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जाग मचिन्दर गोरख आया I

श्रीमद् योगेन्द्र गोरक्षनाथजी के विमल कमलोपम हृदयात्मक स्थान में स्वकीय अद्भुत शक्ति के विश्वास का तथा गुरुभक्ति का अपरिमित अटल साम्राज्य ...

Wednesday, June 5, 2013

श्री करणारिनाथ भ्रमण वर्णन ( करणारिनाथ के वर प्रदान से करणी देवीनाम)

प्रिय पाठक महानुभाव ! आप उक्त अध्यायों में पढ़ चुके हैं कि मीननाथजी तथा धुरन्धरनाथजी ने रेवननाथजी के एवं चर्पटनाथजी के द्वारा स्वोपरि आरोपित होने वाले कार्यक्रम को आत्यन्तिक सावधानी तथा कुशलता के साथ निर्वाहित किया। परन्तु जब आप लोगों को हिंगलाजाधिष्ठित स्थानस्थ समाधिनिष्ठ श्री ज्वालेन्द्रनाथजी के जागरित हो जाने की असन्दिग्ध सूचना प्राप्त हो गई तब तो आपने अपने उत्तरदायित्व से अपने को विमुक्त समझकर अपने शिष्य ’ करणारिनाथ को तथा निरंजननाथ को, तुम सावधानी से विचरण करते हुए ज्वालेन्द्रनाथजी की आज्ञा में तत्पर रहना, यह सूचना दे मोक्ष साधनीभूत विशेष उपायों में यत्नलीन होने के अभिप्राय से श्री आदिनाथ रक्षित महापवित्र स्थान कैलास में जाकर निवास आरम्भ किया। इधर आपकी आज्ञानुसार स्वकीय शिष्य करणारिनाथ और निरंजननाथ ने ज्वालेन्द्रनाथजी की सेवा में, जो अभी तक उसी जगह पर शारीरिक स्वास्थ्य की प्रतीक्षा कर रहे थे, उपस्थित हो उन्हें स्व-विषयक गुरु आज्ञा से विज्ञापित किया। यह सुन अतीवानन्दित हो आपने परामर्श दिया कि कुछ दिन के अनन्तर हम भी आते हैं तुम जाओ अभीष्ट प्रदेशांे में योगोपदेश कर अपने कर्तव्य का पालन करो। तथा जहाँ कोई अवसर ऐसा आ जाय जिसमें हमारी आवश्यकता अवश्यम्भावी हो वहाँ हमंे सूचना अवश्य देते रहना। ज्वालेन्द्रनाथजी की यह आज्ञा अंगीकार कर दोनों महानुभाव अपने-अपने गुरुओं के द्वारा स्वाधिकृत किये जाने वाले देशों को लक्ष्यस्थान बनाते हुए वहाँ से वापिस लौटे। जो समुद्र तटस्थ प्रदेशों में भ्रमण करते हुए कच्छ नामक प्रदेश तक साथ ही आये थे। यहाँ से पारस्परिक अभिवादनानन्तर करणारिनाथजी दाक्षिणात्य देश की ओर प्रस्थानित हुए गिरनारादि स्थानों को वैश्रामिक बनाकर सौराष्ट्र देशीय सीमा प्रान्तस्थ श्री नर्मदा नदी के ऊपर जा विराजे। यहाँ, वररूचि, आधुनिक प्रसिद्ध भरूच नामक एक नगर के समीपस्थ किसी ऐकान्तिक स्थान में आपने रात्री का परिहार करने के अभिप्राय से अपना आसन स्थापित किया। इस गर्तखण्डर व्याप्त निर्जन स्थान के नगर से कुछ दूरी पर एवं एकान्त होने से बिना विशेष प्रयोजन हुए यहाँ कोई मनुष्य आता न था। परं एक क्षत्रियाणी वृद्धा स्त्री जो गृह में केवल एक पंगुपति द्वितीया थी और वन क्षेत्र संचितकाष्ठ भार तथा शुष्क गोमयभार विक्रय से उपलब्ध अन्नादि के द्वारा ही अपना जीवन निर्वाहित किया करती थी।   यह  ही  श्रीमती दैवगत्या उस दिन अपने उक्त कृत्य के सम्पादनभिप्राय से आरण्ये संचित करती हुई उधर जा निकली। और इसने आपको अपूज्य मन्दिर के अग्रिम विस्तृत चतुष्कोण उच्च स्थल पर विराजमान हुए देखा। तथापि उस समय सश्रद्धा आभ्यन्तरिक प्रणति के अतिरिक्त बाह्य प्रात्यक्षिक कोई चेष्टा प्रदर्शित न करके वह स्वकीय कृत्यपूर्ति में व्यग्र रही। तथा कार्य सम्पादित हो जाने पर सूर्य अस्त होते-होते अपने गृह को गई। परन्तु उस भारविक्री के सकाश से यथोपलब्ध अन्न की रोटी बनाकर महान् अन्धकाराच्छादित मार्ग का अतिक्रमण करती हुई नाथजी की सेवा में उपस्थित हुई। उधर ज्यों ही करणारिनाथजी ने सन्निहित स्थित वृद्धा की ओर विशेष दत्त दृष्टि द्वारा अवलोकन किया त्यों ही आकारानुमिति से निश्चय हुआ कि यह वही दीनदृष्टा वृद्धा स्त्री है। अतएव आभ्यन्तरिक भाव से प्रसादित करणारिनाथजी यह सोच रहे थे कि गोमयादि संचयन कृत्य से अनुमान होता है यह कोई अत्यन्त दरिद्रा अर्थात् कंकालिनी है इसीलिये यह स्वजीवन निर्वाहानुकूल जो द्रव्यादि की याचना करेगी उसकी पूर्ति कर हम इसकी इस विनम्र सेवा का निर्यातन करेंगे। परं वह अत्यन्त बुद्धिमती थी उसकी यह धारणा थी कि निःस्वार्थ भाव से की हुई महात्माओं की सेवा कभी निष्फल नहीं होती है। बल्कि याचना के बिना जितना सेवा का शीघ्रफल होता है उतना याचना होने पर नहीं होता है। अतएव वह श्रद्धेयभोजन प्रदान करने के अनन्तर शीर्षण्य नमस्कार कर चुपचाप वापिस लौट आई। इस करूणाधिक्य घटना को देख दयाद्रवीभूत करणारिनाथजी कुछ विस्मयान्वित हुए विचार करने लगे कि सम्भव है चुपचाप लौटने के प्रथम श्रद्धेय वृद्धा ने यह अवश्य निश्चय किया होगा कि नाथजी जब दिन मंे मेरी दशा से परिचित हो चुके हैं तो क्या याचना के बिना ही इस विषय में कुछ विचार न  करेंगे, किन्तु अवश्य करेंगे। अतः मुझे योग्य है मैं इसके निश्चय को व्यर्थतोपहित न होने दूँ और इसको कोई ऐसा साधन बतला दूँ जिससे यह अपने अभीष्ट प्राप्ति कर सके। परन्तु आपकी इस विचार स्थिरता के समय तक नगर के समीप जा पहुँची थी इसलिये सम्मुख हो उसके अभीष्टा सिद्धि विषयक साधन प्रदान के असम्भव होने से आपका निश्चित भाव किम्प्रयोजन ही रहा और आप इस बात का पश्चाताप करने लगे कि उसकी उपस्थिति के समय मौन रहकर निःसन्देह हमने भूल की है। परं अब करते क्या वह अवसर हस्त से निकल गया इस समय भी उसके अनुगामी होते तो भी उससे सम्मेलन होना दुष्कर था। खैर यह निश्चय कर कि दिन में इस विषय की यथा साध्य रीति से गवेषणा अवश्य करेंगे, ऐकान्तिक भाव से आरामोपलब्ध हुए और रात्री गमनोत्तर प्रातःकाल ही उक्त मनोरथाश्रित हो नगर को लक्ष्यस्थान बनाकर वहाँ से प्रस्थानित हुए। तदनु कुछ देर के पश्चात् जब आप नगर के तोरणद्वारा पर पहुँचे तब तो अकस्मात् एक स्त्री का करूणा क्रन्दन आपके श्रोत्रगत हुआ। उसके श्रवण मात्र से सहसा आपके यह अभिलाषा उत्पन्न हुई कि इसका निर्णय करना चहिये यह कौन स्त्री और किस कारण से रो रही है। ठीक इसी अवसर पर एक शौचार्थ बाह्य स्थल में जाने वाला मनुष्य आपके नेत्राभिमुख आया, उससे आपने पूछा कि क्यों भई यह कौन स्त्री है और प्रातःकाल किस कारण से विलाप करती है। उत्तरार्थ उसने कहा कि महाराज! मैं अभी शय्या से उठकर आया हूँ मुझे मालूम नहीं किस कारण से रोती है। हाँ यह तो मैं जानता ही हूँ कि यह गृह एक पंगुक्षत्रियका है और यह रोनी वाली उसकी स्त्री है जो निर्धन होने के कारण वन्य लकड़ी विक्रय द्वारा अपना अपने पादविहीन पति का जीवन निर्वाहित करती हुई पतिव्रत्य धर्म की रक्षा कर रही है। सम्भवतः इसी असह्य दुःखा हंकार से रोती हो। इससे अतिरिक्त विशेष खोजने की आवश्यकता हो तो आप स्वयं भी कर सकते हैं। यह कह कर वह मनुष्य तो अपने मार्ग में अग्रसर हुआ। परन्तु उस स्त्री के विषय में इस मनुष्य का, जो निर्धनत्व प्रतिपादन पूर्वक जांगली लकड़ी विक्रय हेतुक निर्वाहनात्मक परिचय देना था, उससे आपके चित्त में कुछ विशेष बन्धना सी हो गई। तथा संकल्प हुआ कि उक्त स्त्री का भी यही समाचार है सम्भवतः वह ही हो। इसी मनोरथाश्रित होकर आप उसके रूदनानुगामी हुए जब गृह के द्वार को पार करके भीतर प्रविष्ट हुए तब तो पदक्रम शब्द के श्रवण से उसने रोना स्थगित कर आपकी ओर देखा। बस क्या था झटिति उत्थानित हो आपके चरणारविन्द की ओर अग्रसर हुई। यह देख आपने उसका परिचय पाया और शीघ्रता के साथ, आप तो मेरी माता के तुल्य हो अतः चरणस्पर्श करना उचित नहीं, यह कहते हुए उसके हस्त को, जो चरणों की तरफ बढ़ाती थी, अवरूद्ध किया और प्रातःकालिक नित्यकर्म सम्पादन के समय अशुभसूचक करूणामय क्रन्दन करने का हेतु पूछा। उसने कहा कि भगवन् ! यह शय्यानिष्ठ मेरा पति जो पंगु होने के कारण और कुछ गृहादि का कार्य तो कर ही नहीं सकता था केवल इतना कि मैं स्वजीवन निर्वाहार्थ लकड़ी चुगने के लिये जब जंगल में जाती थी गृह के द्वार पर स्थित रहता हुआ द्वार खुला रखता था और कभी-कभी अपनी दरिद्रता के विषय का ध्यान होने से जो अपरिमित दुःख उपस्थित होता था तब एक-दूसरे को धैर्यान्वित किया करता था। परं हतभाग्य ईश्वर को इतना दुःख देने पर भी संतोष न हुआ इसको भी आज अपने समीप बुलाकर मुझे वियोगिनी बना डाला। बस यही कारण है इसी से मैं इस अनुचित समय में रो रही हूँ और चाहती हूँ कि मेरे भी प्राण अभी पक्षी हो जायें। परं न जाने भगवान् की इससे अधिक और क्या इच्छा है जिसने मेरे जीवात्मा को इसी पापमय पुतले में अभी तक बन्ध कर रखा है। यह सुन करणारिनाथजी ने कहा कि खैर जो कुछ हो चुका सो तो ईश्वरीयेच्छानुकूल ही हुआ है उसका अनुचित बतलाना योग्य नहीं परं आपको अपने जीवन विषय में विचार होना चाहिये। जब आपकी जीवन श्रृंखला अभी अक्षुण्ण है तब यह उचित नहीं कि उसके अप्राप्तावर में ही आप स्वयं उसे नष्ट करने का प्रयत्न करें। अतएव इस विषय के शोक को परित्यक्त कर यथा विधि अन्त्य क्रिया से अपने प्रिय पति को सत्कृत करो और अपने शेष जीवनानुकूल सुख के लिये जिस बात की उपयोगिता हो मुझे बतलाओ मैं उसकी उपलब्धि कर आपकी सेवा को नैर्यातनिक बनाऊँगा। इसके उत्तर में वृद्धा ने कहा कि महाराज! मैं आपके सम्मुख अधिकवाद विवाद न कर केवल एक ही बात कह देती हूँ यदि मेरे विषय में प्रसन्न हो आप मुझे सौख्यप्रद वस्तु प्रदान करना चाहते है तो वह उत्तम से उत्तम यही है कि आप मुझे ऐसा वर दें जिस वशात् मेरा अभी मरण हो जाय और मैं भी अपने प्राणनाथ के साथ भगवान् की सात्यलौकिक सभा में उपस्थित हो अपने जीवन चरित्र के याथाथ्र्य का निश्चय कर सकूँ। करणारिनाथजी ने वृद्धा होने पर भी पातिव्रत्य धर्म के प्रभाव से नेत्रोत्थ अपूर्व तैजसराशीवाली उस श्रीमती के निश्चित एवं तथा वचन सुनकर अनुमान कर लिया कि इधर-उधर की अन्यवातों से कुछ साध्य नहीं यह अवश्य स्वकथनानुसार ही करने वाली है। अतएव आपने कहा कि अपने गृहीत कठीन धर्मानुकूल जो आपको सर्वोत्तम फल मिलने वाला है वह तो अवश्यम्भावी है ही। परं इससे अतिरिक्त मैं अपनी प्रसन्नता के प्रसाद को प्रकटित कर देता हूँ। वह यह है कि मेरे विषय में विश्वास कर निःस्वार्थ सेवा करने का आपको यह फल मिलेगा कि कभी प्राप्तावसरिक समय में आप मारूस्थलीय देश में प्रकट होगी। और मुझ करणारिनाथ के वर प्रदान से आपकी ’ करणी देवीनाम द्वारा पार्वती के तुल्य प्रतिष्ठा होगी। अहो पाठक महानुभाव ! देखिये ईश्वर की क्या ही विचित्र लीला है। करणारिनाथजी उक्त वाक्य प्रदानित करते ही उसके प्राण, पक्षी नाम के भाजन बन गये। इस घटना को अवलोकित कर भगवच्चरित में विश्रम्भित हुए करणारिनाथजी वहाँ से प्रस्थानित हो नर्मदा तीर पर आये। और तरीवाहक को अपने पारंगत करने के लिये विज्ञापित किया। दैवगत्या इस नगर का ’ सामन्त जो किसी कार्यवश से अपने सहचारि संघ के सहित पार जाने वाला था उसकी प्रतिपालना में नौकायें तैयार थी। अतएव धीवरों ने कहा कि महाराज ! सरकार के जाने बाद आपको उतारा जायेगा इसलिये तब तक आप यहीं विराजिये। यह सुन आपने कहा कि क्या कोई समय निश्चित है वह कब आयेगा। उन्होंने उत्तर दिया कि कुछ मालूम नहीं हमको तो केवल इतनी ही सूचना मिली है कि नौकायें तैयार रखना और समय निश्चित तो इन लोगों का ऐसा ही हुआ करता है अपनी इच्छा के मालिक तथा राजा ही जो ठहरे जब अभिलाषा होगी तभी चल पड़ेंगे। यदि आज्ञा देने के अनन्तर मनोरथ शिथिल हो जाय तो न भी आयें ! क्योंकि कई एक बार ऐसा ही हम देख चुके हैं। तदनु करणारिनाथजी ने कहा कि हम लोग प्रातःकाल ही से गमन किया करते हैं यदि दिन बहुत चढ़ने के बाद वह आयेगा तो हमारा पार जाने का मनोरथ जो हम निश्चित कर चुके हैं व्यर्थ ही रहेगा। अतः तुम लोग प्रासाद में हमारी सूचना दो और सरकार के आने में विलम्ब हो तो हमारे पार छोड़ आने की आज्ञा ले आओ। यह सुन उन्हों में से एक ने कहा कि महाराज ! आप साधु हैं आपको क्या ऐसी शीघ्रता है जो अधीर होकर अपनी बात को राजा तक पहुँचाते हैं। यदि कहो कि हमको किसी कारणवश से अवश्य ही जाना है तो फिर आप योगी हैं एक क्षुद्र बात के लिये जो आप लोगों को दुःसाध्य नहीं है इतना विनम्र होने की क्या आवश्यकता है। उसके उत्तर में आपने कहा कि यह तो ठीक है परं थोड़ी सी बात के ऊपर अहंकार के आश्रित हो अपनी प्रभुता दिखला कर हम क्या तुम्हारे भरोसे हैं, यह जना देने की अपेक्षा हम कुछ समय विनम्र भाव रखना विशेष समुचित समझते हैं। इसके अतिरिक्त अन्त में योधा के विश्वासी शस्त्र से कार्य लेने के अनुसार हमको भी तुम्हारे कथन की रक्षा के लिये उस उपाय का अवलम्बन करना ही पड़ेगा जिससे हम पार हो सकते हैं। आपके इस कथन को श्रवणकर प्रथम वक्ता को भत्र्सना देता हुआ दूसरा मल्लाह बोला नहीं महाराज ! आप कुछ क्षण सान्त्वना के साथ बीतावें मैं किसी राजकीय कर्मचारी से प्रार्थना कर उसके द्वारा अभी सूचना प्रेषित करवा देता हूँ यदि अंगीकृत हुई तो हम शीघ्र आपको पार देंगे। अन्यथा हम निर्दोष तो अवश्य ही हो जायेंगे। यह सुन कारणारिनाथजी शान्त चित्त होकर वहीं विश्रामित हो गये। उधर राजप्रासाद में सूचना गई परं प्रतीक्षा करते-करते मध्यान्ह होने को आया न कोई प्रत्युत्तर मिला और न सरकार साहिब ही तसरीफ लाये। इस व्यवहार से आप कुछ अभिमर्शाकार में परिणत हुए। परं बहुत सोच विचार के बाद, सांसारिक लोग हैं इस पर भी राजा होने के कारण अनेक कार्यों मंे व्यग्र रहते हैं इसलिये सम्भव है किसी आवश्यकीय कार्य में संलग्न होने से इधर-उधर नहीं दिया होगा, यह निश्चयकर आपने अपने उदानवायु का जयन किया जिस वशात् अनायास से ही नर्मदा पार हो गये। यह देख मल्लाह तथा गंगास्नान करने वाले अन्य अनेक लोगोंे ने विस्मयान्वित हो आपके विषय में श्रद्धा एवं भक्ति प्रकट करते हुए योगक्रियाओं की प्रशंसा विषयक अनेक कथाओं का उद्घाटन किया। तदनन्तर कर्ण परम्परा से कुछ देर में इस घटना का शुभ समाचार राजा के श्रोत्रों तक पहुँचा। वह तत्काल ही अपनी प्रमत्ता का स्मरण कर इस ध्यान से कि सम्भवतः क्रुद्ध होकर महात्माजी कुछ ऐसा चिन्तन कर गये हों जिससे मेरा कोई अनिष्ट उत्पन्न हो जाय, अपने कुछ सहचारियों के साथ घटना स्थल पर आकर नौवाहक विज्ञापनानुसार आपके पदक्रमानुगामी हुआ और यौजनिक मार्गातिक्रमणानन्तर वह आपकी उपलब्धि कर सका। आपने पृष्ठ में देखा तब अनुमान किया कि वही राजा जिसका इधर आना श्रवण किया था अपने कार्य सम्पादन के लिये जा रहा है। परन्तु ऐसा न हुआ वह तो आपके सम्मुख होता ही सहचारि वर्ग के साथ साष्टांगप्रणति तत्पर हुआ तथा आत्यन्तिक विनम्र भावान्वित हो नतानन किये हुए अभ्यर्थना करने लगा कि भगवन् ! क्षमा कीजिये हम सांसारिक विविध विषय लोलुप तामसी जीव हैं सम्भव नहीं कि हमसे कोई भूल न होती हो। यह सुन करणारिनाथजी ने कहा कि बात क्या है हमें स्पष्ट कह सुनाओ हम अपने शुद्ध भाव के सहित मार्गतय कर रहे हैं अतः न तो किसी का हमने अनिष्ट किया है और न किसी ने हमारे लिये ही अनिष्टोत्पादक व्यवहार का अनुष्ठान किया है फिर क्षमा कैसी और किस बात पर करें। राजा ने कहा कि भगवन् ! नर्मदोतीर्ण करने के विषय में आपको जो नौका की अनुपलब्धि हुई है इसमें हम लोगों की प्रमत्ता कारण है जिसके उत्तरदायित्वानुकूल हम आपके अत्यन्त अपराधी हैं और आशंका करते हैं कि सम्भवतः हमारे इस अनुचित व्यवहार से आपकी कुछ तिर्यक् दृष्टि हो गई हो जिससे हमारा संसार में तादवस्थ्य रहना दुष्कर हो जायेगा। इसके प्रत्युत्तर में आपने कहा कि नहीं इतना विस्मित होने की कोई आवश्यकता नहीं है हम समस्त वार्ताओं का परामर्श करते हैं कोई समय ऐसा भी आता है जिसमें किसी आवश्यकीय कार्य सन्निहित चित्त वाले मनुष्य से प्राय ऐसी भूल हो जाया करती है। परं तो भी इतनी तुलना अवश्य करनी चाहिये कि कौन से कार्य में उपेक्षा करने से अधिक अनिष्टोपत्ति की सम्भावना है। क्योंकि हमने तो अनेक प्रकार के विचार द्वारा अपने चित्त को धैर्यान्वित किया इसीलिये तुम्हारे विषय में कोई भी अशुभ चिन्तन न करके चुपचाप चले आये। तथापि विचार कीजिये किसी विषय में आपकी ऐसी प्रमत्ता का भाजन कोई अन्य योगी हो गया और उसने इतना अज्ञानाधिक्य से उपेक्षाकारी निश्चित करते हुए आपको दण्ड ही देना उचित समझा तो याद रखना उससे इतना अनिष्ट उत्पन्न होगा जिसका जिस कार्य में दत्तचित्त हुए आप उसके वचन की उपेक्षा करते हैं वेसे अनेक कार्य शिथिल होने पर भी परिहार नहीं कर सकते हैं। अतएव मैं आप लोगों को आज से सचेत करता हूँ कि समयान्तर मेंे भी सम्पादित हो जाने वाले अनेक कार्यों का परित्याग कर महात्माओं की शुश्रुषा को प्राथमिक समझा करें। यह सुनकर अनुजीवियों के साथ राजा फिर आपके चरणों में प्रसृत हुआ तथा हस्तसम्पुटी कर आत्यन्तिक कृतज्ञता प्रकटित करना हुआ कहने लगा कि भगवन् ! अवश्य ऐसा ही होगा हम लोग आज से नियमित हो वह यत्न करेंगे जिससे भविष्य में ऐसा न हो कि आप महानुभावों के वचन एवं सेवा शुश्रुष में उपेक्षा प्रदर्शित हो सके। उसकी इस कोमल शब्दान्वित विनम्र अभ्यर्थना पूर्वक नियम धारणा के श्रवण मात्र से करणारिनाथजी अतीवानन्दित हुए कहने लगे कि अच्छा मैं आप लोगों के व्यवहार से अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ और आज्ञा देता हूँ कि अब आप लोग अपने स्थान को लौट जायें। आपकी इस आज्ञा के प्राप्त होने पर तृतीय नमस्कार के बाद राजा प्रसन्नमुख हो वापिस लौट गया। उधर उसके परावर्तनिक होने पर आप भी अपने मार्गानुगामी हुए और इत्यादि चरित्रों के द्वारा योग का महत्त्व प्रदर्शित कर लोगों के चित्त मंे उपरामता स्थापित करते हुए तथा अपने विषय में श्रद्धा उत्पन्न करने वाले भक्तों को अभिवांच्छित फल देते हुए कुछ काल में त्रिमुख पहुँचे। यहाँ गोदावरी स्नान के पर्वोपलक्ष्य पर बहुत प्रजाजन एकत्रित हो रहे थे। इधर विविध विचित्र चरित्रों के द्वारा इनमें से मुमुक्षु जनों को उद्धृत करने के अभिकाङ्क्षी हुए अनेक योगी भी यहाँ पर उपस्थित थे। अतएव आप भी आदेश-आदेश शब्दो उद्घोषित कर योगियों से सत्कृत हुए उनमें मिश्रित हो गये। आज कालिक योगियों का जो दृश्य था वह बड़ा ही अनुपम एवं हृदय में वैराग्य की धारा प्रवाहित करने वाला था। समस्त योगेन्द्र अपने-अपने श्लाध्य चरित्र में मस्त थे। कोई सिद्धासन से बैठा हुआ सरोधाविषयक परामर्श में लवलीन है तो कोई गोमुखासन में बैठा हुआ नेत्र ज्योति में असह्य तेज की प्राप्त्यर्थ लक्ष्य में अविच्छेद दृष्टि सम्पात से अवलोकन कर रहा है। एवं कोई मत्स्येन्द्रासन से बैठा हुआ मेलानिष्ठ सांसारिक वाद्य ध्वनि आदि विषयों की ओर से अपने श्रोत्रादि इन्द्रियों को स्वाधीन कर रहा है तो कोई गोरक्षासन से बैठा हुआ प्रणवजाप द्वारा तात्कालिक अवसर को अव्यर्थ बना रहा है। इसी प्रकार कोई वृक्षासन से स्थित हो अपने दिव्याकृति दर्शन द्वारा दर्शकों के चित्त में स्थिरता एंव शुद्ध भाव का संचार कर रहा है तो कोई स्वस्तिकासन से बैठा हुआ दर्शकों के वांच्छित फल प्रदात्री भस्मिनी को वितीर्ण कर रहा है। तात्पर्य यह है कि समस्त योगेन्द्र ऐसी अवस्था में थे जिनके दर्शन एवं भाव का अवलोकन कर पाषाण हृदय मनुष्य भी अपने कृत्यों का स्मरण कर उनके परिणाम से भीतिग्रस्त हुआ, अहो ये लोग धन्य हैं जिन्होंने त्रिविधदुःखात्यन्त निवृत्ति के द्वारा अत्यन्त पुरुषार्थ प्राप्ति स्थान को सन्निहित बना डाला है, यह कहने को बाध्य होता था। अवशिष्ट क्रिया कुशल लब्ध संकेत योगी भोजनागार में प्रविष्ट हो अपनी समता एवं शील स्वभाव का परिचय देते हुए मुख्याचार्य के वचनानुलोमी होकर स्वनिष्ट अधिकारित्व की सूचना पूर्वक मुमुक्षुत्व को प्रस्फुट कर रहे थे। अधिक क्या तात्कालिक उपस्थित योगि संघ का दृश्य और दर्शन चित्त को आकर्षित करने वाला तथा चित्त में अनेक भावों को उत्पन्न कर सांसारिक विषयोपभोग में तुच्छता दिखलाने वाला था। क्यों नहीं जब आप लोग मेला देखने नहीं जिसको ध्यान द्वारा जहाँ-तहाँ स्थित रहते हुए भी देख सकते हैं। किन्तु मेलागत मुमुक्षु जनोद्धार के हेतु ही यहाँ आये थे। तब ऐसा सात्विक एवं मनोहारी दृश्य उपस्थित करना स्वाभाविक ही था। परन्तु पाठक महानुभाव ! शोक है इस परिणामी संसार में भाग्योपलब्ध कुछ आनन्द हेतुक अश्रुपात के अनन्तर दुःख हेतुक अश्रुपात भी अवश्यम्भावी है। अतएव आइये तात्कालिक योगि संघ के सत्त्वप्रधान दृश्य से उत्पन्न होने वाले आनन्दानुभव के अनन्तर आधुनिक योगि समुदाय के नैर्वैण्णेय एवं तामस चरित्र की अनुस्मृति कर कुछ दुःख हेतुक अश्रु बहायेंगे। आजकल योगि संघ उन योगियों का है जो सांसारिक व्यवहार से वैराग्य नहीं रखते हैं और हमने जिस वेष का आश्रय ले अपना स्वरूप बनाया है उसका मुख्योद्देश क्या है यह विचार तो कभी उनके स्वप्न में भी जागरित नहीं होता है। प्रत्युत विविधमादक द्रव्योपासना से ये अपने आपको उन्मत्त एवं पशु तुल्य बना डालते हैं। इसका फल यह होता है कि रही खड़ी समस्त स्मृति रसातल में चली जाती है इसीलिये अधिक ऐसे योगी दीख पड़ते हैं जिनके साथ वार्तालाप करने में कोई शलीखा हाशिल नहीं होता है। कोई ही अत्यन्त श्रद्धालु सांसारिक पुरुष इनकी तत्त्व शून्य बात पर हुंकारा करण पूर्वक कुछ श्रद्धा प्रकटित करे यह दूसरी बात है। अधिक लोग तो नासिका संकुचित कर अपने आभ्यन्तरिक हृदयागार में यही भाव स्थिर करते हैं कि निःसन्देह ये लोग पृथवी के ऊपर भार रूप हैं। फिर ऐसे लोगों के समुदाय में अन्वेषक को अन्येव्य तत्त्व कहाँ से प्राप्त हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता। यही कारण है पर्वादि प्रासंगिक अवसर पर जब ये लोग एकत्रित होते हैं तब इनके द्वारा जनस्तुत्य कोई भी श्लाध्य कार्य का उंगार होना असम्भव होने से निन्द्य चरित्र की ही प्रधानता रहती है। और योगि का आलस्य को पराजित करना जो प्राथमिक कर्तव्य बतलाया गया है इस बात में तो ये लोग बहुत ही पीछे हट गये हैं। इसीलिये तीर्थ स्थान पर एकत्रित ये योगी नामधारी लोग भूखे पड़े रहकर भी क्षुधा के परिहार्थ कोई योग्य उपाय नहीं करते हैं। खैर इतना होेने पर भी भाग्योपलब्ध कोई भक्त उपस्थित होकर भोजन सामग्री प्रदान भी कर दे तो अब भोजन कौन बनावे। जिन्हों के गार्हस्थ्याश्रम में वस्त्राभूषण धारणा विषयक अनेक प्रकार की क्षुधा व्याप्त थी वे लोग तो जिस किसी रीति से विचारे भोलेभाले गृहस्थों को विप्रलोभित कर उसके द्वारा द्रव्योपार्जना से विविध वस्त्रालंकृत हुए महन्ती के अथवा महन्त जैसे अभिमान से उस क्षुधा की निवृत्ति में लगे दूर बैठे-बैठे झूरते रहते हैं। क्यों कि ये भोजनालय मंे जायें तो दो वार्ताओं की हानि है, प्रथम तो प्रतिष्ठा में न्यूनता आ जाय द्वितीय अमूल्य वस्त्र के दाग लगने से वह खराब हो जाय। इसी प्रकार इन्हीं श्रृंगारी लोगों में जो अपनी कम इज्ज+त रखते हैं वे ऐसे अवसर पर, एक तो मेला देखेंगे दूसरे इस आफत से बचेंगे, ये दो लाभ सोचकर मेले में खिशक भी जाया करते हैं। यही नहीं मामला और भी आगे तक है और वह यह है कि उन्हों में भी जो कुछ भी इज्ज+त नहीं रखते है वे अन्य वेषधारियों की पंक्ति में सम्मिलित होकर उदर पूर्ति किया करते हैं। अवशिष्ट रहे वे जो अपने आपको तपस्वी मानते हैं। ये लोग आभ्यन्तरिक अभिलाषा तो यहाँ तक रखते हैं कि संसार हमको ही गोरक्षनाथ समझ ले तो बड़ी तार बैठे। परं मादक वस्तूपासना के कारण से अपने शरीर में आलस्य इतना अधिक रखते हैं कि भोजनालय में जाकर कुछ प्रयत्न करने की बात तो दूर रही भोजन तैयार होने पर दो-चार कदम आगे बढ़ कर पंक्ति में सम्मिलित नहीं हो सकते हैं जिससे पाक कर्ताओं ने झख मारकर इनको उसी जगह स्थितहुयों को भोजन देना पड़ा करता है। सो भी कब और कैसा जब कि इतनी गौओं को भूखी मरती देख दयाद्री भूत कोई एक महानुभाव भोजनपाक के लिये खड़े हो गये हों तो, और उन्होंने भोजन ठीक बना दिया हो तो। नहीं तो इन लोगों का वैसे भी अनूंठा सौदा है ! यदि हलुवा, ताहरी आदि भोजन बना रहे हों और आटा तथा चावलादि के सिक जाने पर या भोजन सामग्री खुले मैदान में पड़ी हो इतने ही में चतुर्मासा होने के कारण वर्षा के आ जाने पर जब एकाध योगी के जो भण्डार में कार्य कर रहा हो यह कहने पर कि जल्दी आ जाओ अमुक काम करवा होता है तो ये ऐसा भी कह दिया करते हैं कि आवांसां तरः साहब नेकी दे इतनी देर में के होसः एक चलम और पील्यांसां, बस फिर क्या था ऐसा होने पर जो हुआ करता है वह होता ही है। उस विचारे सेवक का जो किसी कारण से आ फसा था कुछ तो नशें ग्रस्तों की बेहूदी गालियाँ सुनकर चित्त खट्टा हो गया और रहा खहा अब इतना हो गया कि वह फिर जीवन भर इनके पास न आने का नियम करता है। अपशोश अपशोश अपशोश ! जिन महानुभावों ने इस संसार को परिवर्तनशील कहकर पुकारा है उन्होंने भूल नहीं की है। क्यों कि यह ठीक है इसमें कोई भी वस्तु सदा के लिये समरस नहीं रहती है। यही कारण है एक समय तो वह था जिसमें योगियों के समीप आने वाले भक्त पुरुषों के विविध दुःख दूर होते थे और आज वह समय आ पहुँचा जिसमें वे लोग योगियों से घृणा करते हैं। सारांश यह है कि समस्त लोग परस्पर में एक-दूसरे की पोल को अच्छी तरह से समझते हैं। किर कौन किसको दबावे और दण्ड देने के लिये तैयार हो। इसीलिये तो सम्प्रदाय से दण्ड उठ गया। जिसके अभाव में कुकर्मियों की बात बन पड़ी। इनके अतिरिक्त जो महानुभाव ऐसे हैं कि सांसारिक किसी भी पोल के भाजन न बने हैं और इसी कारण से वे अपने में कुछ दूसरों पर प्रभाव डालने वाला तेज तथा ऐसे अवसरों पर उचित प्रबन्ध करने के लिये अपने पास पर्याप्त द्रव्य रखते हैं। समझ में नहीं आता वे क्यों चुपके बैठे रहकर इन घटनाओं को श्रवण किये जाया करते हैं। जान पड़ता है या तो वे हस्ती की तरह अपने तेज की थाह नहीं पा चुके हैं या यह द्रव्य हमारी साथ चलेगा इसी अतथ्य आनन्द में निमग्न है। अन्यथा उनका ऐसे अवसरों पर उपस्थित हो योगि संघ का दृश्य सुधारना प्राथमिक कार्य है। (अस्तु) मैं प्रकरणान्तर में चला गया पाठक क्षमा कीजिये और प्राकृत वृत्तान्त में ध्यान दीजिये। इधर तैजस रस्मियों के द्वारा संसार को प्रकाशित बनाने के अनन्तर दिवाकर अस्ताचल का अतिथि बना। उधर प्रकाशित संसार को अशूचिमेद्यान्धकार से आच्छादित करने की अभिलाषिणी रात्री देवी ने अपने शुभागमन की घोषणा करने के लिये प्रथम मन्दान्धकार को प्रेषित किया ! यह देख सब लोग स्वकीय नित्यकृतय को उद्देशित कर अपने-अपने निवासाभिमुख हुए। इसी प्रकार हमारा चरित्र नायक योगि संघ भी अपने सायंकालिक नित्यकृत्य से निवृत्त होने के लिये स्वानुकूल क्रियाओं में दत्तचित्त हो रहा था। ठीक इसी अवसर पर जब कि योगेन्द्र समुदाय स्वीय सायंकालिक पारस्परिक वन्दनादि कर्म सम्पादित कर लब्धावकाश हुआ तब इधर से भोजनादान का समय उपस्थित हुआ और उधर से कठोर शब्दायमान मेघराज अपनी धारावृष्टि द्वारा उसके भोजनाचरण में बाधा डालने का उद्योग करने लगा। अतएव इस हेतु से और कतिपय योगियों ने अपने शिष्यों को ऐसी क्रियों में प्रेरित कर रखा था जिनके प्राबर्षिक जल संसर्ग से कुछ अनिष्टोत्पन्न होने की आशंका थी, इस विशेष हेतु से श्रद्धास्पद करणारिनाथजी ने प्रस्ताव किया कि महानुभावों ! यह बात आप लोगों से अविदित नहीं कि इस आवसरिक वर्षा हानिकारिका है अतः इसका परिहार कर देना समुचित कार्य है। सो भी जितने परिमाण में हम लोगों का निवास है उतने ही में होना चाहिये। आपके इस कथन का उत्तर उधर से माननीय मुख्य महानुभाव ने यह प्रदान किया कि जब इस कार्य के लिये आप ही पर्याप्त थे तब प्रस्ताव करने का यही अभिप्राय स्फुट होता है कि आप ऐसा करने के लिये आज्ञा मांग रहे हैं अतः हम आज्ञापित करते हैं कि जैसी आपकी रूचि हो वैसा करें। स्वकीय गुरु गुरुभाई चण्डीश्वरनाथजी की यह अनुकूल आज्ञा सुनकर कुछ मुस्कराते हुए करणारिनाथजी ने अच्छा यदि आपकी ऐसी ही आज्ञा है तो मैं यह कार्य कर देता हूँ। परं बिना अभिमति प्राप्त हुए आपके उपस्थित होने पर हमें स्वयं ऐसा कर दिखलाना योग्य नहीं, यह कहकर परम्परा प्राप्त श्रीमस्त्येन्द्रनाथजी की सावर विद्या का आश्रय लिया और स्वकीय निवासाश्रम औद्देशिक मन्त्र से संस्कृत भस्मी को मेघराज की सेवा में प्रेरित किया। जिसका फल स्वरूप योगियों से अधिष्ठित स्थल में वर्षा न होने से समस्त योगिवृन्द आनन्द के साथ भोजन ग्रहण के अनन्तर अपने-अपने भाव में दत्तचित्त हुआ। इसके अन्यत्र स्थल में घनघोर वृष्टि होने के कारण जलाद्र्रवस्त्र जन समूह को रात्री बीतानी अत्यन्त ही दुःसाध्य हो गई थी। शीतल वायु वेग से कम्पायमान सन्त्रस्त मनुष्यों के आन्तरिक स्थान में विद्युत के क्षाणक्षणिक स्फुरणपूर्वक असंख्य ताड़तडि़क शब्दों ने और भी भय स्थापित कर रखा था। इस दुर्घटना को देख अनुभव होता था मानांे मेघराज ने आज ही समस्त संसार को जलमय बना डालने का निश्चय किया है। परं एकत्रित जन समूह ने जिस किसी प्रकार से रात्री का अतिक्रमण किया इधर भाग्यवशात् रात्री के साथ-साथ ही वर्षा का भी अवसान हुआ। यह देख रात्रेय दुःख दूर करने की अभिलाषा से मेलारथ समस्त लोग अपने आभ्यन्तरिक तथा बाह्यभाव से तेजस्वी सूर्य भगवान् की अभ्यर्थना करने लगे। खैर दैवगत्या जनप्रार्थना की रक्षा के रक्षा के लिये अनुकूल रस्मिमाली उदय हुआ। जिसके पर्याप्त धर्म द्वारा जलाद्र्रवस्त्रों को शुष्क कर सभी लोग मेलानिष्ठ विविध विचित्र दृश्य के अवलोकन से रात्रेय कष्ट को विस्मृत बनाने लगे। ठीक इसी हेतु से इधर-उधर भ्रमण करते हुए लोग जब योगियों के समीप से गुजरते थे तब एकाएक इनके आश्रम को वर्षा से विरहित देखते थे। जिससे चकित हुए लोग वहीं खड़े होकर योगियों विषयक पूर्वश्रुत एवं दृष्ट अनेक विस्मापक घटनाओं का उल्लेख करने लगते थे और अन्त में इस कुतूहल के परिचयार्थ योगियों से विनम्र पार्थना द्वारा अवृनाष्टि का कारण पूछने का साहस करते थे। तथा योगियों की ओर से, हमारी इच्छा नहीं थी कि इस समय हमारे ऊपर वर्षा हो, इसी हेतु से इतने स्थल में वर्षा नहीं हुई, यह उत्तर सुनकर वे और भी विस्मित होते थे। एवं परम्परा में विरामता सूचक ऐसे शब्द कहने लगते थे कि हमारे जन्म और हम लोगों को धिक्कार है जो सांसारिक विविध निस्सार झगड़ों में वेष्टित हुए असंख्य दुःखों के भण्डार बन रहे हैं। यद्यपि महात्मा और शास्त्रवेताओं के श्रुतकथनानुसार यह निश्चय है कि मनुष्य जन्म की प्राप्ति का निजोद्देश त्रिविध दुःख मोक्षार्थ ही है। तथापि न्यून से न्यून अनिश्चित कालिक दुःसाध्य मोक्ष से अतिरिक्त इतनी शक्ति तो मनुष्य को अवश्य ही प्राप्त करनी चाहिये जिसके द्वारा सांसारिक अनेक साधारण आपत्तियों से रक्षा पा सकें। तात्पर्य यह है कि इस घटना ने अनुकूलादृष्ट कितने ही लोगों का चित्त सांसारिक व्यवहार से घृणान्वित कर डाला। जिससे योगियों का ऐहागमन तथा इस घटना का दिखलाना सार्थक हुआ। इस प्रकार प्राप्तावसरिक अनेक अद्भुत चरित्रों द्वारा योग का महत्त्व प्रकट करते हुए योगियों ने अनेक मुमुक्षुजनों को उद्घृत किया। तथा अग्रिम चमत्कार प्रदर्शनी से उनको दृढ़ स्थिति वाले बनाकर स्वकीय शिष्य बनाने का निश्चयकर कहा कि अभी कुछ दिन के लिये प्रतिदिन गमन करना होगा, इस वास्ते कजली यात्रा के अनन्तर तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण की जायेगी। तुम्हें धीरता और उत्साह के साथ उस अवसर की प्रतीक्षा कर अपने अधिकारित्व का परिचय देना चाहिये। यह सुन समस्त शरणागत मुमुक्षु महानुभावों ने तथास्तु शब्द का प्रयोग करते हुए शिर झुकाकर प्रस्ताव को स्वीकृत किया। तदनन्तर पर्बावसान में सम्मेलन विसर्जन होने पर उपस्थित योगि समुदाय कजली यात्रा के लिये प्रस्थानित हुआ और प्रासंगिक विस्मापक चरित्र दिग्दर्शन से प्रजाजनों को अपने चरणों की ओर झुकाता तथा उनकी भावता के अनुकूल वांच्छित फल प्रदान करता हुआ यौजनिकादि विश्रामानुक्रम से सदातन नियमानुसार, जहाँ श्रीगोरक्षनाथजी को प्रत्यक्षतया सर्व प्रधानत्व पद की उपलब्धि हुई थी, कुछ दिन में उसी कजली स्थान में पहुँचा। उधर योगप्रभावोत्थ अद्भुत सिद्धि परिचायक इस द्वादश वर्षीय योगिसंघ से पुण्योपलब्ध दर्शनार्थ अनेक प्रजाजन प्रथमतः ही एकत्रित होने पर भी प्रतिदिन आते रहते थे और स्वसाध्य पूजा सामग्री से योगियों को सत्कृत करते थे। जिससे उनकी अनेक कामनायें सफल होती थी। यही कारण था इस अवसर में यहाँ इतनी संख्या मंे मनुष्य एकत्रित होते थे जिससे यह मेला गोदावरी कुम्भ की समता को प्राप्त करता था। (अस्तु) सायंकाल हुआ भोजन के लिये मेले में आज्ञा घोषित कर दी गई कि जिसकी रूचि हो वह श्रीनाथजी के भरपूर भण्डार से भोजन ग्रहण कर सकता है। यह सुन योगियों के भोजनादान समय में ही योग क्रिया कुतूहल दर्शनार्थ मेले में आये हुए गरीब लोगों ने द्रव्याभाव से तथा अमीर लोगों ने प्रसाद समझ कर भोजन ग्रहण के द्वारा तात्कालिक सौख्य प्रवाह की सीमा प्रवृद्ध की। इस कृत्य से निवृत्त होते-होते रात्री का पूर्ण स्वराज्य हो गया। जिसने सुषुप्ति अवसर को उपस्थित कर यात्रियों को मार्गिक श्रान्ति दूर करने का परामर्श दिया। परं वे लोग इससे विरूद्ध थे इसीलिये उन्होंने विविध वाद्य ध्वनि द्वारा भक्ति वैराग्य और योग का महत्त्व सूचक गीतगायन से अपनी थकावट को प्रशान्त करना आरम्भ किया। आज की रात्री अत्यन्त सुख प्रदात्री थी। यात्रियों के सात्विक मधुर गीतालाप ने एक विलक्षण भाव उत्पन्न कर रखा था। जिससे अनुमान होता था मानों प्रगाढ़ आनन्दात्मक अथाह समुद्र मंे निमग्न हुए लोग अपने गृहवार तथा अपने आप तक को भूल रहे हैं। (अस्तु) इसी प्रकार आनन्द प्रमोद के द्वारा रात्री का तारुण्य शिथिलकर यात्रियों के कुछ विश्राम करने पर योगियों का योग क्रिया परीक्षाकालिक सूर्य उदय होने का अवसर आया। उधर सूर्य का उद्गमन होने के साथ-साथ ही माननीय मुख्याचार्य की आज्ञानुसार समस्त योगी अपने प्रातरिक नित्य कर्म से लब्धावकाश हो क्रिया कौशल्य प्रदर्शित करने के लिये निर्दिष्ट अवसर की प्रतिपालना में दत्तचित्त हुए। तदनु कुछक्षण बीतने पर अवसर भी आ उपस्थित हुआ। जिसमें यद्यपि यह स्थल केवल योगियों से अधिष्ठित था तथापि किसी प्रकार की सेवायें अन्तर प्रविष्ट अनधिकारी पुरुष स्वकीय कृत्यसम्पादनावधि तक बहिर निकाल दिये गये और मुख्याचार्य श्रीमत्स्येन्द्रनाथजी के शिष्य चण्डीश्चरनाथजी ने जिन-जिन योगियों में जिन-जिन क्रियाओं के व्यतीकर की आशंका थी उन-उन योगियों की मौखिक वाणी द्वारा उन-उन क्रियाओं के याथाथ्र्य का परिचय लिया। एवं इसके फलाफल को निश्चित कर अग्रिम दिन इसी अवसर पर आशंकास्थल योगियों से तात्कालिक अवसर में सम्पादित हो जाने वाली क्रियाओं का सम्पादन करवा कर देखा। साथ ही जिस योगी की दोनों बातों में अथवा एक में भी अनुत्तीर्णता हुई उस योगी के उपदेष्टा से उस क्रिया का परिचय लिया जाता था और भाग्यवश उससे भी वह त्रुटि दूर न हुई तो आचार्य की आज्ञानुसार शिष्य से अधिक शिक्षक को तिरस्कृत किया जाता था। क्योंे कि श्रीनाथजी की अर्थात् गोरक्षनाथजी की यह आज्ञा थी कि कोई भी योगी स्वयं अधुरा रहकर अर्थात् किसी क्रिया में निश्चयता प्राप्त न करके दूसरे को उपदेश करने का सहास न करे। यदि किसी में ऐसा सम्भव भी हो तो लब्धावसर में उसका निरीक्षण किया जाय और उसको अपनी प्रमत्ता से आज्ञा भंग करने का यथोचित दण्ड दिया जाय। जिससे मार्ग में व्यतीकर उत्पन्न न होकर सदा अनिष्टोत्पत्ति का अभाव रहेगा। अतएव चण्डीश्वरनाथजी ने श्रीनाथजी इस आज्ञा को रक्षित करने के लिये ही उक्त वृत्तान्त का अनुष्ठान किया और जो शिष्य ही ऐसे निकले कि अनवरत क्रिया प्रयत्न से निर्विण्ण हो अधुरे रह गये थे और अपने आपको उन क्रियाओं का ज्ञाता सूचित करते थे उनको भी कुछ दण्डित कर फिर प्रयत्न करने की आज्ञा दी। इस प्रकार गृहकार्य सम्मार्जना में दो दिन व्यतीत हुए। तृतीय स्वागतिक सूर्य का शुभागमन हुआ। जिससे प्रातःकालिक विधि के सम्पादनानन्तर समस्त योगी लोग तथा प्रजाजन सज्जीकृत सदातन विस्तृत स्थल में बड़े समारोह के साथ एकत्रित हुए और प्रथम आधुनिक मुख्याचार्य चण्डीश्वरनाथजी ने प्रवलवेग वायु का चलाना तथा उसे प्रशान्त करना मूसलधार वर्षाना तथा शान्त करना। अग्नि का वर्षाना तथा शान्त करना। वा उसकी शान्ति के लिये जल वर्षा करना। चन्द्रमा सूर्य का तेज बढ़ाना तथा मन्द करना। आवश्यकता पड़ने पर अभीष्ट देवता को अपनी सहायता के लिये बुलाना तथा लौटा देना। रमणीय बाग-बगीचे और महल रचकर खड़े कर देना तथा लुप्त करना। अनेक मनुष्य तथा पशु पक्षियों की सृष्टि रचना तथा लय करना। जिन-जिन स्वरूपों से देवलोकादि लोकों में जाना होता है उन-उन स्वरूपों को बनाना तथा संहृत करना। अभीष्ट खाद्यपेय धारणीय पदार्थों को उपस्थित करना तथा छिपा देना आदि चमत्कारों को प्रदर्शित किया। तदनु आपके आसनासीन होने पर गोरक्षनाथजी के शिष्य विलेशयनाथजी ने अपने शरीर को सहस्र मनुष्यों से भी नहीं खींचे वा उठाये जाने वाले भारान्वित बनाना। तथा पाषाणशिला में प्रविष्ट होने के अनुकूल बनाना, तथा जल की तरह भूमि में गोते लगा-लगा कर स्नान करना, तथा सूर्य की किरणों का आश्रय लेकर सूर्य तक पहुँचने वाले शरीर धारण करना, तथा तृणादि का आश्रय लेकर वायु वेग द्वारा अन्य देश में अथवा आकाश में गमन करने वाले शरीर का धारण करना तथा भूमि में प्रविष्ट हो अन्यत्र जा निकलना, तथा शरीर को वज्र की तुल्य बनाकर उसे अक्षय्य करना, और अपने आपको वाल्यायु बना लेना वा अपना शरीर छोड़कर अन्य बालक शरीर में प्रविष्ट हो जाना, तथा मृतक मनुष्य, पशु-पक्षी आदि के शरीर को सजीव कर देना आदि अनेक चमत्कारों का उद्घाटन किया। आपके भी आसनासीन होने पर इस अध्याय के नायक करणारिनाथजी ने अपनी दृष्टि के सम्पात मात्र से कठिन से कठिन दृश्य पदार्थ को दग्ध करना तथा तादवस्थ्य बना देना। तथा अपनी दृष्टि से चिरकालिक कुष्टादि रोग ग्रस्त मनुष्यों को सम्मुख खड़े कर दिव्याकृति बनाकर दिखलाना। वा उसके सूक्ष्म शरीर का आकर्षण कर उसके शरीर में स्वयं प्रविष्ट हो उसके उस सूक्ष्म शरीर को अपने देह में स्थापित करना। सहस्र लपलपाती हुई जिव्हाओं के युक्त नागास्त्र का प्रयोग कर उसका मन्दिर वृक्ष शिला आदि को उठाकर अन्यत्र स्थापित कर देना। जल में प्रविष्ट होकर निसंग रहना हस्ती आदि प्राणियों को सम्मुख खड़े कर निश्चेष्ट बना देना। तथा भूमि की तरह जल के ऊपर गमन करना और समान वायु के जयन द्वारा अपने शरीर को भस्मासत् कर फिर तादवस्थ्य बना देना आदि अनेक चमत्कारों को उद्घाटित कर अपना कर्तव्य पालन किया और आचार्यजी की प्रेरणानुसार यात्रियों को चेतावनी देते हुए कहा कि, अये उपस्थित यात्रिवृन्द ! क्या आपको स्मरण है कि यह वही द्वादश वार्षिक उत्सव है जिसको जनोपकारार्थ दयाद्र्रीभूत हृदय श्रीनाथजी ने स्थापित किया है। तथा जिसमें श्रीनाथजी आज्ञा को अक्षुण्ण रखने के लिये हम लोगों ने अपना कर्तव्य पालन करते हुए आपको विविध चमत्कार दिखलये हैं। यदि स्मरण है तो यह कहने का प्रयोजन नहीं कि आप लोग इसकी स्थापना के मुख्योद्देश एवं तत्त्व से अनभिज्ञ होंगे। परन्तु स्मरण नहीं है तो श्रीनाथजी की जनोपकारिणी पवित्र अभिलाषा द्वारा इसकी स्थापना हुई है। मैं आप लोगों के समक्ष यह बतला ही चुका हूँ, अब रही यह बात कि श्रीनाथजी ने किस उद्देश्य से इस उत्सव का स्थापित किया है। इसका उत्तर उन्होंने उसी समय यह प्रदान किया था कि संसार में ऐसे मनुष्य कम नहीं है जो अपने आपको अल्पज्ञ तथा अतीव क्षुद्रप्राणी समझ कर आलश्योपहत हुए यह कह डाला करते हैं कि हम क्या कर सकते हैं तथा हमारे करने से क्या होता है। नहीं उन लोगों को ध्यान रखना चाहिये हम उनके उस मिथ्या अभिमत को खण्डित कर यह दिखलाने के लिये ही इस अनुष्ठान का अवलम्बन कर रहे हैं कि तुम लोग कुछ चेतो और प्रयत्न करो। जिस बात के करने में तुम अपने को असमर्थ समझ रहे हो उसको अनायास से ही कर सकोगे और हमारी जिन करतूतों को सुनकर तुम असम्भावी बतलाते वा चकित रह जाते थे उनको सम्पादित कर अपने आलस्यमय क्षुद्रत्व अभिमान को स्वयं झूठा प्रमाणित करने लगोगे। अतएव श्रीनाथजी की इस पवित्र चेतावनी को अपने हृदय में स्थान देकर आप लोगों को इससे कुछ लाभ उठाना चाहिये। मुझे आप लोगों के विषय में अत्यन्त ही अनुकम्पा आती है कि आपके गृह में छत्तीस प्रकार के भोजन की सामग्री विद्यमान होने पर भी आप सदा क्षुधा से पीडि़त रहते हैं। भला इसका क्या कारण है यही है कि जिस कोठे में सामग्री रखी है उसका ताला लगा है जिसकी कंुजी आपके हस्त से भ्रष्ट हो चुकी है। और आपने, अब उसका प्राप्त होना असम्भव है, यह झूठा निश्चय कर उसकी अन्वेषणा में प्रयत्न करना भी छोड़ दिया है। परं मैं आपको सचेत करता हूँ कि आपका एकदम ऐसा मानकर हतोत्साह हो जाना बिल्कुल अयोग्य कार्य है। जिसका फल स्वरूप आपको असंख्य जन्मों में सम्पीडि़त रहने पर भी भविष्य में न जानें ऐसा कब तक रहना पड़ेगा। इस वास्ते आपको उचित है कि आप प्रथम, कुंजी को अवश्य प्राप्त कर लूंगा, इस निश्चय को अपने हृदय में स्थान दें और फिर उसकी प्राप्ति के लिये अपने से उत्कृष्ट मनुष्यों का संग करते तथा उनका अनुभव अपने में स्थापित करते हुए जिस स्थान में कुंची की अवश्य उपलब्धि हो सकती है वहाँ तक पहुँचने का प्रयत्न करें। देखिये यह बात आपसे अविदित नहीं कि जब बालक उत्पन्न होता है उस समय से लेकर मोहल्ले बाजार में जाने-आने की शक्ति प्राप्त करने के पूर्व वह किसकी संगति में रहता है और उसकी क्या दशा हुआ करती है। अर्थात् उत्पत्ति...त्व सम्बन्ध से जिसको प्रकृति कह सकते हैं ऐसी महा मोहान्धकाराच्छादित माता की संगति में बालक रहता है। और महा मोह के कारण ही माता की आभ्यन्तरिक यह इच्छा होती है कि मेरा पुत्र मेरी दृष्टि से एकक्षण भी इधर-उधर न हो। इसी वास्ते वह उससे कहती रहती है कि पुत्रक इधर नहीं जाना वा अमुक वस्तु को नहीं छूना क्योंकि उधर वा उसमें हाऊ है वह खा लेगा। अतएव उस समय माता प्रकृति के संग में रहते हुए बालक की यह दशा है कि एक असत्य, जो आज तक किसी ने नहीं देखी ऐसी कल्पित वस्तु हाऊ से भीति ग्रस्त रहता है। परन्तु जब वह इस अवस्था से निकलता है और प्रकृति का संग छोड़ मोहल्ले आदि में जाने-आने वाले स्वसमान वयस्क पुरुषों का संग करता है तब तो वह अपने चित्त में विचार करता है कि ये लड़के प्रतिदिन इधर-उधर घूमते-फिरते रहते हैं जब उन्हीं को आजतक हाऊ ने नहीं खाया तो मुझे भी उसकी ओर से कोई आशंका नहीं होनी चाहिए। अर्थात् वह मुझे भी कोई बाधा नहीं पहुँचा सकता है। इस प्रकार के विचारात्मक परिज्ञान से उसका कल्पित हाऊ सम्बन्धी भयात्मक दुःख दूर हुआ। परन्तु जिन लड़कों के संग से उसको इतना ज्ञान हुआ वे लड़के भी नगर द्वार के आस-पास स्थित शून्य मन्दिर वा बड़े वृक्ष में कल्पित डंकनी-शंकनी आदि के भय से ग्रसित रहते हैं। इसीलिये वह लड़का भी उनकी शिक्षा के अनुसार भीति ग्रस्त हुआ किसी समय भी एकला वा अन्धकारादि में उधर नहीं जाता है। प्रत्युत समानवयस्क अन्य लड़कों को स्वयं उधर नहीं जाना डंकनी रहती है, यह उपदेश देने लगता है। खैर इस दशा में कुछ दिन व्यतीत कर अब स्वकीय ग्राम से अन्य ग्राम वा जंगलादि में जाने-आने वाले लड़कों की संगति में पहुँचा और उनको प्रतिदिन सायं प्रातः वा अन्धकार में उस जगह के समीप से अथवा उस जगह में जाते-आते देख विचार करता है कि इन लड़कों को उस डंकनी आदि का कुछ भय नहीं लगता और न वह कभी इनको कुछ कष्ट ही पहुँचाती है। इस वास्ते मुझे भी उससे कुछ भय नहीं करना चाहिये क्योंकि इनकी तरह वह मुझे भी कोई बाधा नहीं पहुँचा सकती है। अतएव वह लड़का इस ज्ञान द्वारा द्वितीय भयात्मक सोपान का उल्लंघन करता है। परन्तु ये लड़के भी नगर से बाह्यस्थल निष्ठ श्मशानों मे वा बनी जंगल में कल्पित भूत पिशाचादि से भय किया करते हैं ठीक वह लड़का भी इनकी दशा में परिणत हो जाता है तथा तादृश उपदेष्टा भी बन जाता है। किन्तु कुछ दिन के अनन्तर वह इस संगति से निकल उन मनुष्यों की संगति में पहुँचा जो अपने कार्यवश अन्धकारमयी रात्री में उन स्थलों में जाते-आते वा प्रवंग वशात् कुछ दिन निवास करते हैं। यह देख वह फिर अनुभव करने लगता है कि रात्री में नृत्य आदि क्रीडायें करने वाले पिाशाचादि उन स्थलों में हों तो होते रहो परं वे हमारे भय के स्थान नहीं हो सकते हैं। क्यों कि ऐसा होता तो वहाँ जाने और रहने वाले इन मनुष्यों की क्या गति होती। अतः जब ये लोग उनकी बाधाओं से सर्वथा निःसंग हैं तो मेरा ऐसी आशंका रखना केवल लड़कपन ही है। बस आज से पीछे ऐसी बात के लिये मैं अपने हृदय में कभी स्थान नहीं दूँगा। उन लोगों के संसर्ग से इस प्रकार का आनुभविक ज्ञान प्राप्त कर यह पुरुष तृतीय सोपान को पार करता है। ठीक यही दशा जो तुम सब लोगों में बीती है अपने ऊपर घटा लो और निश्चय कर लो कि हमारे कथनानुसार तुम लोग इस तृतीय सोपान की उत्तर अवधि में ही लटकते रह गये वा नहीं परं क्यों क्या तुम लोग तृतीय सोपान पंक्ति की तरह चतुर्थी और इसके उत्तर पंचमी आदि का अतिक्रमण कर जिस स्थान में तुम्हारे आभ्यन्तरिक कोठे की कुंजी का सम्भव है उस स्थान तक के मार्ग का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते थे। यदि कर सकते थे तो फिर क्यों ऐसा हुआ जो इसी अवधि में लटकते रह गये। ध्यान रखो इसका यही कारण है कि तुम लोगों को न तो अपने से उत्कृष्ट मनुष्यों का संग प्राप्त हुआ और न इससे अधिक उतना अनुभव ही प्राप्त कर सके जिससे इस अवधि का भंग कर अग्रसर हो सकते। अतएव तुम लोग निश्चय रखो हम परम कृपालु भगवान् आदिनाथजी की प्रेरणानुसार इसीलिये अपनी गुप्त रखने योग्य तथा किसी विशेष अवसर के उपस्थित होने पर उपयोग में लाने योग्य इन सिद्धियों को नाट्य लीला में परिणत किया करते हैं कि तुम्हें इस अवधि को भंगकर अग्रिम ज्ञान प्राप्त करने का सुभीता मिले। क्योंकि जो तुम्हें दिखला चुके हैं हमारे इन चमत्कारों का यही अभिप्राय है हम इनके द्वारा तुम्हें सचेत कर रहे है कि तुम लोग इस शक्तियों को देखकर हमको अपने से उत्कृष्ट समझो और हमारा संग करो। फिर तुम्हें मालूम हो जायेगा जिस इस पाश्चभातिक पुतले को तुच्छ और किम्प्रयोजन बतलाया करते हो ईश्वर ने इसमें क्या-क्या और कैसी-कैसी शक्तियाँ छिपा रखी है। हमारे संसर्ग से उनका यथार्थ अनुभव प्राप्त कर तुम इस योग्य हो जाओगे कि चतुर्थ का अतिक्रमण करते हुए क्रमशः पंचमादि सोपान के अतिक्रमण द्वारा उस स्थान में पहुँच सकोगे जहाँ तुम्हारे अज्ञानाच्छादित हृदयात्मक कोठे की कुंजिका रखी है। बस फिर क्या है कुंजिका जहाँ हस्तगत हुई और ताला खुला। जिसके अन्तर छत्तीसों प्रकार के भोजन की सामग्री तो रक्खी ही हुई है जिसकी अप्राप्ति में तुम सांसारिक विविध व्याधि रूप क्षुधाओं से पीडि़त थे। फिर क्या मजाल जो वह क्षुधा पंूज तुमको कुछ भी त्रस्त कर सके। करणारिनाथ ने इत्यादि वाणी बाणों द्वारा यात्रियों के हृदय स्थान को छिद्रान्वित कर अपनी चेतावनी को स्थापित किया। जिसका फल यह हुआ कि अनुकूला दृष्ट कतिपय लोगों के आन्तरिक स्थान के पट खुल गये और उनके निश्चय हो गया कि निःसन्देह यही बात है उत्तरोत्तर उत्कृष्ट मनुष्य के संग के प्राप्त अनुभव के द्वारा पुरुष अपने ज्ञान की पराकाष्ठा दिखा सकता है। अतएव उन्होंने परम वैराग्यवान् होकर इस विषय में लाभ उठाने का निश्चय किया। तथा उत्सव समाप्ति की घोषणा के अनन्तर जब योगि संघ अपने निवासाश्रम में पहुँचा तब वे लोग भी वहाँ पर उपस्थित हो अपना मनोरथ प्रकटित करते हुए सेवा में व्यग्र हुए। अहो क्या ही विचित्र रहस्य है। पाठक! देखिये पूज्यपाद योगेन्द्रवृन्द किस प्रकार मुमुक्षु जनों को अपनी ओर आकर्षित कर संसार सागर से पार करता था। परन्तु खेद है ईश्वर ने वह समय भी आज हमारी दृष्टिगोचर करा जिसमें ऐसे कजली आदि पूज्य स्थानों की यात्रार्थ गमन करता हुआ आधुनिक योगि संघ मार्गिक विश्रामों में अनेक प्रकार के त्याज्य खाद्य तथा पेय पदार्थों का ग्रहण कर अपने याथाथ्र्य का परिचय दे चुकने पर भी उन स्थानों में पहुँचकर उसी बात का साम्राज्य रखता है। जिसका फल यह होता है कि औन्मादिक उद्दण्डताओं के द्वारा योगियों की चिम्टे वाजी घूराघूरी वा गाली गुप्ताओं का मांगलिक दृश्य उपस्थित हो जाया करता है। जिससे समीपस्थ सांसारिक लोगों को इनकी करणी का ठीक पता लग जाया करता है। शोक ! (अस्तु) अग्रिम दिन कैलास जाते हुए चण्डीश्वरनाथजी तथा विलेशयनाथजी के परामर्शानुसार शरणागत हुए उन मुमुक्षु पुरुषों में अपना शिष्यत्व आरोपण करने के अनुकूल स्थल की अन्वेषणार्थ करणारिनाथजी ने उनके सहित ही वहाँ से रामेश्वर की ओर प्रस्थान किया। 
इति श्री करणारिनाथ भ्रमण वर्णन 

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