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जाग मचिन्दर गोरख आया I

श्रीमद् योगेन्द्र गोरक्षनाथजी के विमल कमलोपम हृदयात्मक स्थान में स्वकीय अद्भुत शक्ति के विश्वास का तथा गुरुभक्ति का अपरिमित अटल साम्राज्य ...

Monday, April 29, 2013

श्री गोरक्षनाथ चरित्र

पाठक ध्यान रखिये श्रीगोरक्षनाथजी को सजीव करते समय श्रीमहादेवजी ने जो अपना गूढ़ मन्त्र प्रदान किया था उससे यद्यपि आपका हृदय इतना महत्त्व प्राप्त कर चुका था कि आपने तप आदि का अवलम्बन किये बिना ही योग में पूर्ण कुशलता प्राप्त कर ली थी। तथापि प्रथा प्रचलित करने के लिये और तपश्चर्या आवश्यकीया है। यह वार्ता सूचित करने के लिये कुछ काल पर्यन्त तप करना ही उचित समझा तथा गुरुजी के सम्मुख इस बात को प्रकट भी कर दिया। अतएव इस विषय में प्रसन्नता सूचित करते हुए श्री मत्स्येन्द्रनाथजी कुछ दिन गोदावरी के तटस्थ उस स्थान में निवास करके सशिष्य बदरिकाश्रम में पहुँचे। वहाँ एक रमणीय स्थल देखकर आपने अपना आसन स्थिर किया और आन्तरिक भाव से श्री महादेवजी की स्तुति करी। जिसने श्री महादेवजी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित किया। अतएव शिष्य की अभ्यर्थना पर पूरा ध्यान देते हुए श्री महादेवजी अविलम्ब से ही बदरिकाश्रम में आये। इधर मत्स्येन्द्रनाथजी ने ज्यों ही गुरुजी को आते हुए देखा त्यों ही आसन से उठ दो-चार पद आगे चलकर स्वागतिक वाक्यों का प्रयोग करते हुए उनको साष्टांग प्रणाम किया। ठीक इसी प्रकार गुरुजी का अनुकरण करते हुए गोरक्षनाथजी ने भी श्री महादेवजी का सत्कार किया। इस तरह पारस्परिक अभिवादन प्रत्याभिवादन अनन्तर जब तीनों महानुभाव यथायोग्य स्थल पर बैठ गये तब श्री महादेवजी ने कहा कि मत्स्येन्द्रनाथ किस कार्य विशेष के लिये हमारा स्मरण किया गया है। उत्तरार्थ उन्होंने कहा कि यह हमारा शिष्य गोरक्षनाथ कुछ दिन पर्यन्त तप करने में नियुक्त होना चाहता है। अतएव कठिन तपश्चर्या काल में कुछ समय के लिये किसी दूसरे निरीक्षक पुरुष की आवश्यकता है। मैं यहाँ निवास कर इस कार्य में सहायता नहीं दे सकता हूँ। कारण कि मैंने नीचे के प्रान्तों में जाकर किसी विशेष कार्य का आरम्भ करना है। यह सुन दयानिधि भगवान् महादेवजी ने कहा कि ठीक है तुम इसको तप करने में प्रोत्साहित करो। इसके शरीर वा तप विधि में कोई हानि नहीं आयेगी। हम स्वयं इसकी रक्षा करने के लिये उत्कण्ठित हैं। क्या तुम नहीं जानते मनुष्य को एकान्तिक स्थान में बैठकर स्वकीय चित्त को स्वाधीन रखते हुए मेरी प्रार्थना करना ही मुश्किल है। परन्तु वैसे पुरुष की सर्व प्रकार से रक्षा करना मेरे लिये कोई कठिन बात नहीं है। यह सुन मत्स्येन्द्रनाथजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और गोरक्षनाथजी की ओर इशारा करते हुए कहने लगे कि धन्य-धन्य तुम्हारे भाग्य जो कि त्रिलोकी के नाथ स्वयं तुम्हारी रक्षा के लिये प्रथमतः ही साकांक्ष है। तदनु शिष्य प्रशिष्य से सत्कृत हो श्री महादेवजी तो कैलाश के लिये प्रस्थानित हो गये। इधर मत्स्येन्द्रनाथजी ने जिसमें पैर का अंगुष्ठा प्रविष्ट हो सकता हो ऐसी एक लोहे की खोली तैयार कराई और एक दिन अच्छा मुहूर्त देखकर उसे गोरक्षनाथ जी के अंगुष्ठ में पहनाया। एवं ऊध्र्वबाहु तथा नासिकाग्रदृष्टि कराकर बारह वर्ष के लिये शिष्य को तप करने में नियुक्त किया और त्रिलोकी के नाथ इसके रक्षक हैं ही यह स्मरण कर गोरक्षनाथजी से कहा कि बेटा हम तो नीचे देशान्तर की भूमि पर भ्रमण करने के लिये जाते हैं भगवान् अलक्ष्य पुरुष करे तुम्हारा कल्याण हो। परन्तु मैं प्रस्थान के समय एक वार्ता तुम्हें बतला देता हूँ केवल दत्त चित्त होकर उसे सुन लेने मात्र से ही कार्य सिद्ध नहीं होगा प्रत्युत उसका प्रतिक्षण स्मरण रखना होगा और वह यह है कि कतिपय दिनों में तुम्हारा तप खण्डित करने के लिये स्वर्ग से बड़ी-बड़ी सुन्दर अप्सरायें तथा देवता आयेंगे तथा अनेक प्रकार के लोभ नृत्यादि दिखलाकर तुम्हारा चित्त मोहेंगे। एवं ब्रह्मा विष्णु महेश जी का नकली रूप धारण कर झूठा वरदान देने के लिये तैयार हो जायेंगे। तथा कहेंगे कि हे तपस्विन् अब तुम तप करना छोड़ दो क्योंकि तुम्हारा तप पूर्ण हो गया है। इसीलिये हम सब तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हैं तुम वर माँगो। परन्तु तुम उनके ऐसे प्रलोभन में आना तो दूर रहा उनक ओर दृष्टि तक नहीं करना। यह देख उन्हें स्वयं झख मारकर वापिस लौटना पड़ेगा। गुरुजी की यह अन्तिम आज्ञा सिर धरते हुए गोरक्षनाथजी ने अतीव कोमल वाणी से नत्रतापूर्वक उनको प्रस्थान करने के लिये कहा। तदनु मत्स्येन्द्रनाथजी ने वहाँ से प्रस्थान किया और चलते समय एक बार आप फिर कह उठे कि देखना देवताओं के छल बड़े ही दुर्विज्ञेय होते हैं। मैं बारह वर्ष की पूर्ति के समय जब वापिस लौटूँगा तब ही तुमको बैठा दूगा। इस अवधि के पूर्व बैठो तो तुम्हें मेरी ही आज्ञा है यह कहकर मत्स्येन्द्रनाथजी तो गमन कर गये। गोरक्षनाथजी वायु के आहार से ही शरीर की वृत्तिका संचालन करने के लिये अभ्यास करने लगे। कुछ ही दिन में आपका यह अभ्यास परिपक्व हो गया जिससे शरीर शुष्क हो लकड़ी जैसा बन गया। त्वचा अस्थियों में प्रवेश कर ऐसी प्रतीत होती थी मानों है ही नहीं। शरीर के चैंतरफ कुशादितृण इस प्रकार ऊग गया था जिससे तपस्वीजी का शरीर आच्छादित हो गया। केवल मन्दस्पन्द कमल की तरह स्फुरण करते हुए तेजस्वी नेत्र ही तृण झरोखे से चमकते दिखाई देते थे। आपके इस कठिन तप प्रताप से वहाँ वर्षा अधिक होती थी जिससे जगह-जगह पर जल के झरने बह रहे थे और फल-फूलों से युक्त वृक्षों के ऊपर बैठकर फल खाते हुए नाना प्रकार के पक्षी नाना ही प्रकार के मधुर-मधुर शब्द कर रहे थे। अनेक प्रकार के पुष्पों की सुगन्ध से सुगन्धित हुआ पर्वत ऐसा शोभायमान हो गया था मानों दूसरा कैलास ही तैयार हो गया हो। ठीक ऐसे ही अवसर में हिमालय पर्वत की सैर करने के अभिप्राय से विमानारूढ़ हुए बसुजी स्वर्ग से आ रहे थे। उन्होंने ज्यों ही इस पर्वत के ऊपर पदार्पण किया त्यों ही इसकी औग्दामनिक सुगन्ध वसुजी के विमान तक पहुँची। यह देखते ही बसुजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और आभ्यन्तरिक विचार से कहने लगे कि क्या कारण है यह पर्वत जितना सुगन्ध युक्त है उतना अन्य कोई नहीं जान पड़ता है। अच्छा नीचे उतरकर देखना चाहिए। अतः जब बसुजी नीचे आये और विमान से उतर इधर-उधर भ्रमण करने लगे तब तो पर्वत की शोभा ने बसुजी का चित्त इस प्रकार मस्त बना दिया कि कुछ क्षण तो उनको अपने विमान का भी स्मरण न रहा। अनन्तर जब अपने आप में आये तो अत्यन्त आश्चर्य प्रकट करने लगे तथा कहने लगे कि हमने अब जैसी इस पर्वत की शोभा कभी पहले नहीं देखी थी। क्या ही आश्चर्य है बिना ही बसन्त ऋतु हुए यहाँ के वृक्षों ने बसन्त ऋतु को बुला भेजा है। परन्तु मालूम होता है यह व्यतीकर स्वतः नहीं अवश्य यहाँ किसी जगह पर कोई महापुरुष विराजमान होगा जिसके तप और भाग्य ने इस समय बसन्त ऋतु का आकर्षण कर लियेा है। जिसके द्वारा पशु-पक्षी और वृक्ष स्वीय-स्वीय यौवन की सूचना दे रहे हैं। अस्तु। उस समय बसुजी ने बन की शोभा देखकर इन्द्रपुरी के नन्दन वन से भी अधिक आनन्द प्राप्त किया। उधर से ठीक इसी अवसर पर श्री महादेवजी भी अकस्मात् यहीं आ निकले। जिन्हें देखते ही बसु जी ने यथा योग्य प्रणाम किया। इसका उत्तर देते हुए श्रीमहादेवजी ने कहा कि बसुजी चलो तुमको एक तपस्वी के दर्शन करायेंगे। बसुजी ने कहा चलिये भगवन् आपकी कृपा से मुझे भी आज उस महानुभव का दर्शन हो जायेगा। तदनु दोनों महानुभाव जब गोरक्षनाथ जी के समीप गये तब समस्त शरीर का भार पैर के एक अंगुष्ठे पर धारण किये हुए तथा रुधिर शुष्क हो जाने के कारण पिंजर हुए ऊध्र्वबाहु शरीर वाले एक तपस्वी उनके दृष्टिगोचर हुए। जिन्हें उनकी कठिन से कठिन अवस्था का मर्म समझते हुए बसुजी का हृदय दया से परिपूर्ण हो आया। अतएव उसने श्रीमहादेवजी से कहा कि भगवन् यह तपस्वी अत्यन्त घोर तप कर रहा है ऐसा तप करता हुआ कोई आज पर्यन्त हमारे देखने में नहीं आया है। इसके माता-पिता और गुरुजी को धन्यवाद है जिन्होंने ऐसे सुपात्र पुरुष को पैदा किया और तप करने में इतना दृढ़ विश्वासित किया है। अब इसका तप पूर्ण हो गया है अतः बैठा देना चाहिये। श्री महादेवजी ने कहा कि इसने बारह वर्ष की अवधि रखकर तप करना आरम्भ किया है इसलिये यह उसी अवधि पर बैठाया जायेगा। इसक उत्तर में बसुजी और क्या कहते, अतः तदनन्तर श्री महादेवजी के कथन पर अच्छा आपकी इच्छा यही कहना पड़ा। तदनन्तर श्री महादेवजी तो कैलास को चले गये। और बसुजी इन्द्र की सभा में पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने गोरक्षनाथजी के तप की प्रशंसा की। तत्काल ही इन्द्र के भी गोरक्षनाथजी के तप स्थान देखने की इच्छा उत्पन्न हुई। तथा विमान तैयार कर लेने की आज्ञा देते हुए उसने बसुजी से कहा चलो ऐसे महात्मा का हमको भी दर्शन करा लाओ। बसुजी फिर वापिस लौटने को तैयार हो गये और विमानरूढ़ हुए दोनों महानुभाव कुछ देर में घटनास्थल में आये। गोरक्षनाथजी के तप काठिन्य को देखकर आभ्यन्तरिक रीति से विस्मित हुआ इन्द्र, यह तो घोर तप में प्रवृत्त है ऐसा न हो कभी मेरा राज्य प्राप्त करना ही इसका उद्देश्य हो। यह विचार कर अत्यन्त शोकान्वित हुआ। तथा अनेक भावों में परिणत हुआ वापिस ही लौट गया। राजधानी में पहुँचकर उसने एक महत्ती सभा की। जिसमें सभी श्रेणी के देवता विराजमान थे। उन सब के समक्ष इन्द्र ने प्रस्ताव किया तथा आज्ञा दी कि जिस किसी उपाय से गोरक्षनाथ का तप खण्डित करना चाहिये। अन्यथा बहुत सम्भव है वह मेरा पद स्वायत्त कर लेगा। उसके कर्मचारियों ने उसकी इस आज्ञा का सत्कार करना ही उचित समझा। अतएव उन्होंने उस समय इन्द्रजी की आज्ञा स्वीकृत कर अनन्तर अनेक प्रकार के भोजन तथा गान्धिक द्रव्यों के सहित बड़ी-बड़ी मनोहारिणी रुपवती अप्सरायें एवं अनेक रूपान्तर धारण क्रिया में चतुर देवता गोरक्षनाथजी के तपस्थान में भेजे। यह देख किसी देवता ने इन्द्र को इस बात से सचेत किया कि गोरक्षनाथजी के रक्षण की जुम्मेदारी श्री महादेवजी ने ग्रहण की है। अतएव उनकी प्रक्रिया खण्डन के द्वारा ऐसा न हो कभी और ही अनिष्ट उत्पन्न हो जाय। उसने इस चेतावनी पर उपेक्षा प्रकट कर, नहीं यह कार्य आन्तर्धानिक रीति से किया जायेगा यह कहते हुए उनको जाने की आज्ञा दे ही डाली। वे छली लोग गोरक्षनाथजी के तपस्थान में आये। यद्यपि उनकी यह कार्यावली श्री महादेवजी से भी छिपी न रही थी तथापि आपने, हम गोरक्षनाथ का कुछ अनिष्ट तो नहीं होने देंगे परं देखें इसमें दृढ़ता कितनी और मत्स्येन्द्रनाथ का अन्तिम वचन याद है कि नहीं, यह सोचकर उनको अपने चरित्र करने का अवसर दे दिया। अस्तु। उन देवताओं ने जब गोरक्षनाथजी के विस्मापक शरीर की दशा देखी तब तो उनके रोम खडे हो गये। तथा उनके हृदयात्मक सागर में करूणात्मक तरंगायें झकोले मारने लगी। साथ ही अपूर्व तपस्वी निश्चित कर उनके हृदय में भय भी उत्पन्न होता था। इसी हेतु से उन्होंने गोरक्षनाथजी के विषय में किसी भी प्रकार का छल-कपट न करके उनको निर्विघ्न रहने देने के लिये इन्द्र को सूचित करना पड़ा। परन्तु वे बिचारे क्या करते और कब तक ऐसा कर सकते थे आखिर तो इन्द्र के नोकर ही थे। यही कारण हुआ उसकी सदण्ड आज्ञा सुनकर उनको अपना कृत्य करना ही पड़ा। अर्थात् उन्होंने प्रथम तो मधुर से मधुर वस्तु सेवन के लिये गोरक्षनाथजी को बाध्य किया। बल्कि यहाँ तक कि उनके मुख में मिठाई लगाकर आस्वादन लेने के भ्रम से व्यर्थ ही कष्ट दिया। परं जब इस कृत्य से उनको कुछ भी सफलता प्राप्त न हुई अर्थात् तपस्वीजी ने खाना तो दूर रहा उनकी और दृष्टि तक भी न करी तब तो फिर महात्माजी के अति समीप आकर अप्सरायें अनेक प्रकार से नृत्य करने लगी। और शृंगार विषय के विविध सुरीले ले राग गाने लगी। परं श्री महादेवजी के प्रशिष्य ने अपना आसन दृढ़ रखते हुए उनकी ओर अपने चित्त को कीाी न जाने दिया। तथा गुरुजी के वचन का स्मरण करते हुए उसका प्राण जाने तक पालन करने का निश्चय कर लिया। अन्ततः वही हुआ जो श्री मत्स्येन्द्रनाथजी ने प्रथमतः ही कह डाला था। अर्थात् अप्सरायें कूद-कूद कर अत्यन्त श्रीमित हो गई। अतएव वापिस लौट कर इन्द्रपुरी को चली गई। वहाँ जाने पर इन्द्र प्रार्थना की कि भगवन् वह तपस्वी कोई साधरण पुरुष नहीं है। उसने हमारा सब प्रयत्न विफल कर डाला। यह सुन कुछ कुपित और निराश हुआ इन्द्र उन्हीं छली देवताओं के सहित गोरक्षनाथजी के समीप आया। एवं ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों देवों का नकली रूप धारण कर कहने लगा कि हे योगिन् आसन खोलकर बैठ जाओ। तुम्हारा तप समाप्त हो गया है, हम तीनों देव प्रसन्न होकर तुम्हें वर देने के निमित्त से यहाँ आये हैं। अतः अब हमारे से कुछ वर माँगों। परन्तु तपस्वीजी के तो गुरुजी का वाक्य हृदय में समा गया था एवं उनका दृढ़ निश्चय था कि गुरुजी के आये बिना ब्रह्मादि देवता छै मास तक भी मेरे से बैठने का अनुरोध करें तो भी नहीं बैठूँगा। यही कारण हुआ इन्द्र का भी प्रयत्न निश्फल रहा जिससे इन्द्र को और भी कुछ भय हुआ और वह अपनी राजधानी को लौट गया। वहाँ जाने पर भी प्रतिदिन इसी वार्ता का ध्यान रखता था कि अवश्य ऐसा अवसर उपस्थित होने वाला जान पड़ता है जिससे शायद ही मेरे पद तादवस्थ्य रहे। यद्यपि इन्द्र की दृष्टि में उसका पद उसे बहुत बड़ा और अच्छा मालूम होता था। परन्तु गोरक्षनाथजी की दृष्टि में वह पद लेस मात्र भी शुभ देने वाला नहीं दिख पड़ता था। अस्तु कतिपय दिनों में जब तपस्र्यावस्था की समाप्ति का दिन समीप आ गया तब श्री मत्स्येन्द्रनाथजी भी वहाँ आ पहुँचे और अपने परम् प्रिय सुपात्र शिष्य को उसी तरह खड़ा हुआ देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। कुछ ही क्षणों के अनन्तर उधर से श्रीमहादेवजी भी वहीं आ गये। दोनों की पारम्परिक आदेश 2 आत्मक प्रणाम के अनन्तर भी महादेवजी ने अपने शिष्य से कहा कि अब तो इसको बैठा देना उचित है। इस प्रकार गुरुजी की आज्ञा प्राप्त कर मत्स्येन्द्रनाथ जी ने गोरक्षनाथजी का आसन खुला दिया और उसको अपनी गोद में बैठाकर अत्यन्त सत्कृत किया। शिष्य को अपना वचन पूरा करते हुए देखकर मत्स्येन्द्रनाथ जी के इतना प्रेम उत्पन्न हो गया था कि उनके नेत्रों में जल भर आया। तदनु श्रीमहादेवजी ने भी प्रशिष्य को गोद में बैठाकर शिष्य का अनुकरण करते हुए असंख्य धन्यवाद दिया। तथा मत्स्येन्द्रनाथ जी की अनुमति के अनुसार फिर कैलास को प्रस्थान किया। उधर मत्स्येन्द्रनाथ जी कुछ दिन बदरिकाश्रम में निवास करते गोरक्षनाथजी को एकाएकी भ्रमण करने की अनुमति दे स्वयं फिर नीचे के प्रान्तों में आकर विचरने लगे।

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