्तु कोई पुत्र ही ऐसा हमारे निमित्त में अब तक नहीं हुआ था जो कि इस सम्पत्ति का उपभोग करे। ऐसी दशा में यह अकस्मात् जो आप लोगों ने अपनी महती दयालुता का परिचय दिया है यह बड़ा ही महत्त्व का है। यही नहीं आज आप लोगों ने एक होनहार बालक को मेरे लिये प्रदान कर संसार के इतिहास में मेरे नाम को सदा के वास्ते अमर कर दिया है। और पुत्र के मुख दर्शन द्वारा सांसारिक भोगविलास के सफल करने का सौभाग्य प्राप्त कर दिखलाया है। अतः इसे उपकार के लिये आप लोगों को अनेकानेक सधन्यवाद नमस्कार है। यह सुनकर मत्स्येन्द्रनाथजी ने बालक को उसके अर्पण किया और कहा कि मधुसूदन! यह बात तो ठीक है इस बालक के द्वारा जगत् के इतिहास में तेरा नाम चिरस्थायी रहेगा। किन्तु सम्पत्ति विषयक सांसारिक उपभोग विषय में कुछ तेरा भ्रम है। क्योंकि हम अब इस बात को स्फुट ही कर देते हैं तू इधर ध्यान देकर सुने। यह बालक करभाजन नारायण का अवतार है, इसीलिये सांसारिक भोग विलास में यह कभी संलग्न नहीं होगा और विरक्त भाव से समय व्यतीत करता हुआ किसी दिन तुमको ही नहीं असंख्य पुरुषों को अपनी शक्ति तथा महिमा का परिचय देगा और इस मेरे शिष्य गोरक्षनाथ से शिक्षा ग्रहण करेगा। उस समय बड़े-बड़े महेशादि देवता भी तुम्हारे गृह पर स्वयं उपस्थित होते हुए तुमको अपने पवित्र दर्शन द्वारा कृतार्थ करेंगे। बस क्या था मत्स्येन्द्रनाथजी की ऐसी असंभाव्य जैसी वाणी सुनकर मधुसूदन एक बार तो संकल्प-विकल्प के सागर में मग्न हो गया। परन्तु जब उसने पूर्व प्रत्यक्ष घटना का स्मरण किया तब तो वह विश्वासित हुआ महात्माओं के चरणों में गिरा तथा कहने लगा कि भगवन्, बालक को दीजिये आपकी आज्ञानुकूल सर्व कार्य ठीक होगा। अब इसके विषय में अन्य कोई विशेष वार्ता कहनी हो तो कहें। तदनन्तर मत्स्येन्द्रनाथजी ने बालक को ब्राह्मण के अर्पण किया और तुम तन, मन, धन से सस्नेह इसकी सब प्रकार से पालना करते रहना, यह कह साशीर्वाद वचनों द्वारा उसको सन्तुष्ट कर देशान्तर को प्रस्थान किया। इधर जब विधिवत् महात्माओं की विदा कर चुके तब ब्राह्मण-ब्राह्मणी लड़के की सुन्दरता के विषय में मोहित हुए पारस्परिक अनेक वार्तायें करते हुए अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और बार-बार मुख चुम्बन कर लड़के को कभी ब्राह्मणी आपनी गोद में उठाती थी कभी ब्राह्मण अपनी गोद में उठाता था। यही नहीं इस कृत्य से वे अपने आपको अतीव धन्य मानते हुए इस प्रकार के अभिमान में लीन थे कि आज समस्त पृथिवी पर हमारे जैसा कृत कृत्य मनुष्य कोई भी नहीं है। इसी प्रकार लालना करते-करते कतिपय वर्ष व्यतीत हो गये और लड़के का बड़े-बड़े पण्डित लोगों द्वारा शास्त्रोक्त विधि से संस्कार करा गया और वह विद्याध्ययन करने केलिये एक सुयोग्य विद्वान् के अर्पण किया गया। लड़का बड़ा ही सुशील मातापितृभक्त तथा गुरुभक्त था और वृद्ध पुरुषों के सम्मुख प्रतिदिन नम्री भूत होकर रहने वाला था। यही नहीं उसका स्वाभाविक ही यह व्यवहार था कि प्रति दिवस योग्य वृद्ध पुरुषों में बैठकर कोई न कोई एक अच्छी शिक्षा अवश्य प्राप्त करना तथा निजग्राम आगत विरक्तिभाव महात्माओं की यथा साध्य सेवा कर उनसे आशीर्वाद ग्रहण करना। एवं शिव मन्दिरादि देवालयों में भी यथा समय उपस्थित होता हुआ वह लड़का अपनी दृढ़ श्रद्धापूर्वक भक्ति द्वारा अपने होनहारत्व को सूचित करता था। इसी प्रकार करते-करते बारह वर्ष पूरे होने को आये। ठीक उसी समय उधर मत्स्येन्द्रनाथजी ने गोरक्षनाथजी को चन्द्रगिरि ग्राम में जाकर उक्त लड़के को निज शिक्षा देते हुए अपना शिष्य बनाने के लिये सूचित किया। तत्काल ही गुरु आज्ञा प्राप्त कर गोरक्षनाथजी एकाकी उक्त ग्राम में आये और आपने उसी तलाव पर अपना आसन किया। उधर ग्राम निवासी लोगों को नाथजी के आ पहुँचने की सूचना मिली। तत्काल ही नगर के अनेक स्त्री-पुरुष गोरक्षनाथजी के दर्शन करने को आये। और यथाशक्ति भेंट-पूजा उनके अर्पण करने लगे। एवं जब उक्त लड़के ने भी यह सूचना मिली कि वे ही महात्मा आ पहुँचे हैं। तब तो वह अतीव प्रसन्नचित्त हुआ विद्यालय से तत्काल ही स्वकीय गृह में आया। उधर मधुसूदन तथा ब्राह्मणी प्रथमतः ही वहाँ जाने के वास्ते तैयार हो रहे थे। केवल लड़के के ही पाठशाला से आ जाने की बाट देख रहे थे। ठीक उसी समय गृह पर लड़के का आना हुआ। तत्काल ही अनेक प्रकार की भेंट-पूजा लेकर सपुत्र ब्राह्मण-ब्राह्मणी भी महात्माजी की सेवामें उपस्थित हुए। वहाँ जिस समय लड़के ने गोरक्षनाथजी को सम्मुख बैठा देखा तब तो अत्यन्त ही शीघ्रता से अग्रेसर होकर वह अपने माता-पिता से पहले ही गोरक्षनाथजी के चरणों में गिर गया। यह देख गोरक्षनाथजी ने बालक को सस्नेह अपनी गोद में बैठा लिया और कहा किसकी बेटा कार्य में संलग्न है और कैसे अपना समय व्यतीत कर हरा है। जिस विशेष कार्य के लिये तेरा अवतार हुआ है उसका भी कुछ स्मरण है वा नहीं। यह सुन प्रत्युत्तर में लड़के ने कहा कि भगवन्! मेरा इस विषय में जो कुछ कहना है सो व्यर्थ है। क्यों कि जिस विषयक्त मुझे चिन्ता है वह आपसे छिपी नहीं है। यद्यपि उपस्थित इन माता-पिताओं की आज्ञानुसार प्रतिदिन अध्ययनशाला में जाकर मैं कुछ लौकिक विद्या प्राप्त करता हूँ तथापि आपके आगमन होने वाले आज के दिवस के प्राप्त होने की अधिक उत्कण्ठा रखता था। ठीक अब वह इच्छा भी ईश्वर ने पूर्ण की आपके आगमन का यह दिवस भी प्राप्त हुआ। अब आपकी आज्ञा पर ही मेरा भविष्य निर्भर है। यह सुन उपस्थित पुरुष बड़े ही विस्मित हुए और निश्चय करने लगे कि ठीक है यह लड़का अवश्य कोई अवतारी पुरुष मालूत होता है। अस्तु, इसके बाद गोरक्षनाथजी ने मधुसूदन से कहा कि अब इस लड़के को मुझे दे दो। क्यों कि बारह वर्ष की मर्यादा, जो कि हमने इसके तुमको देने के समय करी थी, वह पूरी हो गई है। तब मधुसूदन ब्राह्मण ने कहा कि महाराज, अभी तो यह विद्या पढ़ रहा है जब कुछ विद्या ग्रहण कर विद्वान हो जायेगा तब ले जाना। हमारी तो यही सम्मति है आगे आपकी इच्छा रही जैसा अभीष्ट हो वैसा ही करें। गोरक्षनाथजी ने कहा कि अब तक की तुम लोग भ्रम में पड़े हो। यह लड़का केवल तुम्हारी आज्ञा को शिरोधार्य समझता हुआ तुमको प्रसन्न रखने के लिये ही प्रतिदिन पाठशाला में जाता है और तुम लोगों को विद्या पढ़ता मालूम होता है। यथार्थ में यह विद्या नहीं पढ़ता है यह स्वयं विद्वानों का विद्वान है। इस वार्ता को हम प्रथम ही स्फुट कर चुके हैं। परन्तु आप लोग गार्हस्थ कार्यों में व्यग्र रहते हैं। उस वार्ता को क्यों स्मरण रखते थे। यदि ऐसा न होता तो कभी इसके तादृश होने में तुम कुछ भी सन्देह न करते हुए इस को विद्या भण्डार समझते। तब तो मधुसूदन गोरक्षनाथजी के चरणों में गिरकर अपनी प्रमत्ता के विषय में क्षमा करने की प्रार्थना करता हुआ कहने लगा लीजिये भगवन्! आपका ही लड़का है आप जानते ही हैं हम लोग सांसारिक विषय भोगों के कीट हैं। अतः क्षमा प्रदान करें। इसी प्रकार के वार्तालाप होते हुए सायंकाल आ पहुँचा। प्रातः होते ही गोरक्षनाथजी ने महादेवादि देवताओं का स्मरण किया। तत्काल ही स्वकीय-स्वकीय वाहनों पर आरूढ़ होकर अनेक देवता वहाँ पर उपस्थित हुए। उसी समय सर्व देवताओं की आज्ञानुसार गोरक्षनाथजी ने उस लड़के को निजकुण्डलादि समस्त चिन्हान्वित कर, गहनिनाथ नाम से, प्रसिद्ध किया और एक महोत्सव रचा जिसमें लोगों को नाना प्रकार के भोज्य भी दिये गये थे। इस प्रकार जब कतिपय दिन तक उत्सव होकर समाप्त हुआ तब आगत समस्त देवताओं ने गहनिनाथजी के लिये अपना-अपना आशीर्वाद प्रदान किया और अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर वे स्वकीय स्थानों मो गये। उधर गहनिनाथजी को लेकर गोरक्षनाथजी बदरिकाश्रम में गये और बारह वर्ष की अवधि रखकर उससे भी अपने जैसा कठिन तप कराया और स्वकीय अनेक विद्याओं में निपुण कर जनों को योगापदेश प्रदानार्थ एकाकी भ्रमण की आज्ञा ने स्वयं सानन्द देशाटन के लिये प्रस्थानित हुए कैलास में पहुँचे।
इति श्री गहनिनाथोत्पति वर्णन ।

Monday, May 6, 2013

मत्स्येन्द्रनाथजी गोरक्षनाथ मिलाप वर्णन


श्री मत्स्येन्द्रनाथजी अयोध्यापुरी से प्रस्थान कर शनैः-शनैः विचरते-विचरते अपने समीप में आये सांसारिक दुःखान्वित पुरुषों को योग क्रिया के उपदेश द्वारा दुःखत्रय से विमुक्त करते हुए बंगदेश में पहुँचे। उधर से गोरक्षनाथजी भी भ्रमण करते तथा योगोपदेश रूप दुष्प्राप्य अद्वितीय औषधि द्वारा निजभक्तों को इस असार संसार में होने वाले आध्यात्मिकादि कष्टों से रहित करते हुए उसी बंगला देश में आ निकले। परन्तु एक ही देश में इधर-उधर भ्रमण करने पर भी कुछ ही अन्तर रह जाने से अधिक समय तक उनका सम्मेलन नहीं हुआ। अन्त में एक दिन कनकगिरि, नामक ग्राम में दोनों गुरु शिष्यों का मिलाप हुआ। वहाँ जब गोरक्षनाथ ने मत्स्येन्द्रनाथजी को देखा है उसी समय अपने गुरुजी का दर्शन कर वे इतने प्रसन्न हुए हैं उनकी प्रसन्नता का अनुभव, या तो ईश्वर को है वा, वे ही जानते होंगे। मैं इस विषय में कुछ न सकता हूँ। तथापि अतीव प्रेम से हुए अश्रुपात ने अवश्य यह सूचित किया कि उस समय गोरक्षनाथजी की प्रसन्नता कोई अद्वितीय ही थी। (अस्तु) उधर से समस्त सुगुणान्वित गुरुभक्त अपने परमस्नेही शिष्य को देखकर मत्स्येन्द्रनाथजी की भी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। यही नहीं उन्होंने सप्रीति गोद से लगाकर अतीव रसमयी वाणी से उनका कुशल वृत्तान्त पूछा। तब गोरक्षनाथजी ने कोमल वचनों द्वारा गुरुक्त वाक्यों का उत्तर देते हुए कहा कि स्वामिन्, आपकी महत्ती कृपानुसार मैंने कुशलता से भ्रमण किया है। कहीं किसी समय भी किसी प्रकार का दुःख अनुभावित नहीं करना पड़ा है। इसी प्रकार की वार्तालाप करते-करते भोजन का समय समीप आ पहुँचा। यह देख मत्स्येन्द्रनाथजी ने गोरक्षनाथजी को भिक्षा लाने के लिये सूचित किया। तत्काल ही गुरुजी की आज्ञा मिलने पर गोरक्षनाथजी समीपस्थ कनकगिरि नामक नगर में भोजन के लेने के वास्ते पहुँचे। यह नगर ब्राह्मण लोगों का था। अतएव एक ब्राह्मण के द्वार पर जाकर आपने अलक्ष्य शब्द का उच्चारण किया। उसे सुनते ही एक माई बाहर निकली और एक योगी को द्वार पर खड़ा देख सप्रीति हस्तसम्पुटी किये हुए कहने लगी महाराज! आप कृपाकर यहीं बैठकर भोजन कर लें। यह सुनकर गोरक्षनाथजी ने कहा कि मातः ! आप सत्य कहती हैं परन्तु मेरे गुरु महाराज बाहर आसन पर विराजमान हैं। उनको प्रथम भोजन करा कर पीछे मैं भोजन करूँगा। यही शिष्य का धर्म है गुरु के भोजन किये बिना प्रथम ही शिष्य को भोजन करना उचित नहीं। अतः वहाँ ले जाने के लिये भोजन दे सकती हैं तो दें। यह सुन गोरक्षनाथजी के सौन्दर्य से प्रथमतः ही प्रसन्नता पूर्वक मोहान्वित हुई ब्राह्मणी, देखो परमात्मा की क्या ही विचित्र गति है उसने इसको भी कैसी अपूर्व सुन्दरता दी है, यह विचार करती हुई गोरक्षनाथजी से कहने लगी कि अच्छा महाराज वहीं ले जाओ। परन्तु कृपाकर प्रथम यह तो बतलाओ तुम्हारा नाम क्या है और आप किसके शिष्य हैं। गोरक्षनाथजी ने प्रत्युत्तर में कहा कि मेरा नाम गोरक्षनाथ है और योगिराज श्री मत्स्येन्द्रनाथजी का शिष्य हूँ। तदनन्तर अत्यन्त भक्ति के साथ, बड़े आदि नाना शाक युक्त सप्रेम भोजन लाकर हस्त जोड़े हुए ब्राह्मणी कहने लगी लीजिये महाराज भोजन वहीं ले जाइये। फिर भी कभी दर्शन देना और भोजन ले जाना आपका ही घर है। गोरक्षनाथजी ने भिक्षापात्र पूर्ण करा कर ब्राह्मणी को आशीर्वाद दिया और शीघ्र ही गुरुजी के समीप आकर तथा भिक्षापात्र गुरुजी के आगे रख हस्तसम्पुटी कर कहा स्वामिन्! भोजन कीजिये। एक ही माई ऐसी श्रद्धा वाली मिली जिसने अपने घर से ही पात्र पूर्ण कर डाला। मत्स्येन्द्रनाथजी प्रसन्नतापूर्वक पात्र ग्रहण कर भोजन करने लगे। तथा भोजन के अतीव स्वादिष्ट होने से उसके, विशेष कर के, बडों के विषय में बहुत ही प्रशंसा करने लगे। अर्थात् भोजन करते हुए कुछ सिर को हिलाते जायें और बडे बहुत स्वादिष्ट हैं - बहुत स्वादिष्ट हैं, यह कहते जायें। तब तो गोरक्षनाथजी ने सोचा कि गुरुजी खुलकर नहीं कहते हैं कि बडे और चाहिये परन्तु बार-बार की प्रशंसा से अनुमान होता है गुरु महाराज तृप्त नहीं हुए हैं। अन्ततः गोरक्षनाथजी को कहना ही पड़ा कि गुरु महाराज आज्ञा हो तो और बडे लाऊँ। तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने मन्दवाणी से मुस्कराते हुए कहा कि अच्छा। यह सुन गोरक्षनाथजी भिक्षापात्र हस्त में लेकर फिर नगर में गये और ब्राह्मण के गृह पर पहुँचकर ब्राह्मणी से कहने लगे मातः, गुरुजी की अभी तृप्ति नहीं हुई इसलिये कुछ बडे+ और प्रदान करो। यह सुनते ही ब्राह्मणी ने कहा महाराज मैने प्रथम ही कहा था कि फिर भी कभी आना और भोजन ले जाना यह गृह आप लोग महात्माओं का ही है। तथापि आप गुरुजी के बहाने से बड़े मांगते हुए कुछ असत्य जैसा वचन कहते दीख पड़ते हो। यह मेरे मन का रोचनीय नहीं होता है। क्योंकि मैने अभी आपका भिक्षापात्र पूर्ण किया था जिससे आपके गुरुजी तो अवश्य तृप्त हुए ही होंगे किन्तु तुमने भी भोजन अवश्य किया होगा। तथापि बड़े अतीव स्वादिष्ट होने के कारण तुम्हारा और भी खाने का चित्त किया है इसीलिये पुनः भिक्षा करने आये हो। तब गोरक्षनाथजी ने उत्तर देते हुए कहा कि मातः, मैं सत्य कहता हूँ यह केवल गुरुजी के लिये ही मांग रहा हूँ न कि अपने लिये। मेरा तो नियम ही यह है गुरुजी के तृप्त होने पर भोजन किया करता हूँ। ब्राह्मणी कहने लगी कि यह बात तो वास्तविक ही है ऐसा तो होना ही चाहिये परन्तु आपकी सत्यता में क्या प्रमाण है कि ठीक आप अपने कथनानुकूल ही किया करते हैं। तब गोरक्षनाथजी ने कहा कि जो मेरे वचन विषयक सत्यता की परीक्षा करनी चाहती हो तथा मेरी गुरुभक्ति देखनी चाहती हो तो जिस प्रकार कहो उसी प्रकार उसका परिचय देकर मैं अपने वचन को सत्यतान्वित एवं प्रामाणिक कर सकता हूँ। इसके उत्तर में ब्राह्मणी ने कहा कि अच्छा यदि यही बात है तो तुम गुरुजी के लिये बड़ों को प्राप्त होंगे मैं अभी लाती हूँ परं जब तक मैं लाऊँ तब तक बड़ों के बदले में तुम अपना एक नेत्र निकाल कर रखना। तत्काल ही यह कहकर ब्राह्मणी तो बड़े लेने के लिये गृह में प्रविष्ट हुई। उधर गोरक्षनाथजी ने अपना एक नेत्र निकालकर अपने हस्त में रख लिया। ज्यों ही बड़े लेकर ब्राह्मणी गृह से बाहर आई और उसने गोरक्षनाथजी के नेत्र से रूधिर निकलता हुआ देखा त्यों ही ब्राह्मणी अतीव विस्मित हुई अपने आपको धिक्कार देती हुई कहने लगी कि हाय, मुझे क्या मालूम था ये सचमुच ही ऐसा कर डालेंगे। अहो मैंने यह क्या अकस्मात् अनर्थ कर डाला। तत्काल ही यह कोलाहल सुनकर और भी इधर-उधर के अनेक स्त्री-पुरुष आ एकत्रित हुए और उस वृत्तान्त को जानकर ब्राह्मणी को बार-बार धिक्कार देने लगे कि देखों एक बड़ों के ऊपर ही इस दुष्टा ने अद्वितीय रूपावान् कैसे दिव्य योगी को व्यंगित किया है। क्या इस दुष्टा को ज्ञात नहीं था कि यह साधारण व्यक्ति नहीं है। इसका अपने सत्य के विषय में ऐसा कर डालना क्या बड़ी बात है। यह सनुकर ब्राह्मणी अत्यन्त ही लज्जित हुई हस्तसम्पुटी करके कहने लगी हे महात्मन्, मैं अज्ञात थी इसी हेतु से आपको मैंने अपने वचन द्वारा इतना असह्य कष्ट दिया है। परन्तु अब मेरे ऊपर क्षमा प्रदान करो मैं अपने दुष्कृत्य पर स्वयं ही पश्चाताप करूँगी। यह सुन गोरक्षनाथजी ने जल से नेत्र का रूधिर धो डाला और एक वस्त्र नेत्र के ऊपर लगाकर बड़ों का पात्र पूर्ण करा आप गुरुजी के समीप आये। तब तो मत्स्येन्द्रनाथजी की दृष्टि, जो कि गोरक्षनाथजी एक हस्त द्वारा वस्त्र से नेत्र को आच्छादित कर रहे थे, उधर पड़ी। देखते ही पूछा कि बेटा यह अकस्मात् क्या हुआ अभी तो यहाँ से सकुशल गया ही था। कह-कह सत्य कह क्या वृतान्त है। गोरक्षनाथजी ने कहा कि आप प्रसन्नतापूर्वक भोजन करो मैं पीछे से बतलाऊँगा। मत्स्येन्द्रनाथजी कहने लगे कि नहीं-नहीं जब तक तू सत्य बात बतला नहीं देगा तब तक मैं एक ग्रास भी न खाऊँगा। तब तो गोरक्षनाथजी ने अगत्या कहना ही पड़ा कि आपके लिये जो, ये बडे+ लाया हँू इनके बदले में बड़े देने वाली माई ने गुरुभक्ति देखने के वास्ते मेरे नेत्र देने के लिये प्रार्थना की थी। मैने तत्काल यह अपना नेत्र निकालकर उसके अर्पण किया परन्तु ब्राह्मणी इस वृत्त को देखकर सविस्मय मूच्र्छित जैसी हो गई और फिर यह नेत्र लेना तो दूर रहा, स्वयं अपने आपको धिक्कार देती हुई हाय-हाय देखो मैंने अकस्मात् कैसा अनर्थ कर डाला, यह कहती हुई रोदन करने लगी। और फिर इस विषय में अपनी अत्यन्त प्रमत्ता स्वीकृत कर उसने मेरे से क्षमा करने के लिये प्रार्थना की। तथा पर्याप्त बड़ों से पात्र पूर्ण किया। मैं भी उस पर क्षमा प्रदान कर सानन्द आपके समीप आ पहुँचा। बस यही वृत्त है जो आपके चरणारविन्द में कह चुका हूँ। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी अत्यन्त ही विस्मित हुए आभ्यन्तरिक भाव से कहने लगे कि अहो यह हमारा शिष्य कैसा दृढ़ विश्वासी और गुरुभक्त है। ऐसा अन्य कोई भी आज पर्यन्त हमने देखा तथा सुना नहीं है। यद्यपि तपकरण काल में हमारी आज्ञानुसार छली देवता तथा अप्सराओं का प्रयत्न निष्फल कर इसने गुरुभक्ति विषय का अच्छा परिचय दिया था। परन्तु इस दृष्टान्त से इसने अपने विषय में हमारी प्रीति का मानों प्रवाह चला दिया है। अतः अब हमको उचित है कि इससे कुछ भी गुप्त न रखें। तदनन्तर मत्स्येन्द्रनाथजी ने नेत्र को उसी स्थान में पूर्ववत् स्थापित कर विभूति लगा दी। जिस वशात् नेत्र तादृश ही हो गया। और वे प्रसन्नतापूर्वक सस्नेह उनसे कहने लगे कि बेटा हम तेरे ऊपर अतीव सन्तुष्ट हैं। क्यों कि तू अश्रुतपूर्व पुरुष है। तेरी गुरुभक्ति ने हमारे हृदय को अच्छी तरह वशीभूत कर डाला है। अतः बेटा हम यथार्थ कहते हैं तू बड़ा प्रतापी तथा यशस्वी होगा। यह कहने का प्रयोजन नहीं कि इसी लोक में तेरी ख्याति होगी किन्तु तीनों लोक में तेरी कीर्ति का ढोल बजेगा और बड़े-बड़े देव गण तेरी वन्दना करेंगे। यह कहकर आपने गारेक्षनाथजी का हस्त पकड़ उनको अपने गोद में बैठा लिया और कहा कि बेटा जितनी विद्या मेरे मेरे समीप अब है यह समस्त हम तेरे को प्रदान करते हैं। जिस वशात् संसार में कोई तेरे को किसी भी विषय में पराजित नहीं कर सकेगा। और तू जीवन मुक्त होकर विचरेगा। यही नहीं सर्व सिद्ध समाज में अग्रगणनीय तथा योगि समाज का प्रथमाचार्य तू ही सर्व के सम्मत होगा। अर्थात् इस सम्प्रदाय का प्रवत्र्तक माना जायेगा एवं अपनी इच्छा मात्र से ही जो करना सोचेगा सोई कर भी सकेगा। यह सुन गोरक्षनाथजी गुरुजी के चरणों में गिरे और वद्धांजलि हुए कहने लगे स्वामिन्, आपकी महती कृपा है तो मेरे को इस संसार में कौन वस्तु असाध्य है। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि संसार में जो कोई वस्तु कठिन है तो एकमात्र यही है कि गुरु को प्रसन्न करना। जब मेरा सौभाग्य प्राप्त हुआ कि गुरु प्रसन्न हुए तो बस फिर तो असाध्य शब्द ही निराश्रय हुआ हृदय से प्रस्थान कर जाता है, गोरक्षनाथजी की इस प्रकार सादर कोमल वाणी सुनकर मत्स्येन्द्रनाथजी और भी प्रसन्न हुए और अन्यत्र भ्रमण के लिये वहाँ से प्रस्थानित हुए।
इति मत्स्येन्द्रनाथजी गोरक्षनाथ मिलाप वर्णन

श्री मत्स्येन्द्रनाथजी पशुपति नृप समागम वर्णन


श्री मत्स्येन्द्रनाथजी हिंगलाज से चलकर शनैः-शनैः भ्रमण करते हुए तथा जनों को योगक्रिया रूप अद्वितीय औषध द्वारा इस असार संसार के त्रिविध दुःख से विमुक्त करते हुए कतिपय मास के अनन्तर अयोध्यापुरी में पहुँचे। वहाँ एक पशुपति नामक राजा, जो कि ठीक श्रीरामचन्द्र के वंश में उत्पन्न हुआ था, राज्य करता था। जो श्रीरामजी की गद्दी के ऊपर, अपने आपको कीट की तुल्य समझता हुआ पैर तक नहीं रखता था और श्रीरामजी के उद्देश्य से निर्मित की हुई राजगद्दी के सम्मुख ही नीचे की तरफ एक साधारण आसन पर बैठकर उनकी प्रतिमा का ध्यान किया करता था। एवं इसी कर्म में प्रवृत्त रहकर प्रतिदिन एक प्रहर व्यतीत किया करता था। अस्तु! एक दिन ऐसा हुआ जब कि मत्स्येन्द्रनाथजी भिक्षा के लिये नगरी में गये तब मन्दिर में श्रीरामचन्द्रजी की गद्दी थी, जिसका कि राजा प्रतिदिन दर्शन करने तथा सत्कार करने जाता था। दैव योग से आप उसी मन्दिर के द्वार पर जा निकले। ठीक वही समय राजा के पूजार्थ मन्दिर में आने का था। अतएव राजा साहिब भी वहीं आ निकले और ज्यों ही पालकी से उत्तर कर मन्दिर में जाने लगे त्यों ही मत्स्येन्द्रनाथजी भी उसके पीछे-पीछे मन्दिर में प्रविष्ट होने के लिये अग्रसर हुए। ठीक उसी अवसर में एक राजपुरुष ने पुरःसर हो आपको समझाने के अभिप्राय से कहा कि महाराज अपरिचित पुरुष को मन्दिर में प्रविष्ट होने देना, ऐसी राजा साहिब की आज्ञा नहीं है। अतः आप कृपा कर वापिस लौट जायें। तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि हम रमते राम अभ्यागत योगी हैं। बहुत दूर से भ्रमण करते हुए केवल दर्शनार्थ ही यहाँ आये हैं। इस वास्ते दर्शन करने से हमको रोक रखना आप लोगों को उचित नहीं। यह सुन द्वारपालों ने उत्तर दिया कि हमारे कत्र्तव्य और कल्याण का रास्ता ही यह है कि हम अपने स्वामी की तथा उसके वचन की तन-मन-धन से पालना करें और उसकी आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कार्य न करें। अतः जब उसकी आज्ञा ही यह ऐसी है कि कोई अपरिचित पुरुष मन्दिर में न घुसने पावे तो ऐसी दशा में हमारे लिये कौन ऐसा रास्ता खुला रह गया कि जिसका अनुसरणकर हम आपको मन्दिर में जाने दें। हां हो सकता है यदि शिविका से उतरने के समकाल में ही आप राजासाहिब से इस विषय की प्रार्थना करते और वह आपके अप्रतिहत गति होने की हमको चेतावनी देते तो कोई वजह नहीं हम आपको रोक रखते। परं करें क्या ऐसा तो हुआ नहीं। ऐसी दशा में यदि हम आपको अन्दर प्रविष्ट होने दें तो हमारी खैर नहीं हो सकती। उनके ये युक्ति-युक्त वाक्य सुनकर भी मत्स्येन्द्रनाथजी कुछ मुस्कराये और उनका अपराध उपस्थित करने के लिये आप भीतर ही घुसने लगे। यह देख द्वारपालों का दिमाक गर्म हो गया और उन्होंने कहा कि उये भिक्षुक, उचित रीति से समझाने पर भी दिय आप नहीं मानते हैं तो हमको अपने यथार्थ बल का आश्रय लेना पड़ेगा। यह सुन मन्दिर प्रवेश की आशा छोड़कर मत्स्येन्द्रनाथजी वहाँ से अपसरित हो गये और भिक्षा करने के अनन्तर शीघ्र अपने आसन पर आ विराजे। वहाँ कुछ क्षण स्थिर रहने पर जब आपकेा व्यतीत पूर्व घटना का स्मरण हो आया तब आपने आभ्यन्तरिक दृष्टि से देखा कि राजा पशुपति मन्दिर स्थित श्रीरामचन्द्रजी की गद्दी के सम्मुख पड़ा हुआ साष्टांगप्रमाण कर रहा है। तत्काल ही आपने अपनी झोली से विभूति निकालकर समन्त्र उधर फेंक दी। जिसका उद्देश्य राजा को निश्रेष्ट करना था। अतएव राजापशुपति उसी समय भड़ीभूत हो गया। उसकी उठने चलने हिलने की समस्त शक्ति क्षीण जैसी होने से शरीर पत्थरवत् स्थूल हो गया। इस आकस्मिक दुर्विज्ञेय घटना का अनुभव कर राजा अत्यन्त ही विस्मित हुआ। परं वह इस आशा पर कि सम्भव है कुछ देर में यह अज्ञात व्याधि शान्त हो जायेगी, मौनता के साथ तद्वत् स्थिर रहा। और ईश्वर की अलक्ष्यगति पर विवेचना करता रहा। तथापि बहुत देर हो गई उसका उस व्याधि से छुटकारा न हुआ। यह देख समीपस्थ सेवक लोग भी आन्तधार्मिक रीति से कुछ-कुछ सान्देतिक वार्ता करने लगे। आखिर ज्यों-ज्यों क्षणव्यतीत होने लगे त्यों-त्यों उनका सन्देह अधिकाधिक प्रबद्र्धित होने लगा और वह वे भीतर ही भीतर विचारने लगे। क्या कारण है अन्य रीति से पूजा न करके महाराज साष्टांग नमस्कार में ही दत्तचित्त हो गये। अब तो भोजन का समय भी उपस्थित हुआ। ठीक इसी अवसर में राजा को विलम्बित जानकर मन्त्री भी वहाँ आ गया। द्वार पर आते ही उनसे जब पाश्र्ववत्र्ती लोगों के मुख द्वारा तथा भीतर जाकर स्वकीय नेत्रों द्वारा राजा की वह दशा देखी तब तो वह भी चकित रह गया और हस्त जोड़कर राजा से कहने लगा महाराज आज अकस्मात् यह क्या घटना हुई है क्या आपका नियम तो स्खलित नहीं हो गया जिससे भगवान् रामचन्द्रजी ने ही कुपित हो आपको यह दण्ड दिया हो। राजा ने उत्तर दिया कि मुझे नहीं मालूम क्या हुआ और कौन देव कुपित हो गया। और देव ही क्रुद्ध हुआ हो मुझे यह भी विश्वास नहीं हो सकता है कारण कि मुझे अपने कत्र्तव्य पर पूरा निश्चय है मेरे से कोई ऐसा कृत्य नहीं बना है जो सरासर अनुचित हो। और उसके उद्देश्य से देव मेरे ऊपर कुपित हो गया हो। मान लिया कि किसी अज्ञात रीति से हमारी कुछ भूल हो गई हो। पर मुझे यह विश्वास नहीं होता कि उस अज्ञात भूल पर कुपित हो देव मुझे इतना कठिन दण्ड दें। इससे तो मेरी यह दशा हो गई है कि मेरी उठने चलने हिलने की समग्र शक्ति नष्ट हो गई। यह सुन मन्त्री और भी आश्चर्यान्वित हुआ और सेवकों के सहित राजा के हस्त पैर दबाने लगा। परं वह स्वाभाविक व्याधि नहीं थी जो किसी चिकित्सा से चली जाती। अतएव मन्त्री ने दबाने तथा अन्य अनेक उपचारों से उसको राजा के शरीर से निकाल दूर करने का बहुत ही प्रयत्न किया तो भी वह टस से मस न हुई। अर्थात् मन्त्री के प्रयत्न को सफलता न प्राप्त हुई। इससे मन्त्री के शोक का ठिकाना न रहा और वह समीपस्थ सेवक तथा द्वारपालों से पूछने लगा कि तुम लोगों ने द्वार पर आये किसी महात्मा का तिरस्कार तो नहीं किया है जिसके कोप वशात् महाराज की यह दशा हो गई हो। उन्होंने उत्तर दिया कि हां एक महात्मा आज अवश्य यहाँ आये थे। जिन्होंने महाराज के साथ ही मन्दिर में प्रविष्ट होने का साहस किया था। परं उसके अनेक बार प्रयत्न करने पर भी हमने उसको भीतर न जाने दिया क्यों कि हमारे लिये ऐसी ही आज्ञा है। जिसका पालन करना हमारा कत्र्तव्य था सोई हमने किया। जिससे वे महात्मा वापिस तो लौट गये। परं सम्भव है इस व्यवहार से उनके आशा स्थान में आघात पहुँचा होगा और बहुत सम्भव है यह कृत्य भी उन्हीं ने उपस्थित किया हो। उनके इस कथन से मन्त्री की अन्तरात्मा में यह बात खूब समा गई कि निःसन्देह यह घटना ऐसे ही उपस्थित हुई है। अतएव उसने पूछा कि वे ढंग के महात्मा थे। उनका पूरा-पूरा परिचय दो जिससे उनकी अन्वेषणा कर उनको प्रसन्न करने का प्रयत्न किया जाय। उन्होंने कहा कि वह बड़ा ही तेजस्वी पुरुष था। जिसके कानों में कुण्डल गले में शेली कक्ष में झोली शरीर पर भस्मी लगी हुई थी। यह सुनकर मन्त्री ने समग्र वृत्तान्त मन्दिरस्थ राजा साहिब के समक्ष कह डाला। तत्काल ही राजा ने आज्ञा प्रदान की कि वह महात्मा जिस प्रकार मिल सके सोई उपाय करो। मन्त्री ने शीघ्र ही राजपुरुषों को विज्ञापित कर मत्स्येन्द्रनाथजी की अन्वेषणा के लिये नगर से बाहर भेज दिया। तथा यह कह सुनाया कि एक दो कोश पर्यन्त के जितने बाग-बगीचे हैं सब में देखना किसी न किसी में महात्मा तुम्हें अवश्य मिल जायेंगे। राज पुरुष मन्त्री की आज्ञा पर सिर झुकाकर नगर से बाहर निकले और कई एक मण्डलियों में मिभक्त हो प्रत्येक आराम का निरीक्षण करने लगे। सौभाग्यवश उनमें से एक मण्डली सरयू नदी के ओर रवाने हुई और महात्मा प्राय ऐकान्तिक स्थल को ही रुचिकर समझा करते है यह विचार करती हुई ज्यों ही इधर-उधर दृष्टि प्रक्षिप्त करने लगी त्यों ही उसकी दृष्टि सरयू नदी के तटस्थ श्मशानों में विद्यमान एक वट वृक्ष की छाया में सानन्द बैठे हुए मत्स्येन्द्रनाथजी के ऊपर पड़ी। राजपुरुष आपको देखते ही आभ्यन्तरिक भाव से अत्यन्त प्रसन्न हुए। एवं कुछ क्षण में आपके समीप जाकर अनेक बार साष्टांग प्रणाम करने लगे। तथा कहने लगे कि भगवन् क्षमा कीजिए यह आपको कष्ट देने के लिये आये हैं। आपके चरणारविन्द को हमारे राजासाहिब ने स्मृत किया है। अतः हम दासों तथा महाराज के ऊपर आप अपनी महती कृपा करें और नगर में चलकर अपनी चरणरज से उनका उद्धार करें। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि हम लोग योगी हैं। क्षुधानिवारणार्थ एक बार ही नगरी में भोजन लेने के लिये जाते हैं। फिर विनाप्रयोजन नगरी में जाना उचित नहीं समझते हैं। इसके अतिरिक्त यह भी बात है कि हम लोग स्वतन्त्र है किसी का कभी कोई अपराध नहीं करते हैं इसीलिये हम किसी का भय भी नहीं रखते हैं। फिर हमें क्या आवश्यकता है जो किसी के महल में जाये और उसका दुःख देखकर अपनी आत्माओं को भी दुःख में डाल दें। इस पर राजपुरुषों ने कहा कि यह ठीक हैं आपके वचन के प्रत्येक अक्षर सत्यता से परिपूर्ण हो रहे हैं जिनके विषय में तो हमें किचिंत भी सन्देह नहीं। परं हम लोग यह समझते हैं कि आप लोग महात्माओं का देशाटन, परोपकार उद्देश्य से है न कि स्वार्थ के लिये। फिर किसी आत्मा के सुखप्रदानार्थ आपका नगरी में जाना निःप्रयोजन कैसे कहा जा सकता है। अतएव हमको यह पूर्ण आशा है कि आप हमारी प्रार्थना पर पूरा ध्यान देकर नगर में चलने के लिये प्रस्तुत हो जायेंगे। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि यह कार्य तो वैद्य लोगों का है। उन्हें शीघ्र ही बुलाकर, राजा को क्या दुःख है, इस बात से परिचित कर दो। वे यथानुकूल औषध प्रदान कर उसे सम्भावित दुःख से मुक्त करेंगे। राजपुरुषों ने कहा कि बड़े-बड़े सुबुद्धि वैद्यों को बुलाकर महाराज की खूब चिकित्सा करा चुके हैं। परं उनका समस्त प्रयत्न निष्फल हुआ है और राजा भी ठीक ही है। कारण कि यदि ऐसी शारीरिक व्याधि जिसका कि उन्हें निदान मालूम हो, उपस्थित हो जाय तो सम्भव है अनुकूल औषध द्वारा उसका निवारण कर सकते। परं करे क्या वह, जिसका कुछ निदान हो, ऐसी पित्तादि दोष पूरित शारीरिक व्याधि नहीं है। उसका परिहार करना सर्वथा आपकी अत्यन्त परिपूर्ण हो गया था। तथापि उन्होंने कुछ विचार कर एक बार फिर चलने को इनकार किया और साफ-साफ कह सुनाया कि हम नहीं चलेंगे तुम जाओ उन से नहीं तो और किसी अच्छे वैद्य को बुलाकर राजा की औषध कराओ। देखो शायद ईश्वरीय इच्छा अनुकूल निकले और राजा स्वस्थ हो जाये। आपके इस निराशोत्पादक उत्तर को सुनकर राजुपरुषों का आनन्द, जो कि आपके प्राप्त होने से उपलब्ध हुआ था, समस्त जाता रहा। अतएव कुछ राजपुरुष तो वहीं रहे और कुछकों ने नगरी में जाकर मत्स्येन्द्रनाथजी के मिलने का तथा उनके नगरी में न आने का समग्र वृत्तान्त मन्त्री लोगों के समक्ष वर्णित किया। तत्काल ही विविध प्रकार की भेंट-पूजा तैयार कर बड़े-बडे+ सरदारों के सहित रथ में बैठे हुए मन्त्री लोग उसी स्थल में आये और कुछ दूर से पदाति हुए नग्न पैरों से बहुत समीप में प्राप्त हो आपके चरणों में गिरे। तथा समस्त सामग्री समर्पित कर अभ्र्यथना करने लगे कि भगवन् कृपा कीजिये महात्माओं का अवतार परोपकार के उद्देश्य से ही हुआ करता है। आज हमारे राजा सहिब अत्यन्त असह्य दुर्विज्ञेय व्याधि से ग्रस्त हैं। अतएव यदि आप शीघ्रता के साथ उनकी रक्षा न करेंगे तो नहीं कह सकते कि वे सजीव रह जायेंगे। मत्स्येन्द्रनाथजी ने अब अधिक सफाई करना उचित नहीं समझा और करूणाद्र्रीभूत हृदय की अनिवार्य प्रेरणा से आप उनके साथ नगरी में जाने को बाध्य हुए। वहाँ ज्यों ही राजा ने मत्स्येन्द्रनाथजी को आते हुए देखा त्यों ही शरीर में चेष्टा का अभाव होने से अपने मन ही मन में अनेक बार नमस्कार की और उनके अतीव समीप आ जाने पर अत्यन्त कोमल वाणी द्वारा सत्कारपूर्वक पुनः नमस्कार की। तथा कहा कि भगवन् महात्मा लोग परोपकारी होते हैं यह वृत्त, समस्त विश्वव्यापी होने के कारण, किसी से छिपा नहीं है। ऐसी दशा में मैं आशा करता हूँ यदि आज्ञानिक भाव वशात् हम लोगों से भूल हो गई हो तो आप अवश्य उस पर क्षमा प्रदान करेंगे। तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि आप लोग जो कुछ कह रहे हैं वह सर्वथा योग्य है परन्तु प्रथम आप यह कहें मैं किसलिये यहाँ बुला गया हूँ। राजा ने उत्तर दिया कि भगवन् आप सर्व कुछ जानते हुए भी हम से पूछते हैं यह तो केवल आप अपना रूप छिपाते हैं। परं क्या वास्तविक में अब हमारे हृदय से आप दूर हो सकते हैं, कभी नहीं। आपने अपने विषय में हमारी वह श्रद्धा उत्पन्न की है जिसका जब तक यह वर्तमान शरीर और ये प्राण सम्मिलित रहेंगे तब तक पूरी तरफ से परिचय दिया जायेगा। यह जो कुछ मैं कह रहा हूँ आप इसको अन्यथा न समझें। क्यों कि मैं श्रीरामचन्द्र जी के वंश में जन्मा हूँ। इसी वंश की (प्राण जायें पर वचन न जाई) यह सर्व लोक प्रसिद्ध उक्ति आपसे भी छिपी नहीं है। अतः मुक्त दास से वाक्य पर विश्वासित हो कर अब मेरे को इस दुःसह्य वेदना से विमुक्त करो। मत्स्येन्द्रनाथजी ने, अच्छा फिर इस प्रकार किसी महात्मा का तिरस्कार नहीं करना, यह कहते हुए अपनी झोली से एक चुटकी विभूति निकाली और उसको मन्त्र पढ़ने के बाद राजा की ओर फेंक दिया। तत्काल ही राजा साहिब बैठे हो गये और बैठते ही फिर मत्स्येन्द्रनाथजी के चरणों में गिरते हुए कहने लगे कि भगवन् आज आपके महान् अनुग्रह से ही हमारा सजीव रहना है। अन्यथा कब तक ऐसी दशा में हम अपने प्राणों को रख सकते थे। हमें अवश्य ही शीघ्रता के साथ किसी न किसी दिन विक्राल काल के मुख में जाना ही पड़ता। अब हम चाहते हैं आप अपने नाम से हमको विज्ञापित कर दें। जिससे आपके शुभाक्षरान्वित नाम के प्रकाश का प्रतिबिम्ब हमारे हृदय पर अपनी स्थिति करे। तद्नन्तर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि हमारा नाम मत्स्येन्द्रनाथ है। सम्भवतः प्रथम भी यह नाम तुमने कभी न कभी अवश्य सुना होगा। यह सुनकर राजा ने कहा कि हाँ भगवन् इस नाम का अवश्य हमने श्रवण किया हुआ है। परन्तु आपके विषय में लोगों के मुख से निकली वाणी को सुनकर हम किंचित् भी विश्वास न कर रहे थे। यही नहीं आपकी सिद्धिविषयक वार्ताओं को अतथ्य समझ कर उनके श्रवण करने की उपेक्षा भी किया करते थे। और उन वार्ताओं का सत्य होना इतना असम्भव समझते थे जितना आकाश में पुष्प का होना। परन्तु वह ईश्वर कैसा दयालु है कैसा भक्तवत्सल है कैसा न्यायी है जिसने आज हमको साक्षात् आपके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त किया है। और हमारे कठोर हृदय में स्थित उस अविश्वास को नष्ट-भ्रष्ट कर पूर्ण रीति से यह प्रकट कर दिया है कि जैसी आपकी महिमा कीर्ति लोगों के मुख से उच्चरित हुई वाणी से सुनी जाती थी आप ठीक वैसे ही हैं। इस प्रकार राजा पशुपति ने अनेक तरह के शब्दों द्वारा मत्स्येन्द्रनाथजी की महिमा तथा स्तुति प्रकट करके एक अतिसुन्दर स्वर्णमय सिंहासन मंगाया और उसके ऊपर मत्स्येन्द्रनाथजी को बैठाकर उनकी विधिवत् पूजा की। तथा कतिपय मास के बाद गुरुमन्त्र ग्रहणपूर्वक उनका शिष्यत्व भी स्वीकृत किया। यही नहीं यहाँ तक कि वह मत्स्येन्द्रनाथजी के दर्शन बिना तथा उनकी आज्ञा बिना भोजन तक ग्रहण नहीं करता था और मत्स्येन्द्रनाथजी के सम्मुख कभी अपनी अधिक प्रसन्नता प्रकट नहीं करता था। यह देख एक दिन मत्स्येन्द्रनाथजी ने, क्या कारण है राजा ने हमारा शिष्यत्व ग्रहण किया है तथा हमारी सेवा में ही अधिकांश समय व्यतीत करता है तथापि मालूम होता है किसी मर्मभेदी दुःख ने इसका हृदय अतीव कष्टान्वित कर रखा है, यही कारण है जितना राजाओं को प्रसन्न चित्त रहना चाहिये उतना यह नहीं देखा जाता है, यह विचार कर उससे कहा कि राजन् तुमको किस विषय की चिन्ता है जिस वशात् तुम प्रतिदिन उदासीन रहते हो। अब हमारे सम्मुख प्रकट करो। हम अवश्य उसका परिहार कर देंगे। यह सुन हस्तसम्पुटी कर अत्यन्त कोमल वाणी द्वारा पशुपति राजा ने कहा कि भगवन् आपके महान् अनुग्रह से हमारे सर्वसम्पत्ति विद्यमान है जिसका आपको भी साक्षात्कार हो चुका है। एवं पुत्र भी पर्याप्त और बहुत अनुकूल है। अतः इस विषय आदि की मुझे स्वप्न में चिन्ता नहीं है। किन्तु जिस भारत विख्यात यशवाले रघुकुल में मैंने जन्म लिया है उसी इस कुल के अद्वितीय भूषण श्रीरामचन्द्रजी की सम्मान एवं श्रद्धापूर्वक बहुत समय से भक्ति करते हुए भी मैंने आजपर्यन्त उनके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है। यही कारण है इसी एकमात्र चिन्ता से आक्रान्त हुआ मेरा हृदय कभी प्रसन्नता युक्त नहीं होता है। यों तो प्रस्तावनुरोध से कभी न कभी अवश्य समयानुकूल वार्तालाप में हंसना तथा चित्त को प्रसन्नतान्वित सूचित करना पड़ता है, परं आभ्यन्तरिक रीति से नहीं। मन अवश्य इसी विषय में लीन रहता है। अतएव यदि आपकी महती कृपा वशात् मेरी यह चिन्ता अपने अभीष्ट को प्राप्त होने पर मुझे विमुक्त कर दे तो फिर कौन ऐसा पुरुष है जो मेरे से अधिक अपने आपको उत्तम तथा पुण्यशाली मानता हो। तदनन्तर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अच्छा-अच्छा अब तुम इस चिन्ता को निःसन्देह अपने हृदय से उठा दो। हम अवश्य तुमको रामचन्द्रजी का दर्शन करायेंगे। तथा साथ ही जिस दुष्प्राप्य अद्भूत योग क्रिया सिद्ध शक्ति का प्रभाव, अखिल संसार में अपनी महती प्रतिष्ठा जमा चुका है एवं जिस योग शक्ति द्वारा हमने निखिल देवी-देवताओं को अपने विषय में प्रसन्न कर उनसे वरदान प्राप्त किया है उसी योगशक्ति का परिचय तुम को कुछ दे चुकने पर भी अब फिर देंगे। परन्तु यह सर्व कुछ आप लोगों के विश्वास पर ही निर्भर है। यदि पूर्ववत् मिथ्या उक्ति समझकर मेरे वाक्यों पर पूरी तरह विश्वास न किया जायेगा तो कभी आप लोग अपने अभीष्ट को प्राप्त न कर सकेंगे। यह सुनकर राजा तथा मन्त्री लोगों ने कहा कि नहीं-नहीं महाराज ऐसा कभी नहीं हो सकता है जो कि हम आपके वचन को विश्वास मय न समझते हों। यह सुनकर मत्स्येन्द्रनाथजी झोली से एक चुटकी विभूति निकाली और मन्त्र सहित उसको राजा तथा राजा के पाश्र्ववर्ती कई एक मनुष्यों के मस्तक में लगा दिया। पश्चात् वे उनको सरयू नदी के तटस्थ किसी ऐकान्तिक स्थान में ले गये और वहाँ जाने पर आपने फिर अपनी झोली से विभूति निकाली तथा धूम्र मन्त्र पढ़कर उसको आकाश की ओर फेंक दिया। जिससे तत्काल ही आकाश से लेकर पृथिवी पर्यन्त घोर अन्धकार छा गया। जिसने सूर्यनारायण के प्रकाश को पराजित कर अपना पूरा अधिकार जमा लिया। यहाँ तक कि समीप खड़े हुए राजा तथा राजपुरुष परस्पर में एक-दूसरे को देख न सकते थे। अतएव इस प्रकार धूम्र की अधिकता होने से राजासाहिब व्याकुल हो गये और उनके नैत्रों से जल बहने लगा। यह देख विवश होकर राजा ने मत्स्येन्द्रनाथजी से कहा कि महाराज यह धूम्र कम हो जाय तो अच्छा है। क्योंकि यह हमारे नैत्रों में प्रवेश कर हमको अतीव दुःखान्वित कर रहा है। तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि आप लोग क्षत्रिय हैं क्यों इतने शीघ्र भयभीत होते हो। परमात्मा की बहुत ही विचित्र गति है नहीं जानते किस समय कौन घोर विघ्न आ उपस्थित हो जाय। मनुष्य को धैर्यान्वित होते हुए उसे सहिष्णुता से निवारित करने के लिये अवश्य अपने आप में कुछ साहस तथा सहन शक्ति रखनी चाहिए। यह कहते हुए आपने फिर झोली से विभूति निकाल कर समन्त्र आकाश में फेंक दी। जिससे अत्यन्त वेग युक्त वायु चलने लगा और छोटे-छोटे वृक्ष उखड़ कर इधर-उधर दौड़ने लगे। ऐसा होने से पृथिवी पर बड़ा ही कोलाहल आरम्भ हुआ। फिर कुछ क्षण के बाद यह उत्पात शान्त कर आपने एक चुटकी विभूति और निकाली। तथा आकर्षण मन्त्र के साथ उसको सूर्य की तरफ फेंक दिया। तत्काल ही सूर्यनारायण मूर्तिमान् हो कर नीचे उतरे और निश्चेष्ट से हो गये। ऐसा होने से सहसा समग्र पृथिवी पर अन्धकार सा छा गया। तत्काल ही श्री महादेवजी कैलाश से अयोध्यापुरी में आये। इसी प्रकार विष्णु तथा ब्रह्माजी भी गरुड़ तथा हंस पर आरूढ़ होकर वहीं आ उपस्थित हुए। वहाँ सूर्य को मूचर््िछत देखकर श्री महादेवजी ने शिष्य से कहा कि तुमने सूर्यनारायण को किस प्रयोजन से इतना कष्ट दिया है। मत्स्येन्द्रनाथजी ने उत्तर दिया कि यह पशुपति राजा हमारा शिष्य सूर्यवंश से उत्पन्न हुआ है और बड़ा ही धर्मात्मा तथा नीतिज्ञ है। यही नहीं आजकल समग्र भारत में जितने राजा हैं उन सब में इसकी सबसे अधिक कीर्ति तथा महिमा है जो भारत के बाल से वृद्ध तक सर्व के हृदय में अपनी स्थिति जमायें हुए हैं। तथापि इसको अब तक सूर्य ने दर्शन नहीं दिया है। इसी हेतु से हमने इसको अपने मन्त्र द्वारा यहाँ बुलाकर कष्टान्वित करना पड़ा है। तब विष्णुजी ने कहा कि अच्छा अब इसको इस कष्ट से विमुक्त करो हम समझा देंगे यह सदा आपकी आज्ञानुकूल रहेगा। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी ने अपनी झोली से एक चुटकी विभूति निकालकर सूर्यनारायण की तरफ फेंक दी जिससे तत्काल ही सूर्य दुःख रहित एवं सचेष्ट हो गया और श्री विष्णुजी के कथनानुसार कह उठा कि हे मत्स्येन्द्रनाथजी आज से लेकर मैं सदा आपकी आज्ञानुकूल ही कार्य करा करूँगा। आप हमारे जैसे उपकारी लोगों के ऊपर सदा कृपा करते रहें। और इतनी शीघ्र ऐसे असह्य कष्ट से व्यथित न किया करें। किन्तु हमारे योग्य जो कोई कार्य उपस्थित हो जाय तो प्रथम उससे हमको सूचित करना उचित समझा करें। यदि सूचना के अनन्तर आपकी आज्ञा का सम्मानपुरःसर पालन नहीं किया जाय तो आपका इस प्रकार कष्ट देना सर्वथा उचित और न्यायपूर्वक है। अच्छा जो कुछ हुआ सो हुआ अब आप कहें मेरे विषय में क्या आज्ञा है जिसके कारण मुझे इतने कष्ट का अनुभव करना पड़ा है। तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि इस हमारे शिष्य पशुपति राजा को प्रसन्नचित्त होते हुए दर्शन देकर सन्तुष्ट करो और अपना वचन दो आपको जिस जगह जिस समय याद करें उसी जगह उसी समय पर उपस्थित होना होगा। तब सूर्यनारायण ने उत्तर दिया कि यह पशुपति हमारा वंशज है इसलिये पुत्र की तुल्य है इसके ऊपर हम सदा प्रसन्न रहते हैं यह निःसन्देह सत्य जानों। आगे भी आज की सदृश ही हम दर्शन देने को तैयार हैं यदि इसकी इच्छा होगी तो। एवं आपको भी तीनों देवों के समक्ष ही वचन देते हैं आप जिस स्थान पर समय हमारा आव्हान करेंगे उसी स्थान पर तत्काल ही हम उपस्थित हो जायेंगे। यह हम इस वचन का उल्लंघन करें तो तीन प्रकार की हत्या से आक्रान्त हो जायें। इसके बाद सूर्यनारायण अपने पूर्वस्थान को गये और विष्णुजी तथा ब्रह्माजी ने भी मत्स्येन्द्रनाथजी को वर प्रदान किया। तथा कहा कि हमारे इस वर पर पूर्ण रीति से विश्वास रखना। अब हम अपने स्थान को जाते हैं तुम्हारा कल्याण हो। इस प्रकार आशीर्वाद प्रदान कर तीनों देवता स्वीय-स्वीय स्थानों को चले गये। कवेल मन्त्री लोगों के सहित राजा तथा मत्स्येन्द्रनाथजी ही अवशिष्ट रह गये। तत्काल ही फिर राजा ने पूर्वप्रस्ताव किया कि भगवन् श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन तो नहीं हुआ। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि हाँ अभी दर्शन कराते हैं कुछ क्षण शान्ति करो। पश्चात् मत्स्येन्द्रनाथजी ने झोली से विभूति निकाली और आकर्षण मन्त्र के साथ फेंक दी। बस क्या था हस्त में धनुष धारण किये हुए पूर्वश्रुतरूप से तत्काल ही श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हो गये। यह देख समन्त्री राजा उनके चरणों में गिरा और उसने कहा कि हे भगवन्! हे दयालो! आप धन्य हैं आपने मुझ कीट पर अनुग्रह कर अपने पवित्र दर्शन में मुझे कृतार्थ किया है। अतः आपका दास मैं आजीवन आपकी प्रतिमा का ध्यान करता हुआ आपके यश तथा आपकी कृपालुता को विस्तृत करूँगा। तब श्रीरामजी, राजा के ऊपर और भी अतीव प्रसन्न हुए। और अपने हस्त को उसके सिर पर धरकर कहने लगे कि हे राजन्! तुम भी धन्य हो जो सांसारिक पदार्थों के कीट न बनकर सवैराग्य ईश्वराधन में ही अधिकांश समय व्यतीत कर रहे हो। यही नहीं बल्कि तुमने अपने सदाचारपूर्वक दृढ़ भक्ति प्रभाव से हमको मानों अपने वश में ही कर डाला है। इसी हेतु से हम स्वयं उपस्थित हैं तुम अपना अभीष्ट वर मांगो। तब अत्यन्त नम्रतापूर्वक हस्तसम्पुटी कर राजा ने कहा कि भगवन् आपकी महती कृपा से मुझे अन्य सर्व सम्पत्ति प्राप्त है। केवल मैं आपकी भक्ति से ही वंचित हूँ। अवश्य आप मुझे अपने चरणों का दास बनाकर इस संसाररूपार्णव से पार करेंगे। अनन्तर अच्छा ऐसा ही होगा तुम अपने विश्वास को छोड़ नहीं बैठना, यह कहकर जब श्रीरामजी प्रस्थान कर गये तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि राजन्! कहिये तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई वा नहीं। यह सुन राजा मत्स्येन्द्रनाथजी के चरणों में गिरा और हस्त जोड़कर कहने लगा कि हे भगवन्! आपको बार-बार धन्यवाद है। आपकी महती कृपा से ही मेरे को तीनों देव तथा रामजी के दर्शन कर अपना जीवन सफल करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अतः इस महान् उपकार के लिये मैं सदा आपका कृतज्ञ रहूँगा।
इति श्री मत्स्येन्द्रनाथजी पशुपति नृप समागम वर्णन

Saturday, May 4, 2013

श्रीमत्स्येन्द्रनाथ चामुण्डा युद्धवर्णन

श्री मत्स्येन्द्रनाथजी गदातीर्थ से गमन करने के अनन्तर जनों को योगात्मक अद्वितीय औषध का मर्म समझाते हुए कुछ काल में श्री द्वारकापुरी में पहुँचे। वहाँ जब नगरी में यह सूचना विस्तृत हुई कि श्री मत्स्येन्द्रनाथ योगी आज यहाँ पधारे हैं तब तो बहुत मनुष्य दर्शन करने के लिये आये। तथा जिसकी जैसी शक्ति थी उसके अनुसार सभी लोग भेंट-पूजा लाकर मत्स्येन्द्रनाथजी के अर्पण करने लगे। कितने ही पुरुष जो असार संसार के विविध दुःखों से आकुल हो मत्स्येन्द्रनाथजी की विशेष सेवा में तत्पर हो गये थे वे आपके द्वारा उन विविध दुःखों की विनाशक योगरूप असाधारण औषध का तत्त्व समझकर सदा के लिये सुखी बन गये। कुछ समय तक इस कार्य को पूरा कर श्री मत्स्येन्द्रनाथजी यहाँ से भी देशान्तर भ्रमण के लिये प्रस्थानित हो गये और कच्छ, सिन्धु आदि कई एक देशों का उल्लंघन कर आप कतिपय मास में, अनेक प्रकार के पुष्पों की सुगन्ध से सुगन्धित, नाना फल संयुक्त वृक्षों की माला से अच्छादित, असंख्य जल-झरनों वाले, अति शोभायमान, श्रीमहादेवी हिंगलाज के पर्वत में पहुँचे। यहाँ प्रत्येक स्थान में देवियों का बड़ा ही प्राधान्य था और एक सुशोभित स्थान में श्री हिंगलाज देवी का अति रमणीय सिंहासन बिराजमान था। जिसमें सहस्त्रों तो क्या लक्षों का सुवर्ण लगा हुआ था। ठीक इसी के ऊपर षोडश कलाओं से सुशोभित श्री महादेवी हिंगलाज बिराजमान थी। जिसके चार भुआ और सिर पर स्वर्णमय मुकुट शोभा पा रहा था। जिस वशात् सुन्दर रूपवती जगद्रक्षिका श्री महादेवी जी का रूप और भी दिव्यतर दीख पड़ता था। ऐसी ही दशा में बिराजमान हुई, ऋद्धि सिद्धि की दात्री, सन्तहितकारिणी पवित्र दृष्टि वाली, श्री हिंगलाज देवी तीनों लोक चैदह भुवन की रक्षा करती थी। जिसकी सेवा के लिये अनेक देवियाँ हर एक समय पर उपस्थित रहती थी और द्वार पर अष्ट भैरव सदा नियुक्त रहते थे। इसी महादेवी हिंगलाज जी के दर्शन के निमित्त मत्स्येन्द्रनाथजी वहाँ पहुँचे और ज्यों ही पर्वत के ऊपर चढ़ने लगे त्यों ही भैरव की दृष्टि आपके ऊपर पड़ी। उसने देखते ही आपको ऊपर जोने के लिये निषिद्ध कर दिया। साथ ही पूछा कि तुम कौन हो तुम्हारा नाम क्या है किस कारण से यहाँ आये हो। आपने उत्तर दिया कि हम योगी हैं मत्स्येन्द्रनाथ हमारा नाम है। श्रीमहादेवी हिंगलाज जी के दर्शनार्थ यहाँ आये हैं। यह सुन भैरव ने कहा कि खैर कुछ हो परं ऊपर जाने नहीं पाओगे। आपने कहा कि क्यों यह क्या कारण है हम ऊपर क्यों नहीं जा सकते हैं। उसने कहा कि पर्व के अतिरिक्त समय में किसी भी मनुष्य को, खास करके पापी को महादेवी के दर्शन करने का न तो कोई अधिकार है और न ऐसे मनुष्य को ऊपर जाने के लिये देवी की आज्ञा ही है। अतएव मुझे यह जानने का पूरा प्रमाण मिल जाय कि आप वैसे मनुष्य नहीं है और श्रद्धा के साथ महादेवी के दर्शन निमित्त ही यहाँ आये हैं तो मैं ऊपर जाने के विषय में कोई आपत्ति नहीं करूँगा। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी के मुख से ’ आभिमानिक वचन निकला और वह यह था कि आपने कहा कि हम स्वयं तो पापी नहीं परन्तु पापियों के इस दुःखमय असार संसार रूप समुद्र के पार होने के लिये नौका रूप हैं। अतएव श्री महादेवी के दर्शन करने से हम को रोक रखना उचित नहीं होगा। भैरव ने कहा कि यह सब ठीक है परं मैं आपके, कि हम पापियों के पार होने के लिये नौका रूप हैं, इस कथन पर सन्तोष नहीं कर सकता हूँ और शंका करता हूँ कि आप ऊपर जाने के अयोग्य मालूम होते हैं। आपके इस कथन ने आपकी श्रेष्ठता पर आघात पहुँचा कर ही मेरे उक्त निश्चय में सहायता दी है। कारण कि ऐसे पुरुष को कया आवश्यकता पड़ी जो देवी के दर्शनार्थ यहाँ आता। यदि आता भी तो अपने मुख से अपनी ऐसी कीर्ति का कभी वर्णन नहीं करता। अतः ऐसा कहकर तुमने यह प्रकट कर दिया कि तुम कोई छली पुरुष हो। अपने महत्त्व की डींग हांककर हमारी आँखों में धूलि डालना चाहते हो। परं यहाँ क्या छùता चल सकती है। अतः जाओ वापिस लौट जाओ जो कुछ यहाँ तक आ गये हो सो माफ किया जाता है। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अहो क्या ही आश्चर्य की बात है यदि तुम्हारे पूछने ने अनुरोध से हम अपना याथाथ्र्य न बतलाते तो हमारा ऊपर जाना रोका जाता और बतलाया तो भी रोका जाता है। बल्कि रोका ही नहीं हमको छलियों की उपाधि से विभूषित किया जाता है। तदनु आपने निश्चय किया कि इसको हम अपनी वास्तविक स्थिति का और कैसे निश्चय करावें। हम अपने विषय में श्रेष्ठता और सत्यता सूचित करने के लिये जितने ही वाक्यों का प्रयोग करेंगे यह हमको उतना ही झूठा और छली समझेगा। अन्ततः आपने कहना पड़ा कि खैर जो भी कुछ हो हम छली हैं देवी के दर्शन करने के अयोग्य हैं बल्कि सब दोषों के भण्डार हैं और पापियों के भी पापी हैं परं यह बतलाइये किसी भी प्रकार ऊपर जाने दोगे कि नहीं। भैरव ने प्रतिज्ञात्मक कहा कि नहीं तुम ऊपर नहीं जा सकोगे कारण कि हमने तुम्हारे आप्तत्व को जैसा है वैसा समझ लिया है। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी ने आन्तरिक भाव से स्मरण किया कि अहो ठीक कहा है सत्यता से कार्य में विलम्ब ही होता है। परं करें क्या दूसरा उपाय दृष्टिगोचर नहीं है। अतएव आपने उसको सचेत किया कि अये भैरव तू अकेला है। यदि मैं ऊपर जाना चाहूँगा तो तेरे लिये मेरा रोका जाना असम्भव हो जायेगा। परं इस घटना से पूर्व मैं यही प्रार्थना कर लेना उचित समझता हूँ कि तुम मेरे मार्ग में कण्टकस्वरूप न बनों और मुझे निर्विघ्न जाने देकर श्रीमहादेवी के दर्शनों का लाभ उठाने दो। भैरव ने कहा कि तुम्हारा मुझे कण्टक बतलाना अपनी घृष्टता का दिखलाना है। कोई चोर चोरी करने के लिये घर में घुसे तो उसका विरोध करने वाला रक्षक कण्टक कैसे कहा जा सकता है। जब वह सेवकता और रक्षकता से नियुक्त किया जा चुका है तो क्या उसका यह कत्र्तव्य नहीं है कि जिस पर उसका विश्वास न हो उसको स्वामी के घर में जहाँ तक हो सके प्रविष्ट न होने दें, ठीक यही मेरा भी है। इतना होने पर भी मैं तो अब तक यही सोच रहा था कि तुम जहाँ तक आगे बढ़ आये हो इस पर कुछ न कहूँ और क्षमाप्रदान कर शान्ति के साथ वापिस लौटा दूँ परं उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत के अनुसार तुम तो अकेला समझकर मेरे ऊपर ही कृपा कर रहे हो। अतः तुम अवश्य दण्ड के भागी हो। अब मैं तुम्हें तुम्हारे असली आपे में लाकर छोडूँगा। तुम होशियार हो जाओ। यह सुनते-सुनते मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अये भैरव, तुम सत्य समझो हम जितना कुछ कर सकते हैं उतना ही निकपटता से कह डालते हैं। हमारे शुद्ध हृदय से निकलने वाले शद्धों का तुम जो भी कुछ अर्थ लगाओ, लगा सकते हो। रह गई हमको दण्डित करने की बात, हम फिर सत्य कह डालते हैं तुम्हारे अकेले के द्वारा तो यह कार्य दूर रहा तुम आठों भैरव मिलकर आओ तो भी हम दण्डित नहीं हो सकते हैं। बस क्या था इससे भैरव के शरीर में प्रज्वलित हुई अग्नि को और भी घृत मिल गया। जिसकी उष्णता से विवश हो भैरव युद्ध करने के लिये शीघ्र तैयार हो गया। यह देख मत्स्येन्द्रनाथजी ने अपनी झोली पर हस्त डाला और उससे एक चुटकी विभूति निकालकर उसे रूद्रशक्ति मन्त्र के जापपूर्वक अपने मस्तक पर धारण कर लिया। जिसके अमोघ प्रभाव से आप महातेजस्वी हुए युद्ध के लिये खड़े हो गये। ठीक इसी समय भैरव ने प्रथम आप के ऊपर अपने साधारण अस्त्रों का प्रहार किया। जो मन्त्र शक्ति से निषिद्ध हुए मत्स्येन्द्रनाथ जी तक पहुँच भी न सके। उनका व्यर्थ परिश्रम देखकर उसने और भी कतिपय अस्त्र छोडे। परं मत्स्येन्द्रनाथजी अपने स्थान पर तादवस्थ ही डटे खडे रहे। किसी भी अस्त्र-शस्त्र के समीप न आने से आपका बाल तक बांका न हुआ। तत्काल ही किसी के द्वारा सूचना मिलने पर प्रधान द्वार पर विद्यमान रहने वाले अवशेष सात भैरव भी घटनास्थल में आ पहुँचे और बड़ी तड़क-भड़क के साथ मार लो-मार लो, पकड़ लो-पकड़ लो आदि अनेक प्रकार के भयंकर शद्धों की घोषणा करते हुए अत्यन्त समीप आकर अपने-अपने वातास्त्र-कामास्त्र-ब्रह्मास्त्र-रुद्रास्त्र- दानवास्त्र-कृतान्तास्त्र-इन सातों अस्त्रों का प्रयोग करने लगे। उधर मत्स्येन्द्रनाथजी भी अचेत नहीं खड़े थे। अतएव आपने प्रत्येक अस्त्र का प्रतिद्वन्द्वी मन्त्र पढ़कर कुछ विभूति उधर प्रक्षिप्त की। जिसके अमोघ प्रभाव से सातों अस्त्र निष्कार्य हो गये। जिनका फिर प्रहार करना व्यर्थ समझा गया। तदनु मत्स्येन्द्रनाथजी ने एक चुटकी भस्मी और फेंकी। जिस वशात् अष्ट भैरवों के शरीर की समस्त शक्ति क्षीण जैसी हो गई। ऐसा होने पर वे मूच्र्छित हो महादुःखी हुए और त्राहि-त्राहि हा कष्ट शद्धों की कारूणेय घोषणा करने लगे। इसी अवसर पर इस घटना के द्रष्टा किसी अनुचर ने महादेवी हिंगलाजजी के सम्मुख उपस्थित हो यह समग्र वृत्तान्त कह सुनाया और कहा कि एक ऐसा मनुष्य आया है जैसा हमने कभी आज पर्यन्त न देखा न सुना है। जिसके द्वारा महाबली अष्ट भैरवों को भी मूच्र्छावत् अपरिमित कष्ट का अनुभव करना पड़ा है। अतः आपने उनकी जहाँ तक हो सके शीघ्रता के साथ सहायता करनी चाहिये। विलम्ब होने पर न जानें वे किस दशा में परिणत हो जायेंगे। यह सुन महादेवी ने, ऐसा कर दिखलाना मनुष्य का कार्य नहीं है, यह कहकर अपने मुख पर उदासीनता धारण की और वह अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्पात्मक समुद्र में गोते खाने लगी। परन्तु अन्त में कुछ सावधान हो उसने चामुण्डा देवी को बुलाया तथा समझाया कि अपने पर्वत पर कोई मनुष्य आया है जो जान पड़ता है कोई तान्त्रिक होगा। जिसने अष्ट भैरवों को भी सुना जाता है मूच्र्छित कर डाला है। अतः तुम जाकर उनकी सहायता करो और देखो ऐसा कैसा मनुष्य है। हिंगलाज देवी की आज्ञा प्राप्त कर अनेक गण अनेक देवी और योगिनियों के सहित चामुण्डा बड़े धूमधाम से तैयार हो युद्धस्थल में आई। और मूच्र्छित अष्ट भैरवों को देखने के अनन्तर मत्स्येन्द्रनाथजी को देखते ही अत्यन्त क्रुद्ध हो उठी। तथा अधैर्य के साथ सहसा कह उठी कि अये छùवेषी तुमने किस कारण से भैरवों को इतना कष्ट दिया है। क्या तुमने हमारे पराक्रम की ओर कुछ भी दृष्टि नहीं डाली। हम उसी महादेवी हिंगलाज की अनुयायिनी हैं जो तीनों लोक चैदह भुभन की रक्षा करने वाली है। इतना होने पर भी तुमने अष्ट भैरवों को जकड़ी भूत बनाकर न केवल हमारा तिरस्कार किया है। बल्कि जगद्रक्षिका भगवती हिंगलाज देवी का तिरस्कार किया है। अच्छा जो भी कुछ हो तुम्हारी इस लापरवाही का तुम्हें अभी नतीजा मिल जायेगा तुम कुछ क्षण ठहरो। इस प्रकार मत्स्येन्द्रनाथजी को सचेत करती हुई चामुण्डा ने अपने चारों हस्तों में शस्त्र धारण किये। यह देख मत्स्येन्द्रनाथजी ने विनम्र भाव से सूचना दी कि भगवती, हिंगलाज का तो मैं दास हूँ इसीलिये सुदूर देश से चलकर बड़ी श्रद्धा के साथ उनके दर्शन करने के लिये यहाँ आया हूँ। परं इसका यह अर्थक भी नहीं हो सकता कि जहाँ मैं हिंगलाज जी का दास हूँ वहाँ अष्ट भैरवों का वा आपका तथा किसी अन्य का द्वेषी हूँ। जिससे भैरवों क साथ वा आपके साथ मुझे कुछ विवाद करना पड़े। किन्तु मैं तो किसी से द्वेष करना वा उसे कष्ट देना अपने मन से भी नहीं चाहता हूँ। इतना होने पर भी मेरे द्वारा जो भैरवों को कष्ट पहुँच रहा है इस विषय में आप सहज से ही अनुमान कर सकती हैं कि इन भैरवों का ही कोई असाधारण अपराध है न कि हमारा। तथापि क्या करें जब इन्होंने हमारा निरोध ही नहीं किया बल्कि हमको पापी आदि अनुचित शब्दों से भी अलंकृत कार्य करना ही पड़ा। इस कथन से देवी का प्रबद्र्धित क्रोध कुछ शान्त हुआ सही परं तो भी वह अपने सज्जीकृत शस्त्र को प्रयोगित किये बिना न रही। ठीक उस अवसर पर जबकि चामुण्डा ने शस्त्र को प्रहृत किया तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने भी बड़ी चतुराई के साथ स्थान का परिवर्तन कर उसके वार को व्यर्थ किया। इसी प्रकार अन्य सहायकों का भी, जो कि चामुण्डा के साथ ही सहसा टूट पड़े थे, प्रहार निष्फल किया। यह देख कुछ हतोत्साह हुई समस्त देवी और योगिनी मारलो-मारलो, पकड़लो-पकड़लो के अनेक थोथे शब्द करने लगी। तथा अन्य अनेक असाधारण अस्त्रों का प्रयोग करने लगी। इतना होने पर भी उनके प्रत्येक अस्त्र का उत्तर देते हुए मत्स्येन्द्रनाथजी अपने प्राकृतिक शान्त स्वभाव से एक स्थान में डटे खडे रहे। चामुण्डा ने अपने पक्ष के समस्त अस्त्रों को किम्प्रयोजन जानकर फिर शस्त्र से धावा किया। परं मत्स्येन्द्रनाथजी इस बार भी स्फूर्ति  के साथ स्थान बदल कर अन्यत्र जा खड़े हुए और उनके शास्त्रिक प्रहार से सर्वथा निःसंग ही रहे। अब तो अब तो देवियों का उत्साह बिल्कुल शिथिल हो गया। वे व्यर्थ परिश्रम हुई एक दूसरी की ओर देखने लगी। तथा आत्यन्तिक आश्चर्य सूचक शब्दों उद्घाटन करने लगी। इतना होने पर भी उनके आश्चर्य की अभी समाप्ति नहीं होने पाई। कारण कि मत्स्येन्द्रनाथजी औन्मादिक मन्त्र के जापपूर्वक कुछ विभूति उनकी ओर फेंक दी। जिसके अनिवार्य प्रभाव से समस्त देवी और योगिनी उन्मत्त हो गई। जिन्होंने अपने-अपने शस्त्र पृथिवी पर रख कर वस्त्र भी दूर फेंक दिये। जो वायु द्वारा शीघ्र उड़ा दिये गये और वे स्वयं नग्न हो मत्स्येन्द्रनाथजी के कुछ ही दूरी पर असाधारण नृत्य करने लगी। इसी प्रकार करते-करते बहुत देर हो गई। वे नाच-कूद कर अत्यन्त श्रमित हो गई। तब तो मत्स्येन्द्रनाथजी ने कुछ विभूति फिर उधर फेंक दी। जिससे उनकी उन्मत्ता दूर हुई और वे एक दूसरी की ओर देखकर हंसने लगी। तथा कहने लगी कि अहो यह क्या माया हुई कहाँ तो हम बड़े जोर सोर के साथ युद्ध करने के लिये यहाँ आई थी कहाँ हमारी दशा हो गई कि वस्त्र शून्य हो नृत्य करने लगी। अस्तु! उक्त प्रकार परामर्श कर अत्यन्त लज्जित हुई देवियाँ शीघ्र दौड़कर हिंगलाज के समीप गई। उसने जब कि दूर ही से शिरोमणि चामुण्डा आदि देवियों को वस्त्र विरहित देखा तब तो महशोक प्रकट किया। तथा अत्यन्त समीप आने पर उसने उनसे पूछा कि अये तुम्हारी यह क्या दशा और कैसे हुई। उन्होंने समग्र वृत्तान्त जो कि उनके साथ बीत चुका था कह सुनाया। ओर कहा कि आज पर्यन्त ऐसा पुरुष कभी न देखा और सुना था। जो युद्ध विद्याओं में इतना प्रवीण हो। जिसने अष्ट भैरवों की ही नहीं हमारी यह हास्यास्पद तथा लज्जाप्रद दशा कर डाली है। हिंगलाज देवी ने फिर पूछा कि वह किस प्रकार का पुरुष है तथा उसका चिन्ह क्या है। उन्होंने बतलाया कि सिर पर जटा गले में शेली कक्ष में छोटी सी झोली आदि चिन्हों से चिन्हित वह भस्मांगी पुरुष है। जिसका स्वभाव निर्मल और चेहरा असह्य तेजस्वी दीख पड़ता है। यह सुनते ही महादेवी हिंगलाज ने प्रसन्न मुख से कहा कि वह तो मेरा पुत्र है। भैरवों ने अन्याय किया जो उसको ऊपर आने से रोक रखा। चलो हम चलकर अपने पुत्र को समझा देती हैं। इस कथन की सत्यता देखने के लिये समस्त देवी तैयार हो हिंगलाज माता के साथ फिर घटनास्थल को लौटी। ये ज्यों ही उस स्थान के समीप पहुँची त्यों ही मत्स्येन्द्रनाथजी की दृष्टि इधर पड़ी। तत्काल ही षोड़शकला युक्त जगज्जननी भगवती महादेवी हिंगलाज को सम्मुख आते देख मत्स्येन्द्रनाथजी ने अपना आसन छोड़ दिया और कतिपय कदम आगे चलकर माता का स्वागत करने के अनन्तर आपने उसके चरणों का आश्रय ग्रहण किया। तथा विविध प्रकार से स्तुति भी करी। आपके इस सद्व्यवहार से सत्कृत हो अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक हिंगलाज जी ने आपको अपने गोद में बैठा लिया। एवं अनेक प्रैतिक चेष्टाओं का उंगारकर उसने आपकी हार्दिक वार्ता पूछी। आपने हिंगलाज के गोद में बैठाने के समय जैसे ही मन मोहनी बालरूप धारण किया था ठीक उसी के अनुकूल अत्यन्त मधुर वाणी से उत्तर प्रदान किया। जिससे प्रसन्न भी महादेवी और प्रसन्न हुई और मत्स्येन्द्रनाथजी से कहने लगी कि अये पुत्र इन भैरवों ने तुम्हारे साथ जो भी कुछ सभ्या-सभ्य बर्ताव किया हो उस पर क्ष्मा प्रदान करो। तथा इन भैरवों को अब तादवस्थ्य सचेत कर दो। क्योंकि क्यों कि ये अब अपने प्रामत्तिम कृत्य का पर्याप्त फल पा चुके हैं। माताजी की यह उचित वाणी सुनकर आप परम हर्षित हुए। तथा उसके कथनानुसार आपने अपनी झोली से कुछ भस्मी उद्धृत कर भैरवों की तरफ प्रक्षिप्त की। जिससे तत्काल ही सावधान हो समस्त भैरव अत्यन्त स्नेह के साथ आपकी तथा आपके प्रबल साहस की प्रशंसा करने लगे। उनके इस निष्कपट प्रवचन पर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कृतज्ञता प्रकट की और अपने विषय में भी आपने उनसे क्षमा करने की प्रार्थना की। प्रार्थना समाप्त होते ही भगवती हिंगलाज ने मत्स्येन्द्रनाथजी से कहा कि पुत्र में तुम्हारे ऊपर महान प्रसन्नता प्रकट करती हूँ और तुम्हें सूचित करती हँू कि मेरे से तुम किस अभिष्ठ वर की याचना करो। मत्स्येन्द्रनाथजी ने हस्त सम्पुटी कर अभ्यर्थना करी कि मातः जब आपने मुझे अपना पुत्र स्वीकार किया है तब यह कहना असंगत नहीं कि आपकी मेरे ऊपर असाधारण कृपा है। फिर इसके अतिरिक्त अन्य आपके समीप कौन वस्तु है जो इसके महत्त्व को न्यून करने वाली हो। बल्कि सच पूछे तो मुझे आवश्यकता ही इस बात की थी कि मैं आपकी कृपा का पात्र बन जाऊँ। आज वह दिन भी ईश्वरीय इच्छा से उपस्थित हो चुका जिसमें मेरा अभिष्ट पूर्ण हुआ। यह सुन देवी ने कहा कि यह ठीक है तथापि मैंने तुमको पुत्रत्वेन स्वीकार किया है और इसीलिये मेरी तुम्हारे ऊपर पूर्ण कृपा है इसी बात का सूचक एक मन्त्रात्मक अस्त्र में तुम्हें प्रदान करना चाहती हूँ। जिसके प्रहृत करने पर परिपन्थी अवश्य तुम्हारे वश गत हो जायेेगा। मत्स्येन्द्रनाथजी ने अत्यन्त श्रद्धा के साथ उसे ग्रहणकर देवी के चरणों में सिर झुकाया और उससे प्रस्थान करने की आज्ञा मांगी। श्री हिंगलाज जी ने कहा कि पुत्र आया हु आ स्थान भी तो देखता जाय। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी माताजी के साथ मन्दिर में गये तथा कुछ दिन सानन्दनिवास करने के अनन्तर वहाँ से प्रस्थानित हुए।
इति श्रीमत्स्येन्द्रनाथ चामुण्डा युद्धवर्णन ।

Friday, May 3, 2013

श्री मत्स्येन्द्रनाथ वीरभद्र युद्ध वर्णन

श्री मत्स्येन्द्रनाथजी ने जन्म-जन्मान्तरों के पापनाशक, अतिपवित्र सर्वतीर्थों में मान्य, श्रीगदातीर्थ में जाकर स्नान किया और उसी क्षेत्र में विराजमान श्री हरहरेश्वर महादेवजी का दर्शन किया। इसी प्रकार स्नान दर्शनादि करते हुए आपके कतिपय दिन व्यतीत हो गये। एक दिन अकस्मात् कहीं से आ निकलने वाले वीरभद्र से आपका मिलाप हुआ। उसे देखते ही आपने प्रथम प्रमाण करते हुए आदीश-आदीश शद्ध की घोषणा की और बड़े आदर सम्मान के साथ उसे अपना आसन प्रदान कर विनम्र भाव से उसकी कुशल वार्ता पूछी। इसी प्रकार अभिवादन प्रत्यभिवादन करते कराते आप लोगों का कुछ ही काल व्यतीत हुआ था, इतने ही में वीरभद्र कह उठा कि अये महानुभाव अन्य बात तो सब ठीक है आपके सत्कार और विनम्र भाव पर मैं आपको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ परं प्रथम यह बतलाने की कृपा कीजिये कि आपका ’ परिचय क्या है। यह सुनकर मत्स्येन्द्रनाथजी ने उत्तर दिया कि यदि आप केवल मेरे नाम से परिचित होना चाहते हों तो मेरा नाम मत्स्येन्द्रनाथ है। तदतिरिक्त संक्षेप से समस्त परिचय परिचय लेना चाहों। तो वह यह है कि मैं आपका छोटा ’ भ्राता हूँ। यह सुन वीरभद्र की भ्रूकुटी कुछ ऊपर को चढ़ गई। अतएव उसने कहा कि आपने निःसन्देह यह असत्य भाषण किया है। यदि आप मेरे भ्राता होते तो मुझ जैसे ही तो होते तथा मुझ जैसा पराक्रम और पौरुष भी रखते। इनका अभाव सूचित करते हुए भी आप मेरे भ्राता बनने का दावा रखते हैं तो इसका तो यही अर्थ हो सकता है जैसा कि किसी का अपने उद्देश्य से किसी उच्च कुल का नाम लेकर अपना गौरव बढ़ाना होता है। इस पर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि पराक्रम और पौरुष कोई ऐसी वस्तु नहीं जो वस्त्रादि की तरह प्रत्यक्षतया शरीर पर धारण की जाती हों जिनको देखकर आप निश्चय कर लें कि हाँ इसके पास पराक्रम और पौरुष दोनों विद्यमान हैं। किन्तु वे तो क्रिया के पूर्व अप्रत्यक्ष रहते हैं। अतः उनके प्रत्यक्ष करने के लिये प्राप्तावसरिक क्रिया की अत्यन्तावश्यकता है। यह सुनकर कुछ देर तो वीरभद्र चकित सा हो मत्स्येन्द्रनाथजी के मुख की ओर देखत रहा तथा यह विचार करता रहा कि इसको किसका इशारा है  स्वयं निर्बल जैसा दीप पड़ता हुआ भी अपना पराक्रम प्रत्यक्ष दिखलाने के अभिप्राय से मुझे युद्धात्मक क्रिया आरम्भ करने के लिये बाध्य कर रहा है। अन्त में उसने कहा कि यह ठीक है पाराक्रमिक क्रिया के बिना किसी का पराक्रम प्रत्यक्ष नहीं होता है। परं मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या आपका पराक्रम भी इसी ढंग से अर्थात् युद्धात्मक क्रिया से ही प्रत्यक्ष होगा। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि न तो मैं इस बात के लिये उत्कण्ठित हूँ और न मैंने यह इस अभिप्राय से कहा है कि आप मेरे साथ युद्ध करके मेरा पराक्रम देखें। किन्तु मैंने तो जो सत्य बात थी वही आपके अभिमुख कही है। इसका आप जैसा चाहें वैसा अर्थ लगा सकते हैं। वीरभद्र ने कहा कि खैर जो भी कुछ हो परन्तु पुरुष अपने आपकी जिस किसी भी कोटी में गणना करता हो उसके अनुकूल गुण प्राप्त करना ही उसे सर्वथा उचित है। अतः यदि आपने मेरा भ्रातृत्व ग्रहण किया है तो आपको चाहिये कि पौरषादि में मेरी समता प्राप्त कर लें। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं अतएव मुझे लज्जा आती है मैं जो पराक्रम प्राप्त कर चुका हूँ वह आपके सम्मुख नहीं दिखा सकता हूँ। कारण कि मेरे ऐसा करने से, आपके इस मन्तव्य में जैसा कि आप मुझे समझ बैठे हैं, धोखा उपस्थित होगा। जिसके द्वारा आपको ीाी अपने मन्तव्य पर पश्चाताप करना पड़ेगा। वीरभद्र ने कहा कि यदि यह बात है तो आप निःसन्देह रहैं अन्त में क्या होगा यह तो ईश्वर ही जानें परं इस समय आपके पराक्रम को देखने से मुझे जितनी प्रसन्नता होगी उतना धोखा कभी नहीं हो सकता है। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अच्छा फिर यह बतलाइये किस ढंग से आप मेरे पराक्रम की परीक्षा करेंगे। उसने कहा कि प्रािम मल्लयुद्ध से ही होनी चाहिये। अन्त में जैसा अवसर प्राप्त होगा उसके अनुकूल विचार किया जायेगा। यह बात मत्स्येन्द्रनाथजी को भी स्वीकृत हुई और दोनों महानुभावों का मल्लयुद्ध होना आरम्भ हुआ। युद्ध करते-करते बहुत देर हो गई दोनों में से कोई भी पराजित न हुआ। आखिर मत्स्येन्द्रनाथजी यह सोचकर, कि बड़ा भाई प्रसन्न हो जायेगा, जानकर नीचे गिर गये। उनका यह मनोभाव वीरभद्र से भी छिपा न रहा। अतएव इस व्यवहार से वह अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा। उसने सोचा कि मत्स्येन्द्रनाथजी ने स्वयं पराजित हो मेरा अपमान किया है। कारण कि इसका यह अर्थ निश्चित हो सकता है कि मत्स्येन्द्रनाथ के पराजित करने में वीरभद्र असमर्थ था उसका मान रखने के अभिप्राय से मत्स्येन्द्रनाथ स्वयं पराजित हो गया। (यथार्थ में बात थी भी ऐसी ही। ईश्वर की अलक्ष्य गति के अनुसार, या यों कहिये कि इन महानुभावों ने अपना अतथ्य मनोमालान्य दिखलाकर सांसारिक लोगों को किसी प्रकार की शिक्षा देनी थी। खैर जो भी कुछ हो दोनों महानुभावों का आस्त्रिक युद्ध होना आरम्भ हुआ। वीरभद्र ने साधारण पुरुष की तरह प्रतीत होने वाले अपने छोटे भाई मत्स्येन्द्रनाथजी से प्राप्त हुए तिरस्कार का निवारण करने के लिये मल्लयुद्ध का परित्याग कर नागास्त्र का आश्रय ग्रहण किया। जिसके छोड़ते ही लपलपाती हुई जिव्हाओं वाले अनेक सर्प प्रकट हो मत्स्येन्द्रनाथजी की और दौड़े। यह देख मत्स्येन्द्रनाथजी ने उसके ऊपर समन्त्र गारुड़ास्त्र का प्रयोग किया। जिसने समस्त सर्पों का उपसंहार कर उसे बेकार कर डाला। यह देख वीरभद्र कुछ चकित सा हो गया और उसने फिर रुद्रास्त्र से प्रहार किया। उसके ऊपर मत्स्येन्द्रनाथजी ने अस्त्रास्त्र का प्रयोग किया। जिसने वीरभद्र के बाण को व्यर्थीभूत बना दिया। इसी प्रकार उसने जितने बाणों का प्रयोगित किया उन सबका मत्स्येन्द्रनाथजी ने न केवल निवारण ही किया बल्कि उनके सकाश से अपने आपका बाल तक भी बांका न होने दिया। इस प्रकार मत्स्येन्द्रनाथजी को निर्बाध देखकर वीरभद्र ने युद्ध करना छोड़ दिया और अपने मन ही मन यह विचार करने लगा कि अहो क्या ही विचित्र घटना है मैंने कैसे-कैसे विक्राल अस्त्र छोड़े परं वे मत्स्येन्द्रनाथ को कुछ भी बाधित न कर सके। नहीं जानते यह कैसा पुरुष है मुझे तो इसको भ्राता कहने में ही घृणा दिखाई देती थी यह तो वह निकला जिसको हम ज्येष्ठ भाई कहें तो भी अनुचित नहीं हो सकता है। तदनु वह शान्त पुरुष की तरह हंसकर मत्स्येन्द्रनाथजी को धन्यवाद देने लगा। तथा कहने लगा कि भ्रातः बस परीक्षा हो चुकी आपका मेरा भ्रातृत्व सम्बन्ध बतलाना जहाँ मुझे नासिका संकुचित करने के लिये बाध्य करता था वहाँ अब मैं आपको अपना भ्राता समझने में अपना महान् गौरव निश्चित करता हूँ। यदि किसी प्रकार मेरी प्रमत्ता सूचित हुई हो तो क्षमा कीजिये। यद्यपि वीरभद्र ने इस तरह ऊपरीभाव से मत्स्येन्द्रनाथजी को प्रसन्न चित्त बना दिया। परं इस कृत्य से उसके आन्तरिक मर्म में गहरा आघात पहुँचा था। कारण कि जब वह आज तक किसी से भी तिरस्कृत नहीं हुआ था और उसने अनेक देव, दानव, किन्नर गन्धर्वों को निस्तेज बना डाला था। तब अपना मान मर्दन करने वाले मत्स्येन्द्रनाथजी के साथ वह अपनी आभ्यन्तरिक सहानुमति कैसे रख सकता था। खैर जो भी कुछ हो आभ्यन्तरिक हो वा बाह्य वीरभद्र की प्रसन्नता से मत्स्येन्द्रनाथजी भी अती वानन्दित हुए और वीरभद्र की विनम्र वाणी पर कृतज्ञता प्रकट करने लगे। (मेरे हृद्य पाठक इन्द्र, सम्भव है आप इस बात पर अरूचि प्रकट करते होंगे कि जब योगियों के लिये मोक्ष का साधन ज्ञान और ज्ञान का साधक निरन्तर सामाधिक अवस्था है, तब उसमें निरन्तर प्रवृत्ति न रखते हुए स्वकीय सिद्धियों के प्रयोग द्वारा किसी को नीचा ऊँचा दिखाने से क्या साध्य है अर्थात् ऐसा करना निष्प्रयोजन है। अतएव मत्स्येन्द्रनाथजी के, न केवल योगी हो कर बल्कि योगि समाज के प्रथम पुरुष होकर भी, ऐसा कर दिखलाने में कोई तत्त्वता प्रतीत नहीं होती है। परन्तु आपको इस परामर्श के पूर्व भद्रकाली के कथन पर ध्यान रखते हुए उसके मन्तव्य पर विश्वास करना चाहिये जैसा कि उसने बतलाया है कि आपका अपने कल्याण के लिये अनपेक्षित भी सिद्धि चमत्कार, मुमुक्षुजनों को अपनी ओर आकर्षित करने में सहायक और इसी हेतु से अपेक्षित तथा अव्यर्थ है। इसके अतिरिक्त सिद्धियों के प्रयोग में मत्स्येन्द्रनाथजी का और भी आश्य छिपा हुआ है और वह यह है कि आप इस बात को संसार में खूब प्रकट कर देना उचित समझते थे कि योग में निपुणता प्राप्त करना न केवल मोक्ष के अधिकारियों को ही लाभ पहुँचा सकता है, बल्कि जो मनुष्य संसार में अपना उत्कर्ष चाहते हैं, वा राष्ट्र निर्माण करना चाहते हैं, और सार्वभौम बनना चाहते हैं उनके लिये भी असाधारण लाभ पहुँचा सकता है। वे मनुष्य जो कार्य, लक्षों सैनिकों से कतिपय वर्षों तक पूरा नहीं कर सकते हैं, वही कार्य इस कुछ काल के प्रयत्न से साध्य योग के प्रभाव द्वारा बात की बात में सिद्ध कर सकते हैं। इसके विषय मे ंउदाहरण की अन्वेषणार्थ कहीं दूर जाने की आवश्यकता ही नहीं है। जिस वीरभद्र ने बड़े-बड़े योधाओं का अभिमान खण्डित कर दक्ष का यज्ञ ध्वंसित कर डाला था उसी वीरभद्र की मत्स्येन्द्रनाथ जी के सम्मुख एक भी बात ऐश न गई। अस्तु) जो भी कुछ हो असल बात तो यह है आज कल के हम लोग उनके अभिप्राय को समझ नहीं पाते हैं और अनभिप्राय को उनका समझ कर अपने आपको भूल के मार्ग पर चलाते हुए भी प्रसन्नता प्रकट करते हैं। और यदि कोई महानुभाव उसको सचमुच भूल समझकर उस पर स्वयं न चलता हुआ हमको ज्यों-ज्यों चेतावनी देता है और उस भूल के मार्ग पर चलने से करने का प्रयास करता है त्यों-त्यों हम अधिकाधिक उसकी पुष्टि कर उसी को ग्रहण कियें जाते हैं अस्तु)। श्री मत्स्येन्द्रनाथजी वीरभद्र से सत्कृत हो देशान्तर पर्यटन के लिये प्रस्तुत हुए।
इत्ति श्री मत्स्येन्द्रनाथ वीरभद्र युद्ध वर्णन ।

Thursday, May 2, 2013

श्री मत्स्येन्द्रनाथ भद्रकाली युद्ध वर्णन

श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी वारामलेवार से गमन करके शनैः-शनैः भ्रमण करते हुए कोकन देश में आये और वहाँ आडूल नाम के ग्राम की जिस पवित्र भूमि में भगवती देवी भद्रकाली का मन्दिर था ठीक उसी के समीपस्थ स्थल में आपने अपना आसन स्थिर किया। देवी का मन्दिर जितना ही स्मरणीय था उतना ही चित्त को आल्हादित और शान्त करने वाला भी था। यही कारण था मेले के समय असंख्य लोग देवी को प्रसन्न करने और अनेक लोग मन्दिर की शोभा देखने के लिये यहाँ आते थे। इतने अधिक लोगों का संगठन होना इस बात को सूचित करता था कि उस समय जितनी देवी भारत में विराजमान थी उन सब में इसी का उच्चासन था। अतएव इस देवी की बड़े ही धूमधाम के साथ पूजा हुआ करती थी। जिसकी श्रद्धाभक्ति और दार्शनिक लाभ की चैंतरफ घोषणा हो रही थी। श्री मत्स्येन्द्रनाथजी को यही घोषणा प्रेरित कर इधर लाई थी। अतएव भोजनादि से निवृत्त हो आप कुछ देर में अपना आसन रक्षित कर देवी के दर्शनार्थ मन्दिर में गये। परं जिस समय आप मन्दिर में पहुँचे थे उसी समय देवी किसी कारण वशात् चिन्ताकुल हुई बैठी थी। उसी अवसर पर उपस्थित हो आपने उसके अभिमुख अपना सिर झुकाया और कहा कि मातः हम बहुत दूर से आपकी महिमा सुनकर दर्शनार्थ यहाँ आये हैं। अतः आप हार्दिक प्रसन्नता प्रकट कर हमको अपने पवित्र दर्शनों का लाभ करायें। देवी प्रथमतः ही अपने प्राकृतिक स्वभाव में नहीं थी। अतः उसने आपकी अभ्यर्थना पर विशेष ध्यान नहीं दिया। यह देख आत्यन्तिक विनम्र भाव से मत्स्येन्द्रनाथजी ने पूर्ववत् फिर प्रार्थना की। यह सुन कुछ नासिका संकुचित कर देवी कह उठी कि तुम कहाँ से दुःख देने के लिये यहाँ आ खड़े हुए। जाओ चले जाओ यात्रा के उपलक्ष्य पर यहाँ आना अब हम अन्य कार्य में दत्तचित्त हैं। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि भगवती आप जानती हैं हम ऐसे पुरुष नहीं हैं जो इतने समय तक यहीं बैठे हुए भिक्षान्न से उदर पूर्ति करते रहें। किन्तु तब तक तो न जानें हम कहाँ तक पहुँचेंगे और कौन-कौन से कार्य करेंगे। अतएव आप कृपा करें और अपने दर्शन से, जिसमें कि प्रेम झिलकता हो, मुझे पवित्र कर मेरा ऐहागमन सफल करें। हाँ यदि आप अपने चिन्त्य कार्य से कुछ देर में ही निवृत्त होने वाली हों तो मुझे समय निर्धारित कर आज्ञा दीजिये मैं निर्दिष्ट समय पर फिर उपस्थित होऊँगा। परं खेद है ईश्वरीय इच्छा कुछ और ही थी और मत्स्येन्द्रनाथजी ने जिसको एक बार मातः, इस सम्बोधन से सत्कृत किया था उसके सम्मुख विवश हो आस्त्रिक प्रयोग करना था। अतएव अवश्यम्भावी समय के अनुकूल प्रेरित हुई देवी कह उठी कि जाओ-जाओ मैं कह चुकी हूँ तुम चले जाओ नहीं तो मेरे असली रूप का दर्शन होगा। जिसके प्रकट करने के साथ तुम्हारा काल भी अवश्यम्भावी होगा। इससे मत्स्येन्द्रनाथजी समझ गये कि अन्त हो गया। इस देवी में कितना अहंकार प्रविष्ट हो गया है। आश्चर्य है साधारण मनुष्य भी अतिथि के सत्कारार्थ अग्रसर हुआ देखा जाता है। इस पर भी यदि उसकी भक्ति से कोई उपस्थित हुआ हो तो फिर कहना ही क्या है। परं दुःख है यह इतना नहीं विचारती है कि यह अतिथि जिसकी शरण में आया है वह मैं कौन हूँ और यह अतिथि भी कौन है। आखिर फिर आपने कहा कि देवी मैं तृतीय बार फिर आपसे अभ्यर्थना करता हूँ आप हार्दिक प्रेम दिखला कर हमारा हर्ष बढ़ायें। यह सुन देवी क्रोधान्वित हुई और कहने लगी कि क्या तुम मेरा पराक्रम नहीं जानते हो जो इतना हठ कर रहे हो। यदि मैं अपने आपे में आ गई तो तुम्हें मेरे तेज में इस प्रकार लीन होना पड़ेगा जैसे पतंग अग्नि में होता है। यह सुनकर आपने सोच लिया कि ठीक है प्रार्थना से कार्यासिद्धि नहीं है। अतः अब तो हमको भी अपनी शक्ति अवश्य प्रकट करनी चाहिये। इसीलिये आपने कहा कि देवी आप मुझे अपनी शक्ति से अनभिज्ञ बतलाती हो परं मैं कहता हूँ कि आप भी मेरी शक्ति से अनभिज्ञ ही हो। अन्यथा आप मेरा इतना अनुचित तिरस्कार नहीं करती। अब मैं इस बात के लिये तैयार हूँ आपने जो पराक्रम दिखलाना हो सो दिखलाओ। आपने छोटा समझकर मेरा तिरस्कार किया है परं याद रहे सूर्य देखने में छोटा ही दीख पड़ता है तथापि अपने असह्य तेज पँूज से समस्त संसार को प्रकाशित करता है। तद्वत् ही आप मुझे भी जानों। यह सुन घृत डालने से प्रज्वलित अग्नि की तरह उत्तेजित हो देवी ने कहा कि जटाजूट और भस्मी आदि से शिवरूप धारण कर जो तुम हमको अपना भय दिखलाते हो हम इस धोखे की बातों से डरने वाली नहीं है। मुझ में वह शक्ति है जिसके द्वारा यहीं उपस्थित रहती हुई मैं जगत् की रक्षा करती हूँ और राजा को रंक तथा रंक को राजा बना सकती हूँ। अतएव तुम समझो मेरे साथ विवाद करने से तुम्हें लाभ के स्थान में हानि का मुख देखना पड़ेगा, क्योंकि तुम मेरे सामने कुछ नहीं हो अर्थात् तुच्छ हो। तृण के समान हो। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि बलि राजा के सम्मुख बावन भगवान प्रथम तुच्छ ही मालूम होते थे किन्तु समस्त राज्य दे कर भी वह उनके पदक्रम की पूर्ति न कर सका। ठीक ऐसा ही आप मुझे ही समझ लो। बस क्या था ज्यों ही मत्स्येन्द्रनाथ जी ने ऐसा कह कर अपने वाक्य की समाप्ति की त्यों ही देवी ने अपने अस्त्र का आश्रय लिया और वह प्रहार करना ही चाहती थी ठीक उसी समय मत्स्येन्द्रनाथजी ने अपनी झोली से कुछ विभूति निकाली और आग्नेय मन्त्र के जाप पूर्वक उसे आकाश की और फेंक दिया। जिससे तत्काल ही चारों दिशा अग्निमय हो गई। इस भयंकर उष्णता से व्याकुल हो घोर शब्द करती हुई भद्रा देवी हस्त में त्रिशूल धारण कर मत्स्येन्द्रनाथजी की ओर अग्रसर हुई। यह देख उसकी अनुयायिनी डंकनी, शंकनी, योगिनी भी विविध शस्त्र धारण किये हुए उसके साथ ही मत्स्येन्द्रनाथजी के ऊपर टूट पड़ी। ठीक उसी अवसर में मत्स्येन्द्रनाथजी ने फिर विभूति निकली और उसे रूद्र शक्ति मन्त्र के साथ ऊपर फेंक दिया। जिसके अमोघ प्रभाव से प्रेरित हुए ग्यारह रूद्र प्रकटि हो गये तथा प्रकट होते ही मत्स्येन्द्रनाथजी की सहायता के लिये तत्पर हुए। यह देखकर भद्रा अत्यन्त विस्मित हुई सोचने लगी कि मालूम होता है यह अपने विषय में जो उपमा दे रहा था ठीक वैसा ही है। अतः नहीं जानती अन्त में क्या होने वाला है। हमारी जय होगी वा इसी की ही। तथापि एक बार मैं अपने भाग्य की परीक्षा कर लेती हूँ। इस परामर्श के अनन्तर उसने विक्राल रूप धारण किया। तथा घोर शब्द सुनकर वायु सेवनार्थ आकाश में भ्रमण करने वाले देवता लोग अत्यन्त आश्चर्यान्वित हुए कहने लगे कि क्या कारण है आज अकस्मात् यह क्या हुआ जो देवी क्रुद्ध हो गई है। तदनु अपने-अपने विमानों पर आरूढ़ हुए वे युद्ध स्थल में आये और देवी का विस्मापक घोर युद्ध देखने लगे। भद्रिका बड़े ही कुशल गणों के सहित युद्ध कर रही थी। जिसके युद्ध कौशल्य को देखकर देवता लोग निश्चय करते थे कि इसके साथ विवाद कर मत्स्येन्द्रनाथजी ने बड़ी भूल की है। इस समय मत्स्येन्द्रनाथजी शान्त स्वभाव से खड़े हुए देवी के युद्ध चातुर्य का तथा उसकी शक्तिशालिता का अनुमान कर रहे थे। देवी ने जब आपको इस प्रकार सानन्द खडे+ देखा तब तो अपने प्रयोगित बाणों को निष्फल गये निश्चित कर अमोघ वज्रास्त्र छोड़ा। उसको इस अन्तिम अस्त्र के सफल होने की पूर्ण आशा थी परं हतभाग्य प्रबल मन्त्र से निरूद्ध हो वह भी किम्प्रयोजन ही रहा। यह देख देवी के शोक का कुछ ठिकाना न रहा। अब तो बहिर से आग्नेयास्त्र की और अन्तर से शोक की अग्नि से दंदह्यमान हुई वह विचलित सी हो गई। तदनन्तर अनुयायिनी योगिनियों के प्रबल उत्साह से उत्साहित हो कुछ देर में वह फिर अपने होश में आई और अकर्मण्यता प्रकट न करने के लिये उसने अनपेक्षित भी एक धूम्र बाण और छोड़ा जिससे चारों दिशा अन्धकारमयी हो गई। इसके ऊपर मत्स्येन्द्रनाथजी ने बायवीय मन्त्र के साथ विभूति फेंद दी जिससे प्रबल वेग वायु चलने लगा। अब तो धूम का एक जगह ठहरना असम्भव हो गया। कुछ ही देर में देखते-देखते न जानें धूम कहाँ से कहाँ चला गया। तदनन्तर मत्स्येन्द्रनाथजी ने फिर कुछ विभूति फेंकी। जिससे देवी को मूच्र्छा प्राप्त हो गई। यह देख अन्य शंकनी योगिनीयों ने महा कोलाहल किया जिसके श्रवणमात्र से भयभीत हुए पशु-पक्षी इधर-उधर दौड़ने लगे। ऐसी दशा में आवश्यकता इस बात की थी कि उन विचारियों को कुछ शान्ति का अवलम्बन कराया जाता पर बात उलटी ही हुई। भद्रिकादेवी ने पृथिवी पर गिरते-गिरते और भी महा भयंकर शोर मचाया जिसको सुनकर प्रतीत होता था मानों प्रलयकाल समीप आ गया है। उस घोर शद्ध से प्राणियों के भय की तो कौन क्या बात कहै पर्वत भी कम्पते दिखाई देते थे। वृक्ष स्वतः ही पृथिवी से अधर हो इधर-उधर दौड़ने लगे थे। इस प्रकार यद्यपि कुछ देर के लिये समस्त प्राणी संकट में पड़ गये थे तथापि यह कहना उचित नहीं कि उस समय देवी सुख का अनुभव करती हो। वह मूच्र्छित हो उस दशा में पहुँची थी जिसको अपने प्राणों का भी सन्देह होने लगा था। इसी हेतु से अत्यन्त शीघ्रता के साथ उसने श्री महादेवजी का स्मरण किया। तथा अभ्यर्थना की कि भगवन् इस अवसर पर मुझे महा संकट प्राप्त हुआ है। अतः शीघ्र रक्षा करो-करो। इस समय आपके अतिरिक्त मेरा कोई आश्रय नहीं है। हे कैलासधीश मैं आपकी दासी हूँ। अतः शीघ्र उपस्थित हुइये। यह सुन भक्तवत्सल दयानिधि श्री महादेव जी से कुछ क्षण भी कैलास में न ठहरा गया। देवी की आत्र्तवाणी सुनकर आपका हृदय आद्र्रीभूत हो गया। अतएव आप तत्काल ही वहाँ से प्रस्थान कर घटनास्थल में पहुँचे। ठीक उसी समय जब कि मत्स्येन्द्रनाथजी श्रीमहादेवजी को अकस्मात् सम्मुख आते देखा तब कतिपय पादक्रम आगे बढ़कर सिर नमन तथा आदीश-आदीश शद्धपूर्वक उनका स्वागत किया। शिष्य की प्रणति का प्रत्युत्तर दे श्री महादेवजी ने कष्टदशा में पड़ी हुई देवी की ओर देखा। और मत्स्येन्द्रनाथजी से कहा कि देवी तो घोर कष्ट का अनुभव कर रही है। तुम धन्य हो जिसका पराजय करना दुःसाध्य था उसको तुमने नीचा दिखला दिया। एवं इसको जो अपने सामथ्र्य का महान् अभिमान था और उससे बड़े-बड़े राक्षसों को पराजित कर यह अपने आपको अजयमान बैठी थी आज इसको पराजित कर तुमने यह दिखला दिया कि किसी का भी संसार में अपने आपको अजय मानना सर्वथा अनुचित है। कारण कि इस प्राकृतिक संसार में एक से एक अधिक शक्तिशाली अवश्य रहता है। तथा किसी अभिमानी के अभिमान को खण्डित कर अपने आत्मा को सर्व के प्रत्यक्ष दिखला देता है। इस बात का परिचय तुमने अच्छा दे डाला है। अतएव हम तुम्हारे ऊपर अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुम अपने अभीष्ट वर की याचना करो। उसे प्रदान कर हम अपने वचन की रक्षा करेंगे। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि भगवन् जब मैं आपका शिष्यत्व ही ग्रहण कर चुका हूँ तब मैं यह नहीं जानता कि जो कुछ दातंय वस्तु आपके पास थी वह आपने मुझ से छिपाकर रखी होगी। ऐसी दशा में बतलाइये मैं आपसे और क्या मांगूँ। तथापि आपके वचन की सफलतार्थ मैं आपसे इसी वर की याचना करता हूँ कि मेरे ऊपर आप सदा ऐसही कृपादृष्टि रखें कि मैं अपने मार्ग में अविचलित भाव से चलता रहूँ। श्री महादेवजी ने कहा कि अच्छा ऐसा ही होगा। आज तुम्हारे ऊपर हम अशेष प्रसन्न हुए हैं। कारण कि तुमने आज एक बहुत बड़ा कार्य कर दिखलाया है। बल्कि इतना ही नहीं तुमने हमारे शिष्यत्व को प्रकाशित कर संसार के इतिहास में उसे चिरस्थायी बना डाला है। परं अब तुम्हें उचित है देवी को शीघ्र स्वास्थ्य की प्राप्ति कराओ। यह अपने अभिमान का पूरा फल पा चुकी है। मत्स्येन्द्रनाथजी ने यद्यपि अपने आग्नेयास्त्र का प्रथम ही उपसंहार कर लिया था जिससे भद्रिका से अतिरिक्त कोई प्राणी इस समय कष्टाभिभूत न था तथापि देवी की मूच्र्छा निवारणार्थ समन्त्र विभूति प्रक्षिप्त कर आपने शीघ्र गुरुजी की आज्ञा का पालन किया। अब तो भद्रि का शीघ्र सचेत हो उठी और सम्मुख उपस्थित ही महादेवजी के चरणों में गिरी। तथा अभ्यार्थना करने लगी कि भगवन् मैं आज आपकी महती कृपा से ही सजीव विराजमान हूँ। अतएव प्राप्तावसरिक अमोघ दया के विषय में आपको एक बार नहीं बार-बार धन्यवाद है। आप सदा भक्तों के हितकारी और स्वल्प प्रार्थना से शीघ्र उपस्थित हो उनको अपने आशुतोषत्व का परिचय देने वाले हो। यह सुन श्री महादेवजी ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए उसको समझाया कि तुमको इस मत्स्येन्द्रनाथ के साथ विवाद करना उचित नहीं था। परन्तु अच्छा जो कुछ हुआ सो तो हो चुका आगे के लिये सचेत रहने की आवश्यकता है। कारण कि यह योगी है किसी से भी तिरस्कृत नहीं हो सकता है। अतः तुम को हर एक समय इसके अनुकूल रहना चाहिये। श्रीमहादेवी भद्रिका ने आपकी सूचना पर सश्रद्धा सिर झुकाया और वह मत्स्येन्द्रनाथजी से अपने कृत्य के विषय में क्षमा करने के लिये प्रार्थना करने लगी एवं कहने लगी कि अये मत्स्येन्द्रनाथजी मैं आपकी शक्ति से सर्वथा अनभिज्ञ थी। अतः अनभिज्ञता वशात जो मैंने कुछ अनुचित कह सुना डाला हो उस पर आप क्षमा प्रदान करें। तथा ऐसा न समझें कि मैं आभ्यन्तरिक भाव से आपके विषय में द्वेष रखूँगी कारण कि मैं जानती हूँ यद्यपि आपका अपने कलयाण के निमित्त तो अपनी सिद्धियों का चमत्कार व्यर्थ है। तथापि मुमुक्षु, जनों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये तथा अभिमानियों के अभिमान को नष्ट कर उनके हृदय में वैराग्य स्थापित करने के लिये ऐसा कर दिखलाना कोई व्यर्थ बात नहीं है। अतएव अब मैं भी सदा आपकी आज्ञानुकूल ही रहूँगी। और जो कुछ आप कहेंगे उसे शिरोधार्य समझुंगी। यह सुन कृतज्ञता प्रकट करते हुए मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि बस इतना ही करना तुम भी हमारी प्राप्तावसरिक सहायता के लिये तत्पर रहना। देवी ने कहा कि यदि मैं आपकी आज्ञा को पूरी न करूँ तो ब्रह्महत्यादि दोषों से दूषित हो जाऊँ। यह सुन देवी को धन्यवाद दे, श्रीमहादेवजी तो कैलास को गये और मत्स्येन्द्रनाथजी गदा तीर्थ के लिये प्रस्थानित हुए।

Wednesday, May 1, 2013

श्री मत्स्येन्द्रनाथ वीरबैताल वशीकरण वर्णन


श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी रामेश्वर से गमन कर जनों को योग का उपदेश देते हुए कुछ काल में बारामलेवार में पहुँचे। वहाँ के मांडवा नामक एक ग्राम की कुछ दूरी पर बाह्यस्थल में एक देवी का मन्दिर था। आपने उसी को ऐकान्तिक स्थान जान कर उसमें अपना आसन स्थिर किया। वहाँ सायंकाल तक बैठे हुए आप अलक्ष्य पुरूष का ध्यान करते रहे। ग्राम से कोई भी मनुष्य आपके समीप न आया। तब तो आपने विचार किया कि सम्भव है यह स्थान विघ्न सहित होगा। क्यों कि इसमें लोग कभी आते दिखाई नहीं देते हैं। अस्तु! इसी प्रकार के संकल्प विकल्प करते हुए आपका दिवस तो व्यतीत हो गया परन्तु जब रात्री देवी का आगमन हुआ और अन्धकार ने अपना पूरा अधिकार जमा लिया तब उस मन्दिर के समीपस्थ एक शून्य स्थल में सहसा सैंकड़ों दीपक प्रज्वलित हो उठे। जिन्हांे के तेज समूह ने अन्धकार को पराजित कर दूर भगा दिया। ठीक उसी समय मत्स्येन्द्रनाथजी की दृष्टि उधर पहुँची। देखते क्या हैं सैंकड़ों दीपक तथा मसालें जल रही है और सहस्त्रों मनुष्य वहाँ खड़े हुए दृष्टि में आते हैं एवं कोई आ रहा है तो कोई जा रहा है। कुछ देर के बाद उनकी मनुष्यों जैसी चेष्टा न देखकर तथा जब दिन में ही यहाँ कोई मनुष्य नहीं आता है तो रात्री में कैसे आ सकता है इस विचार से निश्चय किया कि अवश्य ये पिशाच हैं। ठीक इसी भय से लोगों ने इस मन्दिर में आना छोड़ दिया है। परं यह भी अच्छा हुआ मुझे शुभ अवसर मिल गया आज इन सबको अपने वश में करूँगा। यह दृढ़ निश्चय कर आपने अपनी झोली से विभूति निकाली और शक्ति आकर्षण मन्त्र पढ़कर उसे उनकी तरफ फैंक दिया। तत्काल ही समस्त भूत जड़ी भूत हो गये। उनकी चलने बैठने हिलने की अखिल शक्ति जाती रही। जैसा जो खड़ा बैठा चलता हुआ था वह प्रतिमा की तरह उसी प्रकार स्थित रहा। हाँ इतना अवश्य हुआ कि वाणी किसी की भी बन्ध न हुई थी। यह देख प्रेत लोग अत्यन्त विस्मित हुए परस्पर में कहने लगे कि अहो आश्चर्य है ऐसा तो कभी हुआ न सुना है। आज अकस्मात यह क्या विचित्र घटना उपस्थित हुई और किस कारण से हुई कोई कारण भी इस समय दृष्टि में नहीं आता है। हमने तो केवल बैताल जो हमारा राजा है उसकी सभा में जाने के लिये यह उत्साह दिखलाया था। परं अब क्या करें वहाँ कैसे जायें हमारा तो सर्व प्रयत्न निष्फल हुआ। यदि वहाँ समय पर न जाने पायेंगे तो न जाने बैताल हमको कितना कठोर दण्ड देगा। इस समय तो यहाँ पर कोई भी ऐसा नहीं दीख पड़ता है जो हमको इस अज्ञात व्याधि से मुक्त करै वा हमारी सूचना बैताल के यहाँ भेज दे ठीक जिस समय ये भूत ऐसा परामर्श कर रहे थे उसी समय उधर बैताल की सभा में अनेकानेक भूत आकर सम्मिलित हो चुके थे। परन्तु इधर के इन भूतों की प्रतीज्ञा की जा रही थी। कुछ देर होने पर वहाँ प्रस्ताव उपस्थित हुआ कि क्या कारण है उस मण्डल के भूत अभी तक भी न आये। यह सुनकर कई एक प्रधान भूतों ने बैताल को उस मण्डल के भूतों से विपरीत भडकाया और कहा कि महाराज वे अत्यन्त प्रमत्त हैं अनेक बार आपकी आज्ञा को भंग कर चुके हैं हम लोगों को दया आती है इसी कारण से आपको सूचना नहीं दी जाती है। परन्तु क्या करें कब तक इस तरह निर्वाह हो सकता है। साक्षात् आपके सम्मुख भी वे अपनी धृष्टता दिखलाते हैं। तब तो बैताल उनके ऊपर अत्यन्त क्रुद्ध हुआ। ठीक इसी अवसर पर बैताल के मन्त्रियों ने कहा कि कारण न जानकर सहसा कुपित होना तथा उनके लिये कठोर दण्ड का सोचना उचित नहीं है। अतएव किसी चतुर कर्मचारी को उधर भेजकर उनके समय पर उपस्थित न होने के कारण को जानों। तथा उनको युक्ति से समझाओ फिर भी यदि वे अनुकूल न होंगे तो अवश्य दण्डनीय समझे जायेंगे। यह सुनकर बैताल ने अपना एक प्रधान राज कर्मचारी उधर भेजा और उसे कह सुनाया कि आप उनको शान्ति के साथ लेवा लाओ। तब तो बैताल की आज्ञा प्राप्त कर राजपुरुष उसी ग्राम के भूतस्थल में आया। वहाँ देखता क्या है सहस्रों भूत उपस्थित हैं जिनमें कितने तो खड़े हैं और कितनेक बैठे हैं। परं चलते-फिरते नहीं दीख पड़ते हैं। अन्ततः अतीव समीप आकर सरदार ने पूछा कि क्या आप लोग आज बैताल की सभा में नहीं चलोगे। उन्होंने उत्तर दिया कि हम लोग वहीं आने के लिये एकत्रित हुए थे परन्तु ऐसी अज्ञात व्याधि उपस्थित हुई है जिससे हमारी चलने फिरने की समस्त शक्ति जाती रही है और शरीर पत्थर की तरह स्थूल हो गया है। यदि किसी प्रकार यह कष्ट निवारित हो जाय तो हम कुछ भी विलम्ब न करेंगे अभी आपके साथ शीघ्रता से वहाँ पहुँच सकते हैं। यह सुनकर सरदार ने बड़ा आश्यर्च माना एवं विचार किया कि मालूम होता है यहाँ पर कोई मन्त्रज्ञ आया होगा। जिसके सकाश से इनकी यह दशा हुई है। तदनन्तर जब वह इधर-उधर चलकर देखने लगा और उसी देवी के मन्दिर में आया तब तो उसकी दृष्टि मत्स्येन्द्रनाथजी के ऊपर पड़ी और उनका वेष उसकी तादृश ही दृष्टि में आया। तब तो उसने अनुमान से ही निश्चय कर लिया कि ठीक यह कृत्य इसी व्यक्ति का किया हुआ है। अतएव उसने मत्स्येन्द्रनाथजी से कहा कि अये तू कौन है। सच्च बतला इन भूतों को तेरे ही सकाश से यह असह्य कष्टावस्था प्राप्त हुई है क्या ? यदि ठीक यही बात है तो मेरा यह कहना अन्यथा न होगा कि आज अवश्य तुम मृत्यु के मुख में पड़ जाओगे। क्योंकि इनका राजा जो बैताल है वह बड़ा ही बली और प्रतापी है जिसके कोपाग्नि से तुम्हें अवश्य दग्ध होना पड़ेगा। यह सुनकर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि और वार्ता तो सब रहने दो प्रथम यह बतलाओ कि तुम यहाँ तक चलकर कैसे आये हो। उसने कहा कि मैं इनमें सम्मिलित नहीं था मैं तो इनके सभा में उपस्थित न होने के कारण को जानने के वास्ते बैताल ने यहाँ भेजा है। तब मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि जाओ बैताल की सभा में मेरा नाम लेना और कह देना कि एक मत्स्येन्द्रनाथ नाम का योगी है उसने समस्त भूतों को बान्धकर अपने वश में किया है। जिन्हों को छोड़ना भी स्वीकार नहीं करता है। सरदार ने कहा कि मैं सत्य बोलता हूँ मेरा वचन मानों बैताल बड़ा ही विक्राल है जो इस वृत्तान्त के सुनते ही तुम को मार डालेगा। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अये महानुभाव आप अधिक बातें न कर अपने अभीष्ट कार्य में दत्तचित्त हो जायें हम आपके प्रतापी बैताल से किंचित भी भय नहीं करते हैं। बैताल आपके लिये ही विक्राल काल दिखाई देता होगा जिस अवसर पर हमारे साथ उसका साक्षात्कार होगा उस समय देखना उसका प्रताप किधर जाता है। तदनु मत्स्येन्द्रनाथजी के वचनों को ठीक-ठीक याद कर सरदार बैताल की सभा में पहुँचा और पूर्वोक्त समग्र वृत्तान्त सुनाया कि एक मत्स्येन्द्रनाथ नाम के योगी ने समस्त भूतों को बान्ध रखा है। मैंने बहुत ही उसको समझाया परं उसने उनको छोड़ना स्वीकार नहीं किया। बल्कि छोड़ना तो दूर रहा उसने यहाँ तक कह डाला कि तुम जाओ बैताल को सूचित कर दो ये भूत नहीं छोडे जायेंगे। इसके लिये बैताल जो शक्ति व्यय कर सकता है करै, आगे आपके अधीन है उचित समझो सो करो। यह सुनते ही बैताल ने देशान्तर के आये हुए अनेक भूतों की एक बड़ी सेना तैयार कर घटनास्थल में प्रेषित की। वह कतिपय क्षण में मत्स्येन्द्रनाथजी के अभिमुख आ खड़ी हुई। तत्काल ही आपने अपनी झोली से एक चुटकी विभूति निकाली और प्रामत्तिक मन्त्र के जापपूर्वक उसको सेना की ओर फेंक दिया जिससे प्रेत लोग आपस में ही युद्ध करने लगे। युद्ध करते-करते समग्र रात्री बीत चली उनका युद्ध समाप्त नहीं हुआ। कितने ही प्रेत मारे गये, कितने ही पलायित हो गये। तब तो मत्स्येन्द्रनाथजी ने एक चुटकी और फेंक दी जिससे सेना युद्ध करने से तो बंद हो गई परं प्राथमिक प्रेतों की तरह चलनादि क्रियाओं से शून्य हो गई। उधर जब रात्री समाप्त हो चली तब तो बैताल ने अपना एक दूत और भेजा और कहा कि अत्यन्त शीघ्र जाओ देखो प्रातःकाल होने को आया अब तक कुछ भी समाचार नहीं आया सेना का क्या हाल है। यह आज्ञा मिलने पर दूत वहाँ पहुँचा और सेना का जहाँ की तहाँ मूच्र्छान्वित हुई स्थित देखकर अत्यन्त विस्मित हुआ। इस समय सेना की दशा जो उसने देखी वह ऐसी थी जिसको वह धैर्य के साथ अधिक देर तक न देख सका और अधीर होकर सहसा वापिस लौट गया। वहाँ जाकर बैताल के समक्ष सेना की कठिन अवस्था का समस्त वृत्तान्त सुना डाला। जिसके सुनने पर कुछ क्षण तो मानों बैताल मूच्र्छित ही हो गया था ऐसा मालूम होता था अन्त में सचेत सा होकर कहने लगा कि ऐसे पुरुष के साथ विरोध करना उचित नहीं है। यदि करेंगे तो हमारी भी वही दशा होगी। कारण कि अपने पास वह सामग्री नहीं जो उसके पास है। इसीलिये उसके साथ विरोध खड़ा करने पर हमारी विजय होनी भी अनिश्चित ही है। इस दृढ़ निश्चय के अनन्तर बहुत भूत लेकर बैताल मत्स्येन्द्रनाथजी के समीप आया। तथा आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार की विनम्र अभ्यर्थना करता हुआ कहने लगा कि महाराज मैं प्रेतों का स्वामी बैताल हूँ आपसे निवेदन करता हूँ कि आप कृपा कर अब इन भूतों को मुक्त कर दें। आपने कहा कि यह बात ठीक है मैने इनको सदा इसी प्रकार निश्चेष्ट रखने के लिये ही यह कृत्य नहीं किया है परं मैं चाहता हूँ जिस अभिप्राय से मैंने इस अनुष्ठान का अवलम्बन किया है आप लोग उसे ठीक-ठीक समझ लें। बैताल ने कहा कि यद्यपि हमने आपके इस कृत्योद्देश का अनुमान कर लिया है। परं अनुमान सर्वत्र सत्य नहीं निकलता है। अतएव सम्भव है हम आपके अभिप्राय से विपरीत बैठे। इसलिये आपको उचित होगा कि सबके समक्ष प्रत्यक्षतया अपने उद्देश्य को घोषित कर सुना दें। आपने कहा कि प्रेतों की मुक्ति के बदले में तुम्हें यह प्रतिज्ञा करनी होगी कि हम आपकी आज्ञा से कभी मुख न मोडेंगे। बैताल ने कहा कि अच्छा ऐसा ही होगा। जब तक वर्तमान प्राणों का मेरे इस विग्रह में संचार होता रहेगा तब तक आपकी आज्ञा का पूर्ण रीति से पालन किया जायेगा। आपने कहा कि समय पड़ने पर शीघ्र उपस्थित होने का वचन दो और इस बात को अपने हृदय में ठीक-ठीक जमा लो कि केवल वचन देने से ही आप कृतकार्य न होंगे जब तक की उसकी रक्षा करने के लिये दृढ़ निश्चय न कर लेंगे। बैताल ने कहा कि मैं अपने प्राणों का नाम ले चुका हूँ। अतः ये रहेंगे तब तक आपकी आज्ञा शिरोधार्य समझी जायेगी। परन्तु इतना आप को भी ध्यान रखना होगा कि जिस किसी भी कार्य के लिये जब मेरा आव्हान किया जाय तब मेरा आहार तो अवश्य उपस्थित करना पड़ेगा। आपने कहा कि यद्यपि हम इस विषय में कोई निश्चात्मक नियम नहीं कर सकते हैं तथापि ऐसे अवसर पर जहाँ कभी उचित समझा गया तो यह आहार उपस्थित किया जायेगा। अगत्या बैताल ने इस बात पर आखिर सन्तोष करना ही पड़ा। तदनु मत्स्येन्द्रनाथजी ने अपनी झोली से विभूति निकालकर शक्ति संचारक मन्त्र के साथ उसे प्रेतों की ओर फेंक दिया। जिससे वे समस्त प्रेत फिर पूर्ववत् शक्तिमान हो गये। यह देख मत्स्येन्द्रनाथजी को प्रणाम करने के पश्चात् समस्त भूतों के साथ बैताल अपने स्थान को चला गया और समय-समय पर आहूत हुआ, मत्स्येन्द्रनाथजी का कार्य सिद्ध करने लगा।
इति श्री मत्स्येन्द्रनाथ वीरबैताल वशीकरण वर्णन